निरंकुश राज व्यवस्था का विरोध - opposition to absolutism

निरंकुश राज व्यवस्था का विरोध - opposition to absolutism


निरंकुश राज्य-व्यवस्था से कवि को वैर है। निरंकुश राजाओं की स्वेच्छाचारिता और सामन्ती भोगविलास से जनता त्रस्त हो गई। इस निरंकुश स्वेच्छाचारिता और निर्बंन्ध भोग-विलास पर कवि ने 'हुंकार' काव्य-संग्रह के 'विपथगा' कविता के अन्तर्गत अपने रोष को प्रकट किया है-



पौरुष को बेड़ी डाल पाप का अभ्यास जब होता है, ले जगदीश्वर का नाम खड्ग कोई दिल्लीश्वर धोता है, धन के विलास का बोझ दुखी, दुर्बल दरिद्र जब ढोता है, दुनिया को भूखों मार भूप जब सुखी महल में सोता है, सहती, सब कुछ मन मार प्रजा, कसमस करता मेरा यौवन ।


समाज में व्याप्त असमानता के प्रति कवि का विरोध एक-दूसरे के विरोधी मित्रों से स्पष्ट हो जाता है और मुखर भी एक ओर राय बहादुरों के कुत्ते भी दूध पीते थे और दूसरी ओर निर्धनों के छोटे बच्चे जाड़े की रात में ठिठुरते हुए भूखे पेट माँ की हड्डी से चिपक कर सोते हैं -


श्वानों को मिलता दूधवस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं माँ की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं, युवती के लज्जा वसन बेच जब व्याज चुकाए जाते हैं, मालिक जब तेल- फुलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते हैं,


दिनकर सामन्तवाद के पतन का सीधा आह्वान 'रेणुका' संग्रह के 'ताण्डव' कविता में करते हैं। उनके


अनुसार - -


गिरे भवन का दर्प चूर्ण हो आग लगे इस आडम्बर में ।


इसी प्रकार 'हुंकार' संग्रह की 'स्वर्ग दहन' नामक कविता एक प्रतीक के रूप में सामने आती है। यह प्रतीक है सामन्तवाद की समाप्ति का यह प्रतीक उनकी कविताओं में बार-बार आता है। स्वर्ग और सुर सामन्त और पूँजीपति के प्रतीक हैं। यह प्रतीक उस समय के साहित्यिक परिवेश में उभर रहा था।

मुक्तिबोध ने कामायनी की देव सभ्यता को सामन्तवाद का प्रतीक कहा है। दिनकर सामन्ती समाज को पूरी तरह ध्वस्त कर देना चाहते हैं। उनकी कविताओं में स्वर्ग बराबर सामन्ती प्रभों के प्रतीक के रूप में उभरा है। 'हाहाकार' कविता में वे स्वर्ग लूटने की बात करते हैं और 'सामधेनी' की एक कविता में स्वर्ग के सम्राट् को खबरदार करते हैं। जनता धरती पुत्र हैं। इस स्वर्ग की पौराणिक कल्पना उपनिवेशी सामन्ती शोषण का प्रतीक बनकर उभरती है।


'रेणुका' संग्रह की 'बागी', 'बोधिसत्व' आदि कविताओं में किसान आन्दोलन, अछूतोद्धार, किसान आन्दोलन, साम्प्रदायिकता और आर्थिक शोषण के चित्र हैं। ये समस्याएँ समाज और राष्ट्र दोनों की थी इसलिए दिनकर ने आदिकवि की वाणी को युगवाणी में परिवर्तित करने का आग्रह किया है-


लाखों क्रौंच कराह रहे हैं, जाग आदिकवि की कल्याणी फूट-फूट तू कवि कण्ठों से बन व्यापक निज युग की वाणी ।