जनसंघर्ष, जनआन्दोलन और अस्मितामूलक विमर्श - People's struggle, people's movement and identity discussion
एक ही संविधान के नीचे
'दया' है
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम और भूख में 'नक्सलबाड़ी' है।
तनी हुई मुट्ठी का नाम
सन् 1974 में होने वाले जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान और युवा क्रान्ति का भी हिन्दी की समकालीन कविता पर स्पष्ट प्रभाव है। नागार्जुन ने इस क्रान्ति के प्रभाव में अनेक कविताएँ लिखी हैं। 'क्रान्ति सुगबुगाई हैं इसी प्रभाव की कविता है-
क्रान्ति सुगबुगाई है
करवट बदली है क्रान्ति ने मगर वह अब भी उसी तरह लेटी है एक बार इस ओर देखकर उसने फिर से फेर लिया है। अपना मुँह उसी ओर 'सम्पूर्ण क्रान्ति' और 'समग्र विप्लव' के मंजुघोष उसके कानों के अन्दर यह आज नहीं कल बतला सकूँगा।
खीज भर है या गुदगुदी
26 जून 1975 की रात में देश में आपातकाल की घोषणा हुई। आपातकाल में अनेक जनवादी विचारों के नेताओं और साहित्यकारों को झूले इल्जामों में फँसाया गया।
उन्हें जेल में डाल दिया गया। उस दौर के कई प्रगतिशील कवियों ने सरकार के इस तानाशाही कदम का पुरजोर विरोध किया। लेकिन इनमें सबसे मुखर और प्रतिरोधी काव्य स्वर नागार्जुन का था। 1975 में 'इमरजेंसी' पर 'सत्य' नामक उनकी यह कविता 'आपातकाल' की सत्यता को व्यक्त करती है-
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है उसे इमरजेंसी का शॉक लगा है
लगता है,
अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ सत्य अब पड़ा रहेगा
लोप की तरह, स्पन्दनशून्य मांसल देह की तरह ।
साठोत्तरी कविता सत्ता की तानाशाही और शोषण के खिलाफ विद्रोह और जनसंघर्ष की कविता है। यह कविता शोषित, उत्पीड़ित और श्रमरत मनुष्य के साथ खड़ी कविता है।
औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के बाद नव-औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ संघर्षरत मनुष्य की मुक्ति अकेले नहीं सामूहिकता में ही होगी।
जनसंघर्ष के समूह की ताकत को गजानन माधव मुक्तिबोध ने सही पहचाना है। 'चकमक की
चिनगारियाँ' उनकी कविता यही बया करती है-
अरे जन संग उष्मा के बिना
व्यक्तित्व के स्तर जुड़ नहीं सकते
सक्रिय वेदना की ज्योति
प्रवासी प्रेरणा के स्त्रोत सब साहाय्य उनसे लो कि तदगत लक्ष्य उनसे प्राप्त विकसते जायेंगे निज के
तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी
करने की क्रिया में से उभर ऊपर
तुम्हारे गुण
कि अपनी मुक्ति के रास्ते
अकेले में नहीं मिलते
जनता की चेतना का जाग्रत् होना एक साथ होना, संघर्ष करना और जनता के प्रतिरोध का सामूहिक स्वर जनसंघर्ष के साथ समकालीन कविता को भी संभावना से भर देता है। क्रान्तिकारी कवि आलोक धन्वा की ये काव्य पंक्तियाँ इसी संवेदना को व्यक्त करती हैं-
महसूस करने लगा है वह
अपनी पीठ पर लिखे गए सैकड़ों उपन्यासों
अपने हाथों से खोदी गई नहरों और सड़कों को
कविता की महान् संभावना है यह कि वह मामूली आदमी अपनी कृतियाँ महसूस करने लगा है।
अपनी टाँग पर टिके महानगरों और अपनी कमर पर टिकी हुई राजधानियों को
महसूस करने लगा है वह ।
पूँजीवादी समाज और लोकतन्त्र का यह अन्तर्विरोध है कि हम एक ही समय में मुक्ति की बात करते हैं। और परम्परा के जड़वादी संस्कारों को भी सँजो लेना चाहते हैं। यह बात हाशिए के समाज के प्रति हमारे किये गए व्यवहार में साफ देखी जा सकती है। वैश्वीकरण और नव-पूँजीवाद के दौर में मुक्ति के नये द्वार खुले तो वहीं शोषण की नयी बाज़ारवादी शक्ति भी उभरी। पुरुष सत्तात्मक, पूँजीवादी और सामन्ती समाज के प्रतिरोध में अस्मितामूल विमर्श का उभार हुआ।
स्त्री, दलित और आदिवासी अस्मिता का नया स्वर विकसित हुआ। साहित्य के इतिहास में वैसे तो यह चेतना अपने आरम्भिक दौर से ही मौजूद है लेकिन समकालीन दौर में यह साहित्य की मुख्य धारा के रूप में विकसित हुआ। स्त्री विमर्श में स्त्री अस्मिता का स्वर पुरुष सत्ता और बाज़ारवादी साजिशों के खिलाफ है । घर से लेकर बाहर व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं तक उत्पीड़ित नारी की मनो- संवेदना को खुद स्त्री कवियों ने बड़ी संजीदगी और ईमानदारी से व्यक्त किया है। अनामिका, कात्यायनी, निर्मला पुतुल, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी अनुराधा सिंह और ज्योति चावला की कविताओं में स्त्री संवेदना और संघर्ष को व्यक्त किया गया है।
स्त्रीत्व के अधिकार और अस्तित्व को समझने और इंसान की हैसियत पाने की आकांक्षा को अनामिका ने अपनी इस कविता में बड़ी संजीदगी से रचा है-
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं सुनो हमें अनहद की तरह
हमे कायदे से पढ़ो, एक-एक अक्षर
और समझो जैसी समझी जाती है
नयी-नयी सीखी हुई भाषा ।
दलित साहित्य का आरम्भ हिन्दी साहित्य में सन्त कविता से माना जाता है।
भक्तिकालीन सन्त कवियों ने जाति और सम्प्रदाय के भेदभाव का प्रतिरोध करते हुए प्रेम और मानवता की बात की है। कबीर, रैदास और दादू ने निम्न जाति की जनता में गौरव गर्व भरा। आधुनिक दलित कविता सन्त कविता को अपनी पूर्वज कविता मानती है। आधुनिक दलित कवियों में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराज सिंह 'बेचैन' और सूरजपाल चौहान उल्लेखनीय कवि हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता 'खेत उदास है' में दलित जीवन के दंश की अभिव्यक्ति है -
चिड़िया उदास है- जंगल के खालीपन पर बच्चे उदास हैं- भव्य अट्टालिकाओं के ठुकी चिड़िया उदास है- सिर पर तसला रखे हरिया
खिड़की दरवाजों में कील की तरह
भरपूर फसल के बाद भी
चढ़-उतर रहा है एक-एक सीढ़ी
ऊँची उठती दीवार पर लड़की उदास है-
उदारीकरण और वैश्वीकरण में उपभोक्तावाद ने आदिवासी जीवन और संस्कृति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है।
आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग-थलग कर विकास की क्रूर संस्कृति रची जा रही है । आदिवासियों को उन्हीं की ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है। अपने जीवन को बचाने और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए आदिवासी आन्दोलन और आदिवासी विमर्श ने दस्तक दी है। हिन्दी कविता में निर्मला पुतुल, अनुज लुगुन और जसिता केरकेट्टा ने पूँजीवादी शोषण और उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ सशक्त रचनाएँ की हैं। अनुज लुगुन संभावनाशील आदिवासी कवि हैं जिनकी कविता में आदिवासी जन जीवन के संघर्ष और प्रतिरोध को संजीदा ढंग से व्यक्त किया गया है।
आदिवासी नेता का पूँजीवादी ताकतों से गठजोड़ करने पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए उनका कहना है
वह कौन दैत्य जो लोहा खा जाता है।
कौन साधु है जिसके कमण्डल मे जाकर कोयला राख हो जाता है जंगल के स्वत्व का केन्द्र बना है दिल्ली या फिर राँची जहाँ से उठी घोषणाओं की हवा से जंगल के पत्ते झर जाते हैं जो सिंह की दहाड़ से भी ज्यादा खतरनाक मालूम पड़ती है
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