क्रान्ति की कविता - poem of revolution


रामधारीसिंह 'दिनकर' का काव्य-साहित्य एक व्यापक रूप लिए है। उनके विशाल काव्य साहित्य में उनकी राष्ट्रीय चेतना का एक विकासगामी रूप दिखाई देता है। स्वतन्त्रता से पहले उनकी राष्ट्रीयता में 'हुंकार' है, विद्रोह से युक्त क्रान्तिकारी स्वर है। किन्तु स्वतन्त्रता के बाद उनकी राष्ट्रीय चेतना पंचशील से युक्त और अन्तर्राष्ट्रीयता से विश्व मानवतावाद की ओर उन्मुख होती हुई, भारत-चीन युद्ध तक आते-आते पुनः एक नये मार्ग की ओर अग्रसर होती दिखाई देती है, जिसमें विद्रोह, आक्रोश और आतंक का भाव है।


गुलाम भारत में जो राजनैतिक पराधीनता, सामाजिक अवनति और आर्थिक विपन्नता आई, उसी के प्रतिरोध में दिनकर की कविता रची गई ।

परिवर्तन जब बहुत तीव्र गति से आता है तब उसे क्रान्ति कहते हैं । कवि युवावस्था के सहज आकर्षण को त्याग कर क्रान्ति के पाठ का अनुसरण करता है । दिनकर की राष्ट्रीयता गाँधीवादी चेतना की देन नहीं है बल्कि उस समय जो क्रान्तिकारी अंग्रेजों से लड़ रहे थे, वे ही दिनकर की राष्ट्रीयता और तज्जन्य क्रान्तिकारी कविताओं की जड़ है। स्वाधीनता के इच्छुक कवि को लगता है कि गाँधीवाद के युधिष्ठिरपन से देश को स्वाधीनता नहीं मिलेगी, बल्कि स्वाधीनता का मार्ग सशत्र संघर्ष का ही मार्ग है। इसी कारण 'हिमालय' कविता में कवि कहते हैं-


मेरे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उसको स्वर्ग धीर पर, फिरा हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर ।


यह वह रास्ता है जिस पर भगतसिंह तथा चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारी चल रहे थे।


क्रान्ति के पथ को कवि 'विपथगा' कहता है। यह विपथागामिनी है, किस रोज किधर से आ जाएगी, यह कोई नहीं जनता । कवि चण्डी के पौराणिक रूप का नवीनीकरण 'विपथगा' में करता है। काल-सर्पिनी के फेन उसके मस्तक के मुकुट हैं। वह चिरकुमारी है जिसके ललाट पर नित्य नवीन रुधिर का चन्दन लगाया जाता है। दृग में चिता के धूम का तिमिर अनजान संहार लपट का चीर पहन वह झूम नाचा करती है। उसकी अँगराई में भूचाल आता है और साँस लेते ही लंका के उनचास पवन चलने लगते हैं।

क्रान्ति की यह विरत कल्पना पूरे भारतीय पौराणिक कल्पना की चण्डी और भी कराल बन क्रान्ति कुमारी बन गई है। यही 'चिर कुमारी' उनकी अन्य कविताओं में भी कुमारी कहकर सम्बोधित की गई है -


खलिहानों में यह मचा करता है हाहाकार कुमारी।


'विपथगा' के वाहक हैं युवा । ये आशिक होने वाले युवा अपने भाल पर 'अनल-किरीट' धारण करते हैं। जवानी अल्हड़ और दुस्साहसी होती है। वह रक्तों से खेलती है। 'अनल-किरीट' कविता में कवि इसी अल्हड़ दुस्साहसी जवानी का वर्णन कुछ इस तरह करता है-


कर चरण विजित शृंगों पर झण्डा वही उड़ाते हैं अपनी ही उंगली पर जो खंजर की जंग छुड़ाते है।


नींद कहाँ उनकी आँखों में जो धुन के मतवाले हैं, गति की तृषा और बढ़ती पड़ते पद में जब छाले हैं।


'अनल-किरीट' अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षशील चेतना की प्रबल कविता है। 'सामधेनी' में संकलित जवानियाँ इसी युवा वेग की कविता है। युवा उमंग की व्याप्ति समस्त ब्रह्माण्ड में हो जाता है। कवि इस प्रकार का कॉस्मिक रूप का वर्णन 'जवानियाँ' में कुछ इस प्रकार करते हैं-


समस्त सूर्यलोक एक हाथ में लिए हुए दबा के पाँव चन्द्रभाल पर दिए हुए खगोल में धुन बिखेरती प्राप्त श्वास से,

भविष्य को पुकारती हुई प्रचण्ड हास से, उद्दात्त देवलोक को मही से तोलती हुई, विरत रूप विश्व को दिखा रही जवानियाँ ।


यह जवानी जब उमंग और उदातत्ता में आती है तब कवि कुछ इस प्रकार से उद्धृत करता है-


भुजंग दिग्गजों से, कूर्मराज त्रस्त कोल से,


धारा उछल उछल के बात पूछती खगोल से । कि क्या हुआ है सृष्टि को, न एक अंग शान्त है, प्रकोप रूद्र का ? कि कल्पनाश है, युगान्त है ?


इस प्रकार से जवानी ही क्रान्ति की राह पर जाति है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि दिनकर स्थान-स्थान पर वय और यौवन की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं।