पन्त की काव्य-कला - Pant's poetry
तुहिन बिन्दु बनकर सुन्दर
कुमुद किरण से सहज उत्तर, माँ ! तेरे प्रिय पद-पद्मों में,
अर्पण जीवन को कर दूँ ।
प्रारम्भिक होते हुए भी इस संग्रह की कविताएँ कथ्य और शिल्प की दृष्टि से प्रशंसनीय हैं। भावप्रधान होते हुए भी इस संग्रह में काव्यकला का पर्याप्त प्रस्फुटन हुआ है। इसकी पदावली सरस, भाषा सरल, प्रवाहमयी, लाक्षणिक और चित्रात्मक है। छन्द, अलंकार और प्रतीक का प्रयोग भी सहजता से हुआ है।
'ग्रन्थि' एक वियोगात्मक प्रणय काव्य है, जिसमें प्रेम का विप्रलम्भ पक्ष अत्यन्त मार्मिक और मधुर रूप प्रस्तुत किया गया है। सौन्दर्य भावना की अभिव्यक्ति,
रम्य प्रकृति-चित्रण, भावनाओं का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण, शृंगार के संयोग और वियोग पक्ष का कलात्मक चित्रण इस कृति की सफलता का प्रमुख कारण है। 'ग्रन्थि' के भावपक्ष के साथ ही कलापक्ष भी पुष्ट और विकसित है। इसकी भाषा-शैली संस्कृत पर आधारित और अलंकार से परिपूर्ण है। इसमें प्रयुक्त उपमाएँ भावपूर्ण और प्रसंगानुकूल हैं। इस गीतिकाव्य ने खड़ीबोली को संस्कृत और ब्रजभाषा की रम्यता के समकक्ष ला खड़ा किया-
हाय! मेरे सामने ही प्रणय का,
ग्रन्थि बन्धन हो गया,
वह नवमधुप सा मेरा हृदय लेकर, किसी अन्य मानस का विभूषण हो गया।
पन्त का तीसरा काव्य-संग्रह 'पल्लव' है, जो पूर्णतः प्रकृति चिन्तन का काव्य है। इस समय पन्त संस्कृत के साथ ही अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन, मनन कर परिपक्वता प्राप्त कर चुके थे और शिल्प, ध्वनि-सौन्दर्य और शैली के सम्बन्ध में उनका नवीन दृष्टिकोण विकसित हो गया था। इस संकलन में पन्त ने कल्पना, कला, चित्रात्मकता, भाषा-माधुर्य और अभिव्यंजना की प्रौढ़ता में अपने पूर्ववर्ती रचनाओं को पीछे छोड़ दिया। 'मौन निमन्त्रण', जो अत्यन्त लोकप्रिय कविता है, में प्रकृति के उपादानों के माध्यम से रहस्यमूलक भावों की व्यंजना की गई है -
स्तब्ध ज्योत्स्ना में जब संसार, चकित रहता शिशु सा नादान, विश्व के पलकों पर सुकुमार, विचरते हैं जब स्वप्न अजान, न जाने नक्षत्रों से कौन, निमन्त्रण देता मुझको मौन ।
पन्त कृत 'गुंजन' का मुख्य विषय मानव-जीवन है। इसके गीतों में पन्त की राग-विराग सम्बन्धी मान्यताओं, विश्व के प्रति संवेदना, चिन्तनशीलता, जीवन के प्रति आकर्षण को काव्यात्मक अभिव्यक्ति मिली है। इसमें भाव सौन्दर्य के साथ ही कला-सौन्दर्य भी परिष्कृत और संतुलित रूप में विद्यमान है।
इसकी भाषा भाव और कल्पना के सूक्ष्म सौन्दर्य से युक्त है। इसमें जीवन के प्रति नवीन उल्लासपूर्ण दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है -
जग के उर्वर आँगन में,
बरसो ज्योतिर्मय जीवन ! बरसो लघु लघु तृण तरु पर
हे चिर- अव्यय चिर-नूतन ।
प्रगतिवादी काल में पन्त ने लोकमंगल की प्रखर इच्छा से प्रेरित होकर अपनी रचना भूमि का पुनः संस्कार किया और उनकी चिन्तनधारा मानवतावादी भाव-भूमि के अनुसंधान में लग गई।
संवेदना, कथ्य और शिल्प सभी स्तर पर धीरे-धीरे परिवर्तन के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगे। इस काल में पन्त ने युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या जैसे काव्य-संग्रहों की रचना की। 'युगान्त' सन्धि-स्थल की रचना है, इसमें कवि कोयल से जीर्ण पुरातन के विध्वंस और नूतन के सृजन का सन्देश सुनाने के लिए कहते हैं-
गा कोकिल, बरसा पावक कण,
नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन, झरे जाति-कुल, वर्ण पर्ण घन, अन्ध नीड़ से रूढ़ि रीति छन, व्यक्ति राष्ट्र-गत राग द्वेष-रण, झरे मरें विस्मृति में तत्क्षण ।
इस काल में मानव आलम्बन बन गया और कला की अपेक्षा जीवन को महत्त्व दिया गया। अतः भाषा भी विषयानुरूप ढलते हुए महाप्राणता से युक्त हो गई परिणामस्वरूप उसकी व्यंजना शक्ति अत्यन्त सशक्त और विकसित हो गई। इस काव्य की अनेक कविताएँ भाषा और शैली की दृष्टि से गद्य की सीमा तक पहुँच गई।
'युगवाणी' में भौतिक जगत् की सत्यता में विश्वास, सामूहिक हित चिन्तन में आस्था, पूँजीवाद का विरोध, कृषकों और श्रमिकों के लिए सहानुभूति व्यक्त हुई है।
इसकी काव्यकला के बारे में स्वयं पन्त ने कहा है कि-" 'युगवाणी' में काव्यात्मकता का अभाव है प्रत्युत उसका काव्य अप्रच्छन्न, अनलंकृत तथा विचार-भावना प्रधान है।"
तुम वहन कर सको जन मन में मेरे विचार, वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार ?
'ग्राम्या' में ग्रामीण जीवन की यथार्थता और विविध समस्याओं का चित्रण किया गया है। इसमें ग्राम्य जीवन का सौन्दर्य निरूपण न होकर वहाँ की कुत्सा का वर्णन किया गया है। अतः ये कविताएँ व्यंग्यपरक हैं।
'ग्राम्या' के कला-सौन्दर्य के सन्दर्भ में दूधनाथ सिंह कहते हैं-" 'ग्राम्या' की कविताएँ पन्त के सारे प्रयासों में अप्रतिम हैं। उनकी सहजता, अनुभवगत सक्षमता और यथार्थ का गहरा, सर्वसुलभ और यथातथ्य चित्रण सहसा चकित कर देते हैं। व्यंजना की अन्यतम गहराइयों में प्रवेश करके अर्थों के अनेक दिशाएँ संगठित करने वाले कवि का अभिधा के सीधे-साधे वर्णनात्मक धरातल पर उतर आना निश्चय ही प्रशंसनीय है।"
यह तो मानव लोक नहीं रे यह है नरक अपरिचित, यह भारत का ग्राम सभ्यता, संस्कृति से निर्वासित ।
मानव दुर्गति की गाथा से ओत-प्रोत मर्मान्तक, सदियों से अत्याचारों की सूची यह रोमांचक ।
प्रस्तुत विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि इन रचनाओं में छायावादी काल जैसा सूक्ष्म और उदात्त सौन्दर्य नहीं, किन्तु फिर भी बुद्धि-रस चैतन्य प्रकाश है जो सरलता से चित्रांकन और विश्लेषण करता है। इन्हीं कविताओं के कारण कवि पन्त ने प्रगतिवाद का प्रतिनिधित्व किया। प्रगतिवाद के बाद पन्त के साहित्य में एक नवीन चेतना का उदय हुआ, जिसकी पहली किरण 'स्वर्ण किरण' है। इसमें संकलित अधिकांश कविताएँ आध्यात्मिक हैं, जो मनश्चेतना से सम्बन्धित हैं।
'स्वर्ण' शब्द को कवि ने चेतना के अर्थ में प्रयुक्त किया है। इस चेतना के द्वारा कवि ने मृत्यु में अमरता, निराशा में आशा, अपूर्णता में पूर्णता के दर्शन किये हैं और उसे नवीन अलौकिक सौन्दर्य की अनुभूति हुई है। 'स्वर्ण किरण' में नये युग-बोध का सन्देश देते हुए कवि कहते हैं -
सृजन करो नूतन मन
खोल सके जो ग्रन्थि हृदय की आँक सके जो सूक्ष्म नयन से
उठा सके संशय गुंठन,
जीवन का सौन्दर्य गहन ।
'स्वर्ण धूलि' में पन्त ने सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए, उनको सुलझा कर मानव समाज को विकसित करने का संकेत दिया है। वे मनुष्यत्व को ललकारते हुए कहते हैं -
छोड़ नहीं सकते रे यदि जन
जाति वर्ग और धर्म के लिए रक्त बहाना, तो अच्छा हो छोड़ दें अगर
बर्बरता को संस्कृति का बाना पहनाना,
हम हिन्दू मुस्लिम और ईसाई कहलाना ।
कवि पन्त के स्वर्ण-काव्य के कला-पक्ष के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि इसमें स्वतः चेतना या प्रेरणा अपने अतिशयता में रूप-विधान का अतिक्रमण करती है। इनकी शब्द-योजना में प्रस्फुटन से अधिक परिणति है । अतः इस काल की कृतियों में व्यक्त चैतन्य के फलस्वरूप कवि का कला बोध भी कहीं अधिक प्रौढ़ और परिष्कृत है।
'स्वर्ण किरण' से उद्भूत विचारधारा जो 'स्वर्ण धूलि' में विकसित हुई, 'उत्तरा' में आकर पूर्णतः पुष्ट हो गई। इस काव्य-संग्रह में उत्तरकालीन रचनाएँ संगृहीत होने के कारण इसका शीर्षक 'उत्तरा' दिया गया।
सामान्य रूप से देखने पर 'उत्तरा' में 'स्वर्ण किरण' और 'स्वर्ण धूलि' की परम्परा का आभास होता है किन्तु वास्तव में पूर्ववर्ती दोनों रचनाओं में समष्टि चिन्तन की प्रधानता है, जबकि 'उत्तरा' में कवि मानव को, मानव समाज को, संस्कृति को बदल डालने की आकांक्षा व्यक्त करता है-
यह रे भू का निर्माण काल, हँसता नवजीवन अरुणोदय
ले रही जन्म नव मानवता, आज खर्व मनुजता होगी क्षय !
'कला और बूढ़ा चाँद' कविता-संग्रह पन्त की काव्य-कला के उत्कर्ष का नया रूप है। यह काव्य स्वतः नियन्त्रित है, छन्दों के बन्धन से मुक्त है। इसका शिल्प और शैली भी अप्रतिम हैं। इसमें प्रतीकों के माध्यम से बताया गया है कि व्यक्ति का सत्य उसके भीतर है, व्यक्ति का कल्याण समाज एवं मानव कल्याण है। इस संग्रह की कविताएँ जीवनसत्य से आलोकित हैं और यह काव्य मानवता का काव्य है। 'अतिमा' में प्रकृति सम्बन्धित कविताओं के अतिरिक्त ऐसी रचनाएँ संगृहीत हैं जिनकी प्रेरणा युग-जीवन के अनेक स्वरों को स्पर्श करती हुई सृजन चेतना के नवीन रूपकों और प्रतीकों में मूर्त हुई है।
शैली की दृष्टि से इस संग्रह में किसी प्रकार की नवीनता नहीं है। इसका स्वर चिरपरिचित छायावादी स्वर है। फिर भी इसमें संगृहीत कविताएँ सुन्दर और सरस हैं।
'लोकायतन' महाकाव्य में पन्त के सौन्दर्य विषयक आदर्श, भाव-चेतना और वैचारिक विकास को समग्र रूप में देखा जा सकता है। इसमें कवि की मूल परिकल्पना है, 'लोकभूमि पर जीवन्त सांस्कृतिक महत् चेतना के निर्माण की ।' लोक जीवन के सुन्दर आयतन (घर) की परिकल्पना इस काव्य में प्रतिफलित हुई है अतः इसका 'लोकायतन' नाम प्रतीकात्मक है-
सहज प्रसन्न जननि वह जन को दे वर बरसे श्री शोभा मंगल पग पग पर महत् सत्य से प्रेरित हो मानव-उर धरा-स्वर्ग हो सुन्दर से सुन्दरतर ।
प्रस्तुत विवरण से स्पष्ट है कि पन्त की काव्य-कला निरन्तर विकासशील रही है। जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण आशावादी है। गतिशीलता में उनकी सदैव ही आस्था रही है। कवि पन्त की काव्य-कला के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि छायावादी काव्य के उपरान्त पन्त अलंकार तथा छन्द की दृष्टि से उतने सचेत नहीं रहे फिर भी उनके काव्य में कला उपकरण की दृष्टि से बिम्बों और प्रतीकों का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है। भाषा-शैली अधिकांशतः सपाट कथन-शैली अथवा वक्तव्य प्रधान शैली रही है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पन्त बिम्बवादी रुचि के चित्र केन्द्रित कला-शिल्प के कवि हैं। उनका काव्य विकसित सौन्दर्य चेतना और लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित है।
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