कला तथा साहित्य में वस्तु और रूप - object and form in art and literature

कला और साहित्य में वस्तु और रूप के प्रश्न को लेकर लम्बे समय से विवाद चलता आया है। सवाल यह है कि साहित्य या काव्य में वस्तुतत्त्व प्रमुख होता है अथवा रूपतत्त्व। और, यह विवाद इस सीमा तक भी खींच गया है कि वस्तु और रूप प्रमुखता देते हुए आलोचना की विभिन्न धारणाएँ बन गई हैं। कहना गलत न होगा कि यह स्थिति कविता या कला के वास्तविक मूल्यांकन के लिए बाधक ही सिद्ध हुई है। इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध ने अपनी स्पष्ट मान्यताएँ प्रकट की हैं और किसी भी प्रकार के भ्रम को रहने नहीं दिया है। उनके अनुसार "आलोचना दो प्रकार की होती है एक रूप की दूसरी तत्त्व की।

इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रूप अपनी स्थिति के लिए सदैव तत्त्व पर ही अवलम्बित होता है। तत्त्व अपने प्रकट होने की प्रक्रिया में रूप निर्धारित और विकसित करता है। इसलिए कला तथा साहित्य में तत्त्व की आलोचना रूप की आलोचना से अधिक मूलभूत है।" मुक्तिबोध यह सवाल बारबार उठाते हैं कि "आपत्ति की जाती है कि यह तत्त्व जो समीक्षा का विषय है, साहित्यिक तत्त्व है यानी कि साहित्य में प्रकट तत्त्व है न कि जीवन में जिया जाने वाला तत्त्व। जीवन में जिए जाने वाले तत्त्व साहित्य समीक्षा के बाहर की चीज है।" मुक्तिबोध इस आपत्ति को निराधार सिद्ध करते हैं।




मुक्तिबोध का मानना है कि "साहित्य में प्रकट होने वाले तत्त्व की सत्यता सिद्धान्तों और समीक्षक की कल्पनाओं के द्वारा नहीं की जा सकती, उसे जाँचने का एकमात्र आधार वास्तविक जीवन में पाए जाने वाले तत्त्व ही हैं। इसके लिए आवश्यक है कि रचनाकार और समीक्षक दोनों में वास्तविक जीवन की संवेदना ज्ञानात्मक और ज्ञान संवेदनात्मक समीक्षा शक्ति विकसित हो। जिसके लिए लेखक की यह जीवनगत समीक्षा शक्ति वही होगी, वह अपनी संवेदनाओं के माध्यम से जीवन तथ्यों का सही-सही मूल्यांकन व चित्रण करेगा उसकी दृष्टि उतनी गहरी और विशाल होगी। समीक्षक की सफलता के लिए भी यही स्थिति आवश्यक है। "


कविता तथा कला में वस्तु और रूप दोनों एकत्र स्थिति में और महत्त्वपूर्ण होते हुए भी समान महत्त्व के प्रतीत नहीं होते हैं। वैसे तो वस्तुतत्त्व रूपतत्त्व की तुलना में केन्द्रीय, श्रेष्ठ और प्रधान है किन्तु रूपतत्त्व की उपेक्षा या अवहेलना में कदापि संगत नहीं है। यही वजह है कि जिन कृतियों में स्थूल रूप से वस्तु जगत् की यथार्थता का नियोजन किया जाता है, वे कृतियाँ मुक्तिबोध द्वारा प्रायः आलोचना का पात्र बनी हैं।