अलंकार निरूपण - ornament rendering
काव्य सिद्धान्तों के अनुसार कवि आचार्य केशवदास मूलतः अलंकारवादी थे। उनके अलंकार निरूपण में विविधता के साथ-साथ नवीनता भी है। उन्होंने भामह, दण्डी तथा उद्भट आदि अलंकार सम्प्रदाय के प्रतिपादकों की सुदीर्घ परम्परा का अनुसरण किया है और आधाग्रन्थों के रूप में 'काव्यादर्श', 'अलंकार शेखर' तथा 'काव्यकल्पलतावृत्ति' आदि को ग्रहण किया है। चमत्कार प्रदर्शन की भावना उनमें सर्वोपरि है। उनकी दृष्टि में भूषण या अलंकारविहीन कविता प्रभावी व सुन्दर नहीं हो सकती। यही वजह है कि उन्होंने अलंकारों को भावों से भी बड़ा माना। केशवदास की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं -
जदपि सुजाति सुलच्छिनी, सुबरन सरस सुवृत्त ।
भूषण बिनु न बिराजहीं, कविता वनिता मित्त ॥
उनकी रचनाओं में श्लेष, यमक आदि का आश्रय लेकर उक्ति-वैचित्र्य एवं शब्द चमत्कार की प्रधानता सहज ही परिलक्षित होती है। हालांकि, कभी-कभी दुरूहता व नीरसता भी उत्पन्न हो जाती है। कहना गलत न होगा कि 'सुबरन की खोज' में तथा काव्य-रूढ़ियों के अनुपालन एवं निर्वहन में तत्युगीन उनकी काव्यचेतना कवि सुलभ रागात्मक तरलता व सहज सौन्दर्यबोध से वंचित प्रतीत होने लगती है।
अलंकार-निरूपण के सम्बन्ध में 'कविप्रिया' कवि आचार्य केशवदास की महत्त्वपूर्ण कृति मानी जाती है। जिसके कुल सोलह प्रभावों में से बारह प्रभावों में अलंकारों का निरूपण हुआ है।
अलंकार निरूपण का आधार
केशवदास ने वर्ण्य विषय को तथा उसे शोभित करने वाले साधनों को 'अलंकार' की संज्ञा प्रदान की है। उन्होंने अलंकारों को साधारण अलंकार तथा विशिष्ट अलंकार के रूप में विभाजित करते हुए 'कविप्रिया' में लिखा है-
कविन कहै कवितावन के अलंकार द्वै रूप । एक कहै साधारण, एक विशिष्ट सरूप ॥
साधारण अलंकार के रूप में उन्होंने वर्ण, वर्ण्य, भूश्री और राजश्री का निरूपण किया है, जबकि विशिष्ट अलंकार के अन्तर्गत वे स्वभावोक्ति, विभावना आदि कुल चालीस अलंकारों का उल्लेख करते हैं।
'कविप्रिया' ग्रन्थ का वास्तविक आरम्भ तीसरे प्रभाव (अध्याय) से होता है जहाँ वे काव्यशास्त्रीय सभी उपादेय अंगों को 'अलंकार' के रूप में स्थापित करते हैं-
अलंकार कवितान के सुनिसुनि विविध विचार । कविप्रिया केशव करी कविता को सिंगार ॥
अलंकार को केशवदास कविता का अनिवार्य तत्त्व स्वीकार करते हैं। अपनी इस धारणा की सम्पुष्टि वे एक अन्य प्रकार से भी करते हैं। उनकी दृष्टि में 'नग्नदोष' वहाँ होता है जहाँ कविता अलंकारविहीन हो "नग्न जु भूषण हीन ।"
वे सदोष रचना को किसी भी दशा में काव्य मानने को उद्यत नहीं हैं। रसवत् अलंकार के अन्तर्गत शृंगारादि नौ रसों का निरूपण करके प्रकारान्तर से रस यानी अलंकार्य को ही उन्होंने अलंकार माना है। केशवदास की अलंकार सम्बन्धी धारणाओं को इस प्रकार देखा जा सकता है-
1. काव्य की सभी वर्णनीय सामग्री को यानी वर्ण, वर्ण्य, भूश्री, राजश्री आदि को 'अलंकार्य' न कहकर 'अलंकार' कहना चाहिए।
ii. शृंगार आदि नवरस भी 'अलंकार्य' न होकर 'अलंकार' ही हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत स्वभावोक्ति अलंकारों
के समान रसवद् अलंकार का आधार दण्डी का 'काव्यादर्श' है।
वामन के "काव्यं ग्राह्यलंकारात्, सौन्दर्यमलंकार" का अनुकरण करते हुए केशवदास भी काव्य के सभी
सौन्दर्य विधायक तत्त्वों को 'अलंकार' पद से वचनीय मानते हैं। उपमादि अलंकार काव्य के अनिवार्य अंग हैं। इसके अभाव में सर्वगुण सम्पन्न रचना भी शोभा पा सकने में पूरी तरह असमर्थ है। iv.
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