पन्त : जीवन परिचय और काव्य-यात्रा - Pant: Life Introduction and Poetry-Journey

खड़ीबोली हिन्दी कविता में आधुनिकता का श्रीगणेश छायावाद से हुआ, जिसके प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं। छायावादी काव्यधारा को सँवारने में पन्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया । उनके काव्य की प्रमुख विशेषता यह है कि उसमें कल्पना की उड़ान, प्रकृति के प्रति आकर्षण तथा प्रकृति और मानव जीवन के कोमल और सरस पक्षों के प्रति अटूट आग्रह है। किसी भी कवि के साहित्य-संसार में प्रविष्ट होने के लिए उसके व्यक्तित्व का ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि कवि की समस्त काव्य-उपलब्धियाँ उसके व्यक्तित्व का परिणाम होती है । सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य का विस्तृत अध्ययन करने से पूर्व उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय आवश्यक है, जो इस प्रकार है-


जीवन परिचय


सुमित्रानन्दन पन्त, जिनका बचपन का नाम गोसाई दत्त था, अपने माता-पिता की आठवीं और अन्तिम संतान थे, उनका जन्म 20 मई 1900 को कौसानी, उत्तराखण्ड में हुआ था। उनके पिता गंगादत्त कौसानी में चाय के बगीचे में मैनेजर थे । पन्त के जन्म के मात्र 6 घण्टे बाद ही उनकी माता सरस्वती देवी की मृत्यु हो गई। तब उनकी दादी ने उन्हें पाला-पोसा, मातृ-स्नेह के अभाव का वर्णन कवि ने 'ग्रन्थि' में इस प्रकार किया है-


नियति ने ही निज कुटिल कर से, सुखद


गोद मेरे लाड़ की थी छीन ली,


बाल में ही हो गई थी लुप्त हा !


मातृ अंचल की अभयछाया मुझे।


माँ के इस अभाव की पूर्ति प्रकृति ने की और वही उनकी माता-पिता, भाई, शिक्षक, मित्र और प्रेमिका सभी कुछ बन गई। स्वयं पन्त ने 'साठ वर्ष एक रेखांकन' में स्पष्ट किया है कि "कौसानी की गोद मुझे माँ की गोद से भी अधिक प्यारी रही है।" बाल्यकाल में ही प्राकृतिक सौन्दर्य के सान्निध्य और दादी माँ की कहानियों ने उन्हें कविहृदय बना दिया था।

प्रकृति के ममतामयी आँचल में पले पन्त को अपने भाई हरदत्त, जो संस्कृत और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे और हिन्दी तथा कुमाऊँनी में कविताएँ लिखते थे, से प्रेरणा मिली और वे शब्दों की तुकबन्दी कर कविता लिखने लगे। उनकी प्राथमिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में हुई, जहाँ उनके कविता-पाठ से प्रभावित होकर स्कूल इंस्पेक्टर ने उन्हें उपहार में एक पुस्तक दी। ग्यारह साल की अवस्था में उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में भेज दिया गया। नयी संस्कृति, समाज और वातावरण ने गोसाई दत्त को प्रभावित किया और उन्होंने लक्ष्मण के चरित्र को अपना आदर्श मानते हुए अपना नाम गोसाई दत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रख लिया।


सन् 1918 में पन्त ने जयनारायण हाईस्कूल बनारस में प्रवेश लिया और हाईस्कूल परीक्षा पास करने के बाद सन् 1919 में प्रयाग के म्योर सेंट्रल कॉलेज में इंटर में प्रवेश लिया। प्रयाग उनके लिए साहित्य - उर्वर स्थल साबित हुआ और यहीं उनकी साहित्य-साधना विकसित हुई। यहाँ उन्हें आत्म-परिष्कार का उचित अवसर और वातावरण प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप यह उनका प्रिय स्थान रहा और यहीं उन्होंने अपना स्थायी निवास बना लिया।

सन् 1921 में असहयोग आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी के अंग्रेजी विद्यालय, महाविद्यालय और सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और जीवन की पाठशाला में संसार की महान् पुस्तकों के अध्ययन में जुट गए। हिन्दी-साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले पन्त की रचनाओं में सामाजिक यथार्थ के साथ ही प्रकृति और मानवीय सत्ता के बीच का संघर्ष दिखलाई पड़ता है। उनके समग्र साहित्य में आधुनिक हिन्दी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है। 28 दिसम्बर 1977 को हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य उपासक का इलाहाबाद में देहान्त हो गया।