अलंकार- विभाजन - ornamentation
आचार्य केशवदास के अलंकार विधान पर संस्कृत काव्य-परम्परा का भरपूर प्रभाव परिलक्षित होता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तो यहाँ तक कह दिया है कि केशवदास के अलंकार विवेचन में सारी सामग्री संस्कृतग्रन्थों से ली गई है तथा कहीं-कहीं उनके नाम बदल दिए गए हैं। ... केशवदास ने रूपक के जो तीन भेद किए हैं, उनके स्वरूप को पूरी तरह व्यक्त नहीं करते ।
केशवदास ने अलंकारों को दो भागों में विभाजित किया है पहला, विशिष्ट अलंकार तथा दूसरा सामान्य अलंकार ।
विशिष्ट अलंकारों में उन्होंने विभावना, विरोधाभास, विशेषोक्ति, उत्प्रेक्षा, रूपक, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, व्याजस्तुति, पर्यायोक्ति, दीपक, उपमा, यमक आदि को स्वीकार किया है। केशवसम्मत विशिष्ट अलंकारों की संख्या चालीस है जिन्हें उन्होंने अपनी उल्लेखनीय कृति 'कविप्रिया' के अन्तिम आठ प्रभावों (अध्याय) में विवेचित किया है। सामान्य अलंकारों के वर्ण, वर्ण्य, भूश्री और राजश्री आदि चार भेद किए गए हैं।
आचार्य केशवदास के अलंकार निरूपण में मौलिकता होते हुए भी अनेक दोष हैं। आलोचकों का एक समूह मानता है कि उनके द्वारा प्रस्तुत अलंकार विभाजन का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है और इसे जितना सुलझाने का प्रयास किया जाए यह उतना ही उलझता है। यदि आचार्य केशवदास इस तरफ थोड़ा भी ध्यान देते तो दण्डी के समान ऊर्ज (ऊर्जस्वी) और रसवत् के साथ ही प्रेम (प्रेयः) को भी स्थान दे सकते थे, उपमा और रूपक का निरूपण साथ-साथ कर सकते थे। उनके अलंकार विवेचन में अधिकांश जगहों पर लक्षण एवं उदाहरण स्पष्ट नहीं हैं। उनमें परस्पर सामंजस्य का अभाव भी खटकता है।
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