आचार्य देव का अलंकार निरूपण - Ornamental representation of Acharya Dev

अलंकार काव्य में विषयवस्तु के वर्णन को रोचक और प्रभावशाली बनाने में सहायक होते हैं। रचनाकार सूक्ष्म और अमूर्त भावों व स्थितियों को अलंकार की सहायता से पाठक तक सरलता से संप्रेषित करने में सफल होता है। इसीलिए काव्य में अलंकार की उपादेयता को हिन्दी के कवि आचार्यों ने भी स्वीकार किया है। आचार्य देव ने अपनी महत्त्वपूर्ण कृति 'भावविलास' और 'शब्द रसायन' में अलंकार निरूपण किया है। 'भावविलास' में उन्होंने 39 प्रकार के अलंकारों का विवेचन किया है जो पूर्ववर्ती आचार्य दण्डी, आचार्य भामह आदि की रचनाओं में प्रायः उपलब्ध है। 'शब्द रसायन' में देव ने 45 अन्य अलंकारों का उल्लेख किया है जो आचार्य भामह से आचार्य अप्पयदीक्षित तक के कालखण्ड के कई आचार्यों द्वारा प्रतिपादित किए गए हैं।

यह स्पष्ट है कि अलंकार निरूपण में आचार्य देव ने किसी एक ग्रन्थ विशेष को आधार नहीं बनाया है। उनके अलंकार निरूपण की विशिष्टताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत परिगणित किया जा सकता है-


(i) अलंकार निरूपण में देव ने मुख्यतः आचार्य भानुदत्त की 'रसमंजरी' का आधार ग्रहण किया है। (ii) अलंकारों के सहज व स्वाभाविक प्रयोग के प्रति उनका विशेष आग्रह रहा है और यह तथ्य उनकी रचनाओं में प्रायः सर्वत्र परिलक्षित होता है।


(iii) अलंकार की परिभाषा को रसवदादि अलंकारों पर घटित करने का उनका प्रयास उल्लेखनीय है।


(iv) विभिन्न अलंकारों में यमक और अनुप्रास अलंकार के प्रति उनका विशेष आग्रह ध्यातव्य है । 


(v) कतिपय अलंकारों के लक्षण-निरूपण में परस्पर भिन्नता अव्यवस्था की परिचायक मानी जा सकती है।


(vi) चूँकि अधिकतर अलंकारों का मूल आधार साम्य है इसलिए शब्दार्थ के अलंकरण द्वारा रस का भी उपकार होता है।


(vii) 'दधि, घृत, मधु, पासय तजि वायसु चाम चबात' कहकर कवि आचार्य देव ने चित्रकाव्य का तिरस्कार किया है।