आलोचना के अन्य रूप - other forms of criticism
द्विवेदी युग के आरम्भ से कुछ वर्ष पूर्व जगन्नाथदास 'रत्नाकर' ने अंग्रेज़ी के कवि अलेक्ज़ेंडर पॉप की प्रसिद्ध कविता An Essay on Criticism' का पद्यात्मक अनुवाद 'समालोचनादर्श' शीर्षक से प्रस्तुत किया था। सन् 1905 में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जोसफ़ एडिसन के निबन्ध 'Pleasures of Imagination' का अनुवाद 'कल्पना का आनन्द' शीर्षक से किया था। स्वयं महावीरप्रसाद द्विवेदी ने अपने कई निबन्धों में अंग्रेज़ी के लेखकों के विचारों के आधार पर काव्य-सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। इस युग में अनुसन्धात्मक और अध्यापकीय आलोचना का भी विकास दिखाई देता है।
बाबू श्यामसुन्दर दास ने स्नातकोत्तर कक्षाओं के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर कई संग्रह प्रकाशित किए तथा 'रामचरितमानस', 'पृथ्वीराज रासो' आदि कई प्राचीन ग्रन्थों का सम्पादन किया। इसके अतिरिक्त आलोच्य युग में जगन्नाथप्रसाद 'भानु' ने 'काव्यप्रभाकर' (1910) तथा 'छन्दसारावली' (1917) की रचना की। लाला भगवानदीन की 'अलंकार मंजूषा' (1916) भी इसी दौर में लिखी गई। इन सभी प्रयासों से आलोचना को एक स्वतन्त्र विधा के रूप में मान्यता प्राप्त होने में सहायता मिली और हिन्दी आलोचना अपने पथ पर आगे बढ़ने लगी। उसने रीति और शास्त्र की जटिलता से मुक्त होकर वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को अपनाना आरम्भ किया। शुक्ल जी की विशुद्ध और ठेठ आलोचना की पीठिका द्विवेदी- युग में तैयार हो चुकी थी।
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