खेती-किसानी से सम्बन्धित कविताएँ - poems related to agriculture
केदारनाथ अग्रवाल की कविता में सिर्फ़ किसानों के दुःख-दर्द का ही वर्णन नहीं है। किसान जीवन के दूसरे आयामों पर भी उनकी नज़र रहती है। भारतीय किसान की एक विशेषता यह है कि उसे अपने गाँव और घर से बहुत प्रेम होता है। वह अपने गाँव की मिट्टी, प्रकृति, फसल आदि से बहुत लगाव रखता है। केदार की कविता किसान के इस मनोवृति को खूब समझती है। वे अपनी एक कविता में अपने गाँव की मिट्टी और धूल के बारे में आत्मीयता से कहते हैं -
लिपट गई जो धूल पाँव से वह गोरी है इसी गाँव की जिसे उठाया नहीं किसी ने इस कुंठाव से ।
केदारनाथ अग्रवाल की इस कविता को देखकर नागार्जुन के गाँव की 'चन्दनवर्णी धूल की याद आ जाती है। लेकिन गाँव की धूल ही नहीं किसान को तो अपने खेतों से भी बहुत प्यार होता है। वह अपने खेत को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता है। अपने खेत के लिए वह मरने-मारने को भी तैयार रहता है। यहाँ तक कि मरने के बाद भी वह अपने खेत में ही जल जाना चाहता है ताकि राख बनकर अपने खेत की मिट्टी में मिल जाए। खेत के प्रति किसान के इस लगाव और जुड़ाव को देखकर केदार के मन में बिम्बमय संवेदना जगती है-
हम न रहेंगे- -
तब भी तो यह खेत रहेंगे;
इन खेतों पर घन घहराते
शेष रहेंगे;
जीवन देते,
प्यास बुझाते
माटी को मदमस्त बनाते,
श्याम बदरिया के
लहराते केश रहेंगे
भारतीय किसान का जीवन नीरस नहीं होता है। वह अपने कृषि कर्म के दौरान अपनी संस्कृति का भी विकास करता है। उसके जीवन में श्रम और सौन्दर्य ध्रुवान्त नहीं हैं बल्कि साथ-साथ कदमताल करते हैं । इसीलिए जुताई, बोआई, निराई, कटाई आदि के अवसर पर वह विशेष तरह के गीत गाता है। इन गीतों में निहित सौन्दर्य के कारण केदारजी इन अवसरों की ओर आकर्षित होते हैं। वे किसान जीवन से सम्बन्धित इन अवसरों के लिए अनेक गीतों की रचना करते हैं। अपनी एक कविता में किसान के संकल्प को गीत में पिरोते हुए वे कहते हैं-
हमारे हाथ में हल है,
हमारे हाथ में बल है,
बिना तोड़े न छोड़ेंगे.
कि हम बंजर को तोड़ेंगे- कड़ी धरती इधर भी है, कि हम उसको विदारेंगे-
कड़ी धरती उधर भी है,
न चूकेंगे न चूकेंगे।
इसी तरह खेत की जुताई होते हुए देख कर उनका कवि मन मचल उठता है और वे एक जुताई का गीत
रचते हैं-
मेरे खेत में हल चलता है
नाहर बैल जुता कँधियाये ऊँचे ऊँचे शृंग उठाये धौलागिरि से हैं मन भाए मेरे खेत में हल चलता है फाड़ कलेजा गड़ जाता है तड़-तड़ धरती तड़काता है राह बनाता बढ़ जाता है, मेरे खेत में हल चलता है
खेत की जुताई के बाद उसमे फसल की रोपाई होती है। रोपाई के कुछ समय बाद जब फसल तैयार होने लगाती है तो उसे देखकर केदार का मन फिर मचल जाता है। खेत में उस लहलहाती फसल को देखकर किसान को वैसी ही ख़ुशी होती है जैसी एक पिता को अपने पुत्र की लहलहाती जवानी देखकर होती है। केदार लहलहाती फसल को देखकर एक किसान की तरह ही खुश होते हैं और अपनी ख़ुशी और उल्लास को बिम्बमयी भाषा में अभिव्यक्त करते हैं-
आसमान की ओढ़नी ओढ़े
धानी पहने
फसल घघरिया
राधा बनकर धरती नाची,
नाचा हँसमुख
कृषक साँवरिया।
लहलहाती फसल की देख कर कवि इतना उल्लसित है कि उसे महसूस होता है मानों धरती राधा बनकर नाच रही है और उसकी छबि और नाच से उल्लसित होकर किसान भी कृष्ण की तरह नाच रहे हैं।
खेत में खड़ी पकी फसल का शृंगार, हवा के साथ उसका झूमना और लहराना, फसल के साथ हवा की टकराहट और बालियों की आपसी टकराहट से सांगीतिक सरसराहट का उत्पन्न होना किसान के हृदय को अलौकिक आनन्द से भर देता है। ऐसी ध्वनि और दृश्यमिश्रित संश्लिष्टता और आनन्द को अभिव्यक्त करने के लिए नाच जैसी संश्लिष्ट कला का रूपक ही उचित हो सकता है। कहना उचित होगा कि केदारनाथ अग्रवाल का कविकर्म किसान के मन में उठने वाले आनन्द को समुचित रूप में सम्प्रेषित करने में सफल हुआ है। लेकिन केदार सिर्फ़ नाच के दृश्य नहीं रचते हैं। फसल के पकने पर जब उसकी कटाई होती है
तो वह भी एक उत्सव की तरह किसानों के मन में उमंग और उत्साह का संचार करती है। फसल की कटाई के समय कृषक त्रियाँ कटनी का गीत गाती हैं। ऐसा ही दृश्य फसल की कटाई का भी है। केदारनाथ अग्रवाल भी फसल की कटाई को देखकर गीत लिखते हैं-
काटो काटो काटो करबी
साइत और कुसाइत क्या है जीवन से बढ़कर साइत क्या है काटो काटो काटो करबी मारो मारो मारो हँसिया हिंसा और अहिंसा क्या है
जीवन से बढ़ हिंसा क्या है
रेखांकित उचित होगा कि यह कटाई सिर्फ़ फसलों की ही नहीं है। इस कटाई में जो गुस्सा व्यक्त हुआ है। वह इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि यह कटाई किसानों के दुश्मनों यानी सामन्तवादियों की भी है। बहरहाल ! केदारनाथ अग्रवाल की कविता सिर्फ़ किसानों के दुःख-दर्द का ही वर्णन नहीं करती बल्कि वह किसान जीवन के अनेक पहलुओं को अपने दायरे में समेटती हैं। उनकी कविता किसान के उत्साह व उमंग में भी भागीदार बनती है। वे खेती से सम्बन्धित विविध पहलुओं से अपनी किसान संवेदना को समृद्ध करते हैं।
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