कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा और चिन्तामणि - Poet Acharya teaching-tradition and Chintamani

कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा की चेतना किस प्रकार रीतिकालीन व परवर्ती रचनाकारों को नये सन्दर्भों में सोचने के लिए अभिप्रेरित करती है, इसका सशक्त उदाहरण चिन्तामणि के प्रयासों में दिखाई पड़ता है। मूलतः वे एक रचनाकार थे । साहित्य सर्जना के साथ काव्यानुशीलन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का सार्थक विनियोग किया है। केशवदास की तुलना में उनकी समीक्षा शास्त्रीयता की ओर अधिक झुकी हुई प्रतीत होती है। शास्त्रीयता के साथ-साथ लोकमंगल और नीति के घटकों पर भी उनकी दृष्टि बराबर टिकी रही है। काव्य-विषयों के चुनाव में चिन्तामणि सदैव गुणपरक विषयों को ही महत्त्व देते हैं ताकि काव्य का सन्दर्भ कमजोर न होने पाए।

व्यक्तित्व


कवि आचार्य चिन्तामणि का जन्म उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जनपद में स्थित कोड़ा जहानाबाद में 1600 ई. के आस-पास हुआ। उनकी मृत्यु लगभग 1680-85 ई. के आसपास मानी जाती है। एक जनश्रुति के आधार पर उन्हें तिकवांपुर निवासी रत्नाकार त्रिपाठी का पुत्र तथा मतिराम, भूषण और जटाशंकर नामक प्रसिद्ध कवियों का सहोदर माना जाता रहा है। हालांकि, इस तथ्य की प्रामाणिकता का अभाव है। वैसे इस बात के प्रबल साक्ष्य हैं कि उन्होंने शाहजी भोंसले, शाहजहाँ और दाराशिकोह के आश्रय में रहकर अपना जीवन व्यतीत किया।


आचार्यत्व


चिन्तामणि ने काव्यांग निरूपण के विविध पक्षों को अत्यन्त गम्भीरता और निष्ठा के साथ ग्रहण किया है । उनके काव्यानुशीलन का वैशिष्ट्य इस मायने में है कि वे लक्षण देने से पूर्व प्रस्तुत सभी आधारभूत ग्रन्थों में दिए गए लक्षणों का सम्यक् विश्लेषण करने के उपरान्त ही उन्हें ग्रहण करते हैं। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों में 'रसविलास', 'छन्दविचार पिंगल', 'शृंगारमंजरी', 'कविकुलकल्पतरु', 'कृष्णचरित', 'काव्यविवेक', 'काव्यप्रकाश', 'कवित्त विचार' और 'रामायण' उल्लेखनीय हैं। 'रसविलास' में रस-विवेचन किया गया है। 'शृंगारमंजरी में नायक- नायिका भेद का वर्णन मिलता है। 'कविकुलकल्पतरु' में काव्य के दशांगों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है ।

'छन्दविचार पिंगल' में 'प्राकृतपैंगलम' तथा भट्ट केदार के 'वृत्तरत्नाकर' के आधार पर कृष्ण का चरित्र वर्णन मिलता है। सिद्धान्ततः रसवादी होने के कारण कवि आचार्य चिन्तामणि की कविताओं में शृंगार, वीर, वात्सल्य एवं भक्ति रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। भाषिक विधान की दृष्टि से उनकी रचनाएँ परिष्कृत ब्रजभाषा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।


काव्य का लक्षण और स्वरूप


चिन्तामणि ने 'कविकुलकल्पतरु' में काव्य के लक्षण इस प्रकार दिया है-


सगुनालंकार सहित दोष रहित जो होई । शब्द अर्थताको कवित्त कहत विबुध सब कोई ॥


ज्ञातव्य है कि कवि आचार्य चिन्तामणि से पहले हिन्दी के किसी आचार्य ने काव्य का शास्त्रीय लक्षण प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। अतः हिन्दी के आचार्यों में काव्य लक्षण प्रस्तुत करने का प्रथम श्रेय कवि आचार्य चिन्तामणि को प्राप्त है। यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने आचार्य विद्यानाथ के समान मम्मट- सम्मत 'अनलंकृती पुनः क्वापि' धारणा को स्थापित नहीं किया है।


काव्यपुरुष-रूपक


चिन्तामणि ने 'काव्यपुरुष' की विवेचना करते हुए शब्द और अर्थ को काव्यपुरुष का शरीर रस को उसकी आत्मा, श्लेष आदि गुणों को शौर्य आदि गुणों के समान रस रूप आत्मा के निश्छल धर्म,

उपमादि अलंकारों को हारादि के समान शब्दार्थ रूप शरीर के शोभाकारकधर्म, रीति को मानव स्वभाव और वृत्ति को मानव वृत्ति के समान उल्लिखित किया है-


सब्द अर्थ तनु वर्णिये जीवित रस जिय जानि । अलंकार हारादि से उपमादि मन आनि ॥ श्लेषादि गुन सूरतादिक से मानौ चित्त । वरनौ रीति सुभाव ज्यौं वृत्ति वृत्ति सी मित्त ॥ जे रस आगे के धरम ते गुन बरनै जात। आतम के ज्यों सूरतादिक निहचल अवदात ॥


इसी प्रकरण में चिन्तामणि काव्य के अन्य दो अंग 'शय्या' और 'पाक' की भी विवेचना करते हैं। उन्होंने 'कविकुलकल्पतरू' में लिखा है-


पद अनगुन विश्राम सो सज्जा सज्जा जांनि । रस आस्वाद भेद जे पाक पाक से मानि ॥ कवित पुरुष की साजु सब समुझ लोक की नीति ।


काव्यपुरुष विषयक विवेचन में कवि आचार्य चिन्तामणि रस को काव्य की आत्मा स्वीकार करते हैं। फिर भी वे आचार्य विश्वनाथ की भाँति 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' के रूप में काव्य का लक्षण प्रस्तुत नहीं करते हैं। मम्मट के समान उन्होंने ध्वनि-प्रकरण में ही रस का निरूपण किया है और रस को व्यंग्य पर आधारित माना है।

आचार्य विश्वनाथ से प्रभावित होकर उन्होंने शब्दार्थ, अलंकार, गुण, रीति, वृत्ति, शय्या और पाक को काव्यपुरुष के रूपक के रूप में ढालने का प्रयास किया है। जिस प्रकार शब्दार्थ, अलंकार, गुण, रीति और वृत्ति काव्यपुरुष रूपक पर सुघटित और सुसंगत होते हैं, उस प्रकार 'शय्या' और 'पाक' घटित नहीं होते। पुरुष इनका उपयोग भले ही नित्य करता है, पर शरीरादि के समान ये दोनों पुरुष के अंग नहीं माने जा सकते हैं। इसके बावजूद चिन्तामणि का काव्यपुरुष रूपक विषयक विवेचन काव्यशास्त्र के प्रारम्भिक अध्ययन एवं विश्लेषण हेतु उपयोगी व सहायक माना जा सकता है।