कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा और केशवदास - Poet Acharya teaching-tradition and Keshavdas

केशवदास रीतिकाल के प्रवर्तक कवि स्वीकार किए जाते हैं। उन्होंने एक ओर जहाँ 'कविप्रिया', 'रसिकप्रिया' जैसे रीतिग्रन्थों की रचना की है तो दूसरी ओर 'विज्ञानगीता', 'वीरसिंहदेव चरित', 'जहाँगीर जसचन्द्रिका', 'रतनबावनी' जैसे प्रबन्ध काव्यों एवं 'रामचन्द्रिका' जैसे महाकाव्य की रचना की है।


व्यक्तित्व


केशव का जन्म 1560 ई. के आसपास हुआ तथा 1601 ई. के लगभग उनका देहावसान हुआ। उनके पिता का नाम पण्डित काशीनाथ मिश्र था। अपने पिता के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा रही।

उनके वंशजों का मूल निवास स्थान ब्रज और राजस्थान के देहली डीग मार्ग पर कुम्हेर गाँव माना जाता है। उनके पूर्वज गोपाचल में राज्याश्रित रहे जिन्हें राजा रुद्रप्रताप और ओरछा नरेश ने आश्रय प्रदान किया। आचार्य केशवदास के पूर्वज संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान थे। 'कविप्रिया' में अपने कुल का परिचय देते हुए उन्होंने लिखा है-


भाषा बोलिन जानहीं जिन के कुल के दास । 

भाषा कवि भो मंदमति तेहि कुल केशवदास ॥


केशवदास भारद्वाज गोत्रीय घरबारी चतुर्वेदी ब्राह्मण थे ।

उन्होंने विधिपूर्वक अपने गृहस्थ जीवन का निर्वाह किया । ओरछा महाराज रामशाह के छोटे भाई इन्द्रजीतसिंह से कवि आचार्य केशवदास को राज्याश्रय मिला जो आजीवन बना रहा। ऐसी मान्यता है कि इन्द्रजीतसिंह के मुगल बादशाह अकबर से बढ़ते मनमुटाव को उन्होंने अत्यन्त कुशलतापूर्वक निपटा दिया। महाराजा इन्द्रजीतसिंह के लिए कवि आचार्य केशवदास सदैव कृपा व सम्मान के पात्र रहे। महाराज इन्द्रजीतसिंह के उपरान्त राजा वीरसिंहदेव ओरछा के महाराज बने । उनके शासनकाल में भी आचार्य केशवदास का सम्मान पूर्व की भाँति बना रहा। महाराजा इन्द्रजीतसिंह और राजा वीरसिंहदेव के अतिरिक्त रामशाह, रतनसेन, अमरसिंह और चन्द्रसेन ने भी उनका सदैव सम्मान किया।


आचार्यत्व


रीतिकाल के प्रतिपाद्य विषय मुख्यतः दो रहे हैं पहला, काव्यशास्त्र के नियमों का अनुशीलन तथा दूसरा, सामन्ती जीवन का सरस चित्रण केशवदास ने काव्य के शास्त्रीय पक्ष को सम्पूर्णता से ग्रहण कर लक्षण- उदाहरण परम्परा का स्थापन्न व निर्वाह किया । उन्होंने तत्युगीन भाषा में रीति ग्रन्थों की रचना कर उल्लेखनीय कार्य किया । 'कविप्रिया', 'रसिकप्रिया' और 'छन्दमाला' उनके प्रसिद्ध रीतिग्रन्थ हैं। 'कविप्रिया' में सोलह प्रभाव हैं। पहले प्रभाव में गणेश वन्दना तथा नृपवंश का वर्णन है। दूसरे प्रभाव में कवि ने अपने वंश का उल्लेख किया है।

तीसरे प्रभाव में काव्यदोष तथा गण-अगण का वर्णन मिलता है। चौथे प्रभाव में कवि भेद, कवि रीति, कवि प्रसिद्धियों का उल्लेख है। पाँचवें प्रभाव में अलंकारों के भेद हैं। नौवें प्रभाव से चौदहवें प्रभाव तक विशिष्ट अलंकारों का वर्णन है । पन्द्रहवें प्रभाव में नख-शिख वर्णन करते हुए यमक व उसके भेदों का वर्णन मिलता है। सोलहवें प्रभाव में चित्रकाव्य एवं भेदोपभेदों का उल्लेख है।


केशवदास को आचार्यत्व प्रदान करने वाला उनका दूसरा महत्त्वपूर्ण रीतिग्रन्थ 'रसिकप्रिया' है जिसमें कुल सोलह प्रकाश हैं। पहले प्रकाश में मंगलाचरण के उपरान्त शृंगार रस के दोनों भेदों का वर्णन किया गया है।

दूसरे प्रकाश में नायक के भेदों का उल्लेख है। तीसरे प्रकाश में नायिकाओं का भेद है। अगले प्रकाशों में नायक- नायिका की चेष्टाओं, भाव, विभाव, अनुभावों, स्थायी भावों, शृंगार के भेदोपभेद, मान के भेद, मान लोचन के उपाय आदि का वर्णन है। उसके बाद सखियों के भेद, सखियों के कार्य का वर्णन किया गया है। चौदहवें प्रकाश में अन्य आठ रसों का विवेचन है । पन्द्रहवें प्रकाश में अनेक वृत्तियों का वर्णन है, जबकि सोलहवें प्रकाश में काव्यदोषों का विवेचन मिलता है।


केशवदासकृत 'छन्दमाला' दो भागों में प्रकाशित ग्रन्थ है जिसमें कवियों को शास्त्रीय शिक्षा दी गई है। इस ग्रन्थ में छन्द, उनके लक्षण तथा उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं। इस कृति के पहले भाग में 77 वर्णवृत्तों का तथा दूसरे भाग में 26 मात्रावृत्तों के लक्षण उदाहरण सहित प्रस्तुत किए गए हैं। ध्यातव्य है कि राजस्थानी चित्रकारों द्वारा चित्रांकित महत्त्वपूर्ण साहित्यिक ग्रन्थों की शृंखला में आचार्य केशवदास की 'कविप्रिया' व 'रसिकप्रिया' जैसी कृतियों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं।