आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का सौन्दर्य की वस्तुगत सत्ता - Objective power of beauty by Acharya Ramchandra Shukla

शुक्ल जी सौन्दर्य की वस्तुगत सत्ता मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि सौन्दर्य की भावना जगना, सुन्दर- सुन्दर वस्तुओं या व्यापारों का मन में आना ही है। सौन्दर्य सुन्दर वस्तु में ही होता है "जैसे वीरकर्म से पृथक् वीरत्व कोई पदार्थ नहीं वैसे ही सुन्दर वस्तु से पृथक् सौन्दर्य कोई पदार्थ नहीं।" शुक्ल जी के अनुसार यह भेद व्यर्थ है कि सौन्दर्य मन के भीतर की वस्तु है या बाहर की, क्योंकि जो भीतर है वही बाहर है "यही बाहर हँसता- - खेलता, रोता-गाता, खिलता मुरझाता जगत् भीतर है जिसे हम मन कहते हैं। जिस प्रकार यह जगत् रूपमय और गतिमय है उसी प्रकार मन भी मन भी रूप गति का संघात ही है रूप मन या इन्द्रियों द्वारा संघटित है या मन या इन्द्रियाँ रूपों द्वारा इससे यहाँ प्रयोजन नहीं।

हमें तो केवल यही कहना है कि हमें अपने मन का और अपनी सत्ता का बोध रूपात्मक ही होता है।" (- 'रसात्मक-बोध के विविध रूप', 'चिन्तामणि', पहला भाग) वस्तु जगत् को काव्य का स्रोत मानते हुए उन्होंने अध्यात्म में डूबी हुई और कल्पना लोक का निर्माण करने वाली कविता का तिरस्कार किया है। उन्होंने लिखा है कि ""अध्यात्म' शब्द की, मेरे समझ में, काव्य या कला के क्षेत्र में कहीं कोई जरूरत नहीं है।" और "जो कविता मंगल को सिद्ध रूप में देखने के लिए किसी अज्ञात लोक की ओर इशारा किया करती है, वह आलस्य, अकर्मण्यता और नैराश्य की वाणी है।"



सौन्दर्य को शुक्ल जी कविता की कसौटी मानते हैं। उनका विचार है कि उत्तम काव्य से जिस प्रकार की रसानुभूति होती है वैसी ही रसानुभूति सृष्टि के विविध रूपों के प्रत्यक्ष दर्शन से होती है। सृष्टि रूपात्मक है और सौन्दर्य भी रूप से अलग नहीं होता। हमारी सौन्दर्यानुभूति का आधार जगत् का प्रत्यक्ष ज्ञान ही है । कविता वस्तुओं और बाह्य जगत् का सौन्दर्य ही नहीं दिखाती, कर्म और मनोवृत्तियों के सौन्दर्य का उद्घाटन भी करती है। वह केवल अच्छे कर्मों और मनोवृत्तियों का सौन्दर्य ही नहीं दिखाती, बल्कि प्रकट रूप से बुरे कर्मों और मनोवृत्तियों का सुन्दर रूप भी हमारे सामने प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार कविता के केवल दो ही रूप हैं- सुन्दर और असुन्दर । कवि की दृष्टि सौन्दर्य की ओर रहती है। वह शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, मंगल-अमंगल, उपयोगी- अनुपयोगी आदि बातें नहीं देखता । धार्मिक शब्दावली में जिसे 'मंगल' कहा जाता है कवि उसे 'सुन्दर' कहता है।