शुक्लयुगीन अन्य आलोचक - Other critics of Shukla era

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बहुआयामी और मौलिक साहित्य चिन्तन के कारण हिन्दी आलोचना में उनकी सक्रियता का कालखण्ड शुक्लयुग कहलाता है। इस युग में आचार्य शुक्ल के साथ-साथ हिन्दी आलोचना के विकास में कई अन्य आलोचक भी अपना योगदान दे रहे थे। इन आलोचकों में पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल पण्डित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, बाबू गुलाबराय पण्डित चन्द्रबली पाण्डेय, लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु, पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी और पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये आलोचक आचार्य शुक्ल की आलोचना- दृष्टि का ही विस्तार करते हुए अपने-अपने ढंग से उनके छूटे हुए कार्यों को पूरा कर रहे थे। आइए, इनके योगदान का अवलोकन करें।


पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल


पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल ने 'केशव की काव्यकला' तथा 'कविवर रत्नाकर' जैसे ग्रन्थों में केशवदास और जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' के काव्य का सहृदयतापूर्वक विश्लेषण और मूल्यांकन किया। उन्होंने अपनी इन कृतियों में आलोच्य कवियों के जीवन और काव्य का पूर्ण रसग्राहिता के साथ गहन अनुसंधान करते हुए उनकी अन्तर्वस्तु और काव्यकला की विशिष्टताएँ प्रकट की हैं। पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल के इन दोनों ग्रन्थों के सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है कि " 'केशव की काव्यकला' में पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल ने अच्छा विद्वतापूर्ण अनुसंधान भी किया है। उनका 'कविवर रत्नाकर' भी कवि की विशेषताओं को मार्मिक ढंग से सामने रखता है।"

आचार्य शुक्ल ने लिखा था कि "केशव को कवि हृदय नहीं मिला था । " पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल ने यद्यपि उनका विरोध नहीं किया लेकिन केशवदास के काव्य से मार्मिक पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए उनकी काव्यकला और सहृदयता का विश्लेषण किया और आचार्य शुक्ल से अपनी असहमति प्रकट कर दी है। इसी प्रकार रत्नाकर के काव्य की विषयवस्तु, अभिव्यंजनाशैली, भाव चित्रण और अलंकार निरूपण आदि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण विवेचन किया है। 'केशव की काव्यकला' और 'कविवर रत्नाकर' नामक आलोचनात्मक कृतियों के अतिरिक्त पण्डित कृष्णशंकर शुक्ल ने 'आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास' भी लिखा है, जिसे कुछ हद तक आचार्य शुक्ल के इतिहास का पूरक कहा जा सकता है।


पण्डित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र


पण्डित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र की आलोचना मुख्य रूप से रीतिकाल के कवियों की आलोचना है। उन्होंने बिहारी, केशव, भूषण, रसखान, घनानन्द आदि रीतिकालीन कवियों की कृतियों का सम्पादन किया और उन पर आलोचना भी लिखी। उन्होंने भिखारीदास की रचनाओं और तुलसी के रामचरितमानस का सम्पादन भी किया। उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की 'सूरदास' और 'रस मीमांसा' नामक पुस्तकों का भी सम्पादन कर उन्हें प्रकाशित करवाया । मिश्र जी ने संस्कृत और रीतिकालीन काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों का गहन अध्ययन-मनन करते हुए विभिन्न सम्प्रदायों के मतों को बहुत स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है।

'हिन्दी साहित्य का अतीत' और 'बिहारी की वाग्विभूति' नामक ग्रन्थ उनकी आलोचना दृष्टि के परिचायक हैं। उन्होंने 'हिन्दी नाट्य साहित्य का विकास' नामक पुस्तक भी लिखी जिसमें उन्होंने संस्कृत नाट्य साहित्य के आधार पर हिन्दी के नाटकों का विवेचन किया है। 'बिहारी की वाग्विभूति' में बिहारी की काव्य-कला के विभिन्न पक्षों पर गहनतापूर्वक चिन्तन किया है। 'हिन्दी साहित्य का अतीत' में मिश्र जी रचनाओं की अन्तर्वस्तु में ऐतिहासिक तथ्यों की खोज कर इतिहास से उनकी समानता दर्शाते हैं। उनके इन प्रयासों में एक गम्भीर और समर्पित अनुसंधानकर्ता का रूप उनके आलोचक से अधिक महत्त्वपूर्ण है । साहित्य के व्याख्याकार, पाठशोधक और सम्पादक के रूप में पण्डित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का हिन्दी आलोचना के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, क्योंकि रचनाओं के प्रकाश में आने पर ही उनके मूल्यांकनका कार्य सम्भव होता है।


बाबू गुलाबराव


बाबू गुलाबराय ने भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का प्रामाणिक परिचय प्रस्तुत करने के उद्देश्य से सैद्धान्तिक आलोचना की पुस्तकें लिखी। 'सिद्धान्त और अध्ययन' तथा 'काव्य के रूप' नामक अपनी पुस्तकों के सम्बन्ध स्वयं उनका कथन है कि ये पुस्तकें इसलिए लिखी गई हैं ताकि "विद्यार्थियों को काव्यांगों, रस, रीति, लक्षणा, व्यंजना, अलंकारों आदि का सामान्य परिचय ही जाए और उनका काव्य में स्थान समझ आ जाए। उसी के साथ वे वर्तमान साहित्यिक समस्याओं और वादों से भी अवगत ही जाएँ। इनमें पूर्व और पश्चिम के मतों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।"

उनकी इन दोनों पुस्तकों में साहित्य-आलोचना के सभी पक्षों का विवेचन समाहित है। उनकी 'नवरस' नामक पुस्तक भी सैद्धान्तिक आलोचना की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। बाबू गुलाबराय ने व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में भी 'हिन्दी काव्य विमर्श', 'साहित्य-समीक्षा' तथा 'अध्ययन और आस्वाद' शीर्षक पुस्तकों के लेखन के माध्यम से अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने विजयेन्द्र स्नातक के साथ 'आलोचक रामचन्द्र शुक्ल' नामक पुस्तक का सम्पादन भी किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में निबन्ध लेखकों के रूप में बाबू गुलाबराय और सरदार पूर्णसिंह की चर्चा करते हुए लिखा है कि इन दोनों लेखकों में "भाषा की एक नयी गतिविधि तथा आधुनिक जगत् की विचारधारा से उद्दीप्त नूतन भावभंगिमा के दर्शन होते हैं।"


लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु


लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु' ने सैद्धान्तिक समीक्षा के क्षेत्र में 'काव्य में अभिव्यंजनावाद' नामक पुस्तक लिखी। इसमें साहित्य-सृजन की प्रवृत्तियों और नवीन काव्य की विशेषताओं पर बहुत गम्भीरता से चिन्तन किया गया है । इस पुस्तक में बहुत अच्छे ढंग से संस्कृत काव्यशास्त्र का परिचय दिया गया है तथा क्रोचे के सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्तों की विवेचना के द्वारा अभिव्यंजनावाद जैसे हिन्दी के लिए नये विषय को समझने का प्रयास किया गया है। उन्होंने 'जीवन के तत्त्व और काव्य के सिद्धान्त' नामक अपनी पुस्तक में साहित्यशास्त्र, मनोविज्ञान तथा दर्शन के अपने ज्ञान के आधार पर भाव- विन्यास और जीवन, जीवन का वातारण और प्रकृति, आत्मभाव और काव्य-विधान, काव्य का अर्थबोध, लय और छन्द, ग्राम्य गीतों का मर्म आदि विषयों का विवेचन किया है।


पण्डित चन्द्रबली पाण्डेय


पण्डित चन्द्रबली पाण्डेय अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति के आलोचक थे। 'हिन्दी कविचर्चा', 'तुलसीदास', 'सूरदास', और 'साहित्य-संदीपनी', 'तसव्वुफ़ और सूफ़ी मत' आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ हैं । वे साहित्य और जीवन का अन्योन्यन सम्बन्ध मानते थे। इसी दृष्टि के आधार पर उन्होंने पाया कि 'रासो' में जीवन के सर्वांगीण चित्रण की प्रवृत्ति है, 'सूरसागर' में ब्रज का साधारण लोक है और 'विद्यापति पदावली' में भी लोक जीवन की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने केशवदास, कालिदास, शूद्रक और तुलसीदास के जीवन संघर्षों के सन्दर्भ में उन पर आलोचना पुस्तकें लिखीं। केशवदास पर लिखी पुस्तक में पाण्डेय जी ने केशव की जीवनी, उनकी प्रबन्ध पटुता, कविकर्म और उनके व्यक्ति विचार की विवेचना की है।


पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी


आलोच्य युग में पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की दो महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियाँ प्रकाशित हुई- 'हिन्दी साहित्य विमर्श' और 'विश्व साहित्य'। इन कृतियों में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तों का तुलनात्मक रूप से विवेचन करते हुए उनके सामंजस्य का प्रयास किया गया है। 'विश्व साहित्य' में विश्व साहित्य का सामान्य परिचय दिया गया है तथा यूरोपीय साहित्य और पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर विचार किया गया है। बक्शी जी ने 1920 ई. से 1927 ई. तक 'सरस्वती' पत्रिका का सम्पादन भी किया।


पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी


पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी छायावाद की सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या करने वालों में प्रमुख आलोचक थे । पण्डित द्विवेदी साहित्य में कवि के रूप में आए थे लेकिन शीघ्र ही कविता को छोड़ कर गद्य लेखन में प्रवृत्त हो गए।

वे छायावादी काव्य के प्रशंसक थे। उन्होंने 'हमारे साहित्य निर्माता' नामक अपनी आलोचना कृति में हिन्दी के कवियों और लेखकों की साहित्यिक प्रवृत्तियों का वर्णन किया है। उनकी अन्य आलोचना पुस्तकों में 'साहित्यिकी', 'कवि और काव्य' तथा 'ज्योतिविहग' उल्लेखनीय हैं। पण्डित द्विवेदी हिन्दी में प्रभाववादी आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस आलोचना-पद्धति को समालोचना कहना ही उचित नहीं समझा था । पण्डित द्विवेदी ने 'संचारिणी' और 'सामयिकी' शीर्षक कृतियों में छायावादी काव्य की व्याख्या की और उसका सम्बन्ध राष्ट्रीय जागृति की चेतना से स्थापित किया। उन्होंने छायावादी शैली में गद्य लिखा, इसलिए उनकी साहित्य सम्बन्धी उद्भावनाओं पर उनकी शैली हावी रही। अपनी छायावादी शैली के बावजूद उन्होंने छायावादी काव्य की विशेषताओं को उद्घाटित करने और उसका विश्लेषण करने में जिस प्रतिभा और सहृदयता का परिचय दिया है उसमें उनकी काव्य-मर्मज्ञ अन्तर्दृष्टि दिखाई देती है ।