आलोचना के अन्य भेद - Other Variations of Criticism
जिन मान्यताओं और पद्धतियों को आधार बनाकर साहित्य की आलोचना की जाती है, प्रायः उन्हीं के अनुसार आलोचना के विभिन्न प्रकार विकसित हो जाते हैं। आलोचना के कई रूप और नाम हो सकते हैं। मुख्य रूप से आलोचना के निम्नलिखित प्रकार होते हैं-
निर्णयात्मक आलोचना
अंग्रेजी की 'ज्यूडीशल क्रिटिसिज्म' (Judicial Criticism) को हिन्दी में निर्णयात्मक आलोचना कहा जाता है। इसमें निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर रचना के गुण-दोषों का निदर्शन किया जाता है और उसकी श्रेष्ठता या निकृष्टता सम्बन्धी निर्णय दिया जाता है। निर्णय की प्रधानता होने कारण इसे निर्णयात्मक आलोचना कहा जाता है।
निर्णयात्मक आलोचना रचना की विषयवस्तु, शैली, संरचना और तकनीक के आधार पर उसकी व्याख्या करती है तथा आलोचक के व्यक्तिगत निर्णयों को साहित्यिक श्रेष्ठता के विशिष्ट आधारों पर स्थापित करती है।
ऐतिहासिक आलोचना
इस आलोचना पद्धति में साहित्य का विश्लेषण और मूल्यांकन युगीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। साहित्य-सृजन और सम्प्रेषण में उस समय की सामाजिक, आर्थिक,
राजनैतिक, दार्शनिक और धार्मिक परिस्थितियों क्या प्रभाव रहा है, इसी के आलोक में कृति के मूल्य और महत्त्व का निर्धारण किया जाता है ।
प्रभावाभिव्यंजक आलोचना
इस आलोचना में आलोचक कृति के अपने मन पर पड़ने वाले प्रभाव को आकर्षक भाषा और शैली में प्रस्तुत कर देता है। इसमें व्यक्तिगत रुचि और पसंद स्पष्ट रूप में व्यक्त होती है। प्रभाववादी आलोचना रचना या उसके किसी अंश की अनुभूत विशेषताओं का वर्णन करती है तथा उन प्रतिक्रियाओं को अभिव्यक्त करती है जो रचना के प्रभाव से उत्पन्न हुई हैं। इसे आत्मप्रधान,
प्रभावाभिव्यंजक या प्रभाववादी आलोचना भी कहा जाता है। यह कृति के वास्तविक गुणों के स्थान पर आलोचक के मनोभावों और अनुभूतियों पर आधारित होती है। वॉल्टर पेटर के अनुसार आलोचना में किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने का पहला उपाय व्यक्ति के स्वयं के वास्तविक प्रभाव को जानना, उसे अन्य चीज़ों से अलग करके देखना और उसे अलग अनुभव करना है तथा उसे इस मूल प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करना है कि 'मेरे अपने लिए उस कृति का क्या अर्थ है ?
व्याख्यात्मक आलोचना
व्याख्यात्मक आलोचना में नियमों के बन्धन से परे कृति के आन्तरिक तत्त्वों के विश्लेषण के आधार पर उसका साहित्यिक और सामाजिक मूल्य निर्धारित किया जाता है।
इसके अन्तर्गत किसी कृति में निहित जीवनानुभव और उसके कलात्मक सौन्दर्य को समझने का प्रयत्न किया जाता है। इसमें माना जाता है कि जीवन और ज्ञान के विकासमान सन्दर्भ में साहित्य का सृजन होता है और उसके मान-मूल्य भी विकसित होते हैं। इसलिए व्याख्यात्मक आलोचना में इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि की मान्यताओं का आवश्यकतानुसार उपयोग किया जाता है। व्याख्यात्मक आलोचना साहित्य में अन्तर्निहित गम्भीर विषयों और सन्देशों को स्पष्ट करती है और उसकी भाषा और शिल्प के विभिन्न तत्त्वों को समझाने का प्रयास करती है।
तुलनात्मक आलोचना
जब किसी रचना या साहित्य की तुलना उसी भाषा की किसी अन्य रचना या रचनाकार से की जाए अथवा किसी दूसरी भाषा के साहित्य से की जाए तो उसे तुलनात्मक आलोचना कहते हैं।
इस आलोचना पद्धति में आलोचक किसी एक ही भाषा के अन्य रचनाकारों, विभिन्न कृतियों, साहित्यिक धाराओं और आन्दोलनों का तुलनात्मक मूल्यांकन करता है या एक भाषा के इन तत्त्वों का किसी अन्य भाषा के ऐसे ही तत्त्वों के साथ तुलनात्मक अध्ययन और विश्लेषण करता है।
आलोचना के उपर्युक्त भेदों के अतिरिक्त भी आलोचना कई प्रकार की हो सकती है। विषयवस्तु, कालखण्ड और सामाजिक, वैचारिक धरातलों पर आलोचना की अलग पद्धति का प्रचलन हो सकता है। कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध, संस्मरण आदि साहित्य की अलग-अलग विधाओं के लिए भी आलोचना के अलग-अलग रूप हो सकते हैं।
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