नयी कविता की काव्यभाषा का नयापन - The newness of the poetic language of the new poem

प्रयोगवादी कविता का नाम और प्रवृत्ति प्रतिक्रिया के रूप में प्रचलित हुई। यद्यपि अज्ञेय और समविचारी 'प्रयोगवाद' नाम को नकारते रहे पर यह नाम साहित्य क्षेत्र में छाया रहा, इसमें कोई दो राय नहीं। प्रयोगवादी काव्य के निर्माण और प्रचार में 'प्रतीक' पत्रिका का महत्त्व असाधारण है। इसी पत्रिका की सी भूमिका का निर्वाह करती, सन् 1953 में 'नये पत्ते' शीर्षक एक पत्रिका पण्डित रामस्वरूप चतुर्वेदी और लक्ष्मीकान्त वर्मा के सम्पादन में निकली। 'नये पत्ते' में शिल्पगत उपलब्धि के आधार पर 'नयी कविता' की दस्तक सुनाई दी।

समीक्षकों की लेखनी से यह स्वर उभरने लगा कि प्रयोगवाद नवलेखन की एक भूमिका मात्र रहा। उसकी प्रकृति में निहित अस्थिरतामूलक तत्त्वों के आधार पर कुछ नये प्रयोग किये गए थे। इन्हीं में से कुछ सफल प्रयोगों को नींव स्वरूप मानकर नयी कविता का अविर्भाव हुआ। इसी चर्चा के क्रम में जगदीश गुप्त और रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 'नयी 'कविता' का पहला अंक निकाला। पश्चात् धर्मवीर भारती और लक्ष्मीकान्त वर्मा के सम्पादन सहयोग से 'निकष' पत्रिका का आरम्भ किया गया। अज्ञेय को 'नयी कविता' नाम भा गया। गिरिजाकुमार माथुर और मुक्तिबोध जैसे दिग्गज कवियों ने क्रमशः 'नयी कविता : सीमाएँ और संभावनाएँ तथा 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष जैसे पुस्तकों की रचना की।

यह और कुछ ऐसे ही सारस्वत प्रयासों के फलस्वरूप 'नयी कविता' नाम चल पड़ा। चहुँ ओर नयी कविता का डंका बजने लगा।


प्रयोगवाद और नयी कविता के बीच के अन्तर को अलगाने और नयी कविता की विशेषताओं को अधोरेखित करने के उपक्रम किये जाने लगे। नयी कविता की विशेषताओं को जानना, इस सन्दर्भ में उपयुक्त सिद्ध होगा क्योंकि इन्हीं विशेषताओं की पड़ताल करने के पश्चात् नयी कविता का नयापन, नयी कविता की काव्यभाषा का नयापन इत्यादि उभरकर आएगा।