पन्त की सौन्दर्य चेतना - Pant's aesthetic consciousness

सम्पूर्ण जगत् में जितने भी रमणीय पदार्थ हैं उनकी तरफ आकृष्ट होना मानव मन की सहज प्रवृत्ति है। इसी से सौन्दर्यबोध का जन्म होता है। साहित्य-सृजन के लिए भी सौन्दर्य एक आवश्यक उपकरण है। सौन्दर्य की अनुभूति को अभिव्यक्त करना ही काव्य की आत्मा को सँवारना है जो कवि जितना भावुक होता है उसमें सौन्दर्य- ग्रहण की प्रवृत्ति भी उतनी ही अधिक होती है। सुमित्रानन्दन पन्त मूलतः सौन्दर्य-कवि हैं और यही उनकी कविता का मुख्य प्रतिपाद्य है।

पन्त के काव्य में सौन्दर्य की कई प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं, जैसे प्राकृतिक सौन्दर्य निरीक्षण की प्रवृत्ति,

सामाजिक सौन्दर्य की प्रवृत्ति, नारी या मानवीय सौन्दर्य की प्रवृत्ति तथा उत्तरकालीन काव्य में आध्यात्मिक सौन्दर्य की प्रवृत्ति । पन्त सर्वप्रथम प्रकृति के रम्य दृश्यों की ओर आकर्षित हुए। उनकी कृतियों 'वीणा' और 'पल्लव' में प्राकृतिक सौन्दर्य की चेतना प्रमुखता से प्रकट हुई है। प्राकृतिक सौन्दर्य ने पन्त को चेतना प्रदान की । उनके प्रकृति-चित्रण में भावुकता के साथ चित्रकार की कुशलता और चातुर्य सहज ही दृष्टिगोचर होता है। संध्या सुन्दरी के आगमन का प्रस्तुत चित्र कितना भव्य प्रतीत होता है-


कहो तुम रूपसी कौन,


व्योम से उतर रही चुपचाप, सुनहला फैला केश कलाप,


छिपा निज छाया छवि में आप,


मधुर मन्थर मृदु मीना


पन्तको प्रकृति से विशेष मोह रहा इसीलिए उन्हें प्रकृति सौन्दर्य चित्रण में विशेष सफलता मिली। मनुष्य के जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं, जब सिद्धान्त और धारणाएँ नये रूप और नये आदर्शों की तरफ उन्मुख हो जाते हैं ।

पन्त के जीवन में भी परिस्थितियों के अनुसार स्वयमेव परिवर्तन आते चले गए और वे सामाजिक सौन्दर्य की भूमि पर बढ़ चले, जो लोग मंगल से सम्बद्ध है। उनकी रचनाओं 'युगान्त', 'युगवाणी' और 'ग्राम्या' में लोकमंगल तथा सामाजिक चेतना को अभिव्यक्ति मिली है। उन्होंने अपने साहित्य में दलितों, पीड़ितों और शोषितों की व्यथा को मुखर किया। इसके उपरान्त भी वे महसूस करते थे कि एक सम्पूर्ण विकसित समाज में मनुष्य को सौन्दर्य - प्रेमी और संस्कृत होना चाहिए-


संस्कृत हो सब जन, स्नेही हों, सहृदय सुन्दर संयुक्त कर्मपर हो संयुक्त विश्व निर्भर ।

राष्ट्रों से राष्ट्र मिले, देशों से देश आज, मानव से मानव हो जीवन निर्माण काज ।


पन्त की सौन्दर्य निरीक्षण की अगली प्रवृत्ति मानवीय सौन्दर्य की रही है। इसमें पन्त ने नारी सौन्दर्य को देखा और उसे उदात्त रूप में प्रस्तुत किया। नारी के ऐन्द्रीय आकर्षण का चित्रण करने के उपरान्त भी वे उसकी अन्तरात्मा की उपेक्षा नहीं करते और अपनी प्रिया के स्पर्श में अलौकिक माधुर्य-सौन्दर्य के दर्शन करते हैं-


तुम्हारे छूने में था प्राण


संग में पावन गंगास्नान तुम्हारी वाणी में कल्याणी 


त्रिवेणी की लहरों का गान ।


धीरे-धीरे किशोर और अल्हड़ कवि पन्त भावुक और चिन्तनशील हो गए और 'गुंजन' में आ कर उनकी सौन्दर्यानुभूति पूर्णतः संयत और संतुलित हो गई। 'गुंजन' और उसके बाद का समस्त काव्य इस प्रकार के मानवीय सौन्दर्य का काव्य है जिसमें कवि जीवन की कुरूपता को सुन्दर बनाता है-


हँसने ही में तो है सुख


यदि हँसने को होवे मन


भाते है दुःख में आते


मोती से आँसू के कण |


कवि पन्त की सौन्दर्य चेतना निरन्तर बदलती रही, जो आगे चलकर इतना ऊपर उठ गई कि कवि को उस विराट् सत्य और यथार्थ का प्रत्यक्षीकरण हो गया जिसकी खोज में उनके प्राण लालायित थे और वे कहते हैं-


हो गए तुम में एकाकार प्राण में तुम और तुम में प्राण ।


पन्त ने अपने काव्य में सौन्दर्य की प्रत्येक भूमि को छुआ है, उनकी प्राकृतिक सौन्दर्य चेतना सामाजिक सौन्दर्य चेतना में परिवर्तित होती है और फिर सामाजिक सौन्दर्य चेतना का स्थान मानवीय सौन्दर्य चेतना ले लेती है। अन्ततः मानवीय सौन्दर्य चेतना के स्थान पर आध्यात्मिक सौन्दर्य चेतना स्थापित हो जाती है। अतः कहा जा सकता है कि पन्त की सौन्दर्य चेतना 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' का समन्वित रूप है, जो उनके काव्य की आत्मा है।