कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा और भिखारीदास - Poet Acharya teaching-tradition and Bhikhari Das
रीतिकाल के सर्वांग-विवेचक कवि आचार्यों में भिखारीदास अपनी पैनी आलोचनात्मक दृष्टि एवं मौलिक चिन्तनपरक काव्यांग निरूपण के लिए जाने जाते हैं। कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा में भिखारीदास पहले काव्यचिन्तक हैं जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र के आलोक में अपने पूर्ववर्ती हिन्दी काव्य का सम्यक् अध्ययन कर उसमें से तदनुरूप उदाहरणों के चयन द्वारा न केवल अपनी संग्राहक क्षमता का परिचय दिया है प्रत्युत आधुनिक हिन्दी आलोचना का शिलान्यास भी किया है। उनके काव्यांग निरूपण को समझने के लिए उनके द्वारा विरचित साहित्य का अध्ययन, चिन्तन एवं मनन आवश्यक है तथा उनके काव्यानुशीलन के समुचित मूल्यांकन के लिए उनके व्यक्तित्व को जानना भी उतना ही अनिवार्य है।
यहाँ यह तथ्य रेखांकित करना समुचित होगा कि पूर्ववर्ती कवि आचार्यों की अपेक्षा भिखारीदास कृत काव्यांग निरूपण अनेक स्थलों पर बहुत मार्मिक और सारगर्भित बन पड़ा है।
व्यक्तित्व
कवि आचार्य भिखारीदास का जन्म प्रतापगढ़ जिला (उत्तरप्रदेश) के अन्तर्गत टेंउगा नामक गाँव में हुआ। उनेक पिता का नाम कृपालदास था। कायस्थ परिवार में जन्मे आचार्य भिखारीदास को आगे चलकर संवत् 1791 से 1807 वि. तक प्रतापगढ़ के राजा पृथ्वीसिंह के भाई हिन्दूपति सिंह का राज्याश्रय मिला। केवल कवित्व ही नहीं, अपितु आचार्यत्व की दृष्टि से भी भिखारीदास का योगदान स्पृहणीय है।
आचार्यत्व
कवि आचार्य भिखारीदास के काव्य- चिन्तन में जहाँ एक ओर प्रौढ़ एवं गम्भीर आचार्यत्व के दर्शन होते हैं, वहीं साथ ही कवित्व की दृष्टि से भी उन्हें प्रथम श्रेणी के कवियों में परिगणित किया जाता है। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों में केवल निम्नलिखित सात ग्रन्थ ही उपलब्ध हैं- 'रससारांश', 'काव्यनिर्णय', 'शृंगारनिर्णय', 'छन्दोर्णवपिंगल', 'शब्दनाम कोश', 'विष्णुपुराण भाषा' और 'शतरंजशतिका'। विद्वानों ने उनकी काव्याग विषयक रचनाओं का कालखण्ड 1737-1750 ई. के बीच स्वीकार किया है।
भिखारीदास ने 'रससारांश' और 'शृंगारनिर्णय' के अन्तर्गत क्रमशः रस की अन्तर्वस्तु, उनके भेद तथा नायक-नायिका भेद का सरल व प्रभावी वर्णन किया है।
अपनी दूसरी उल्लेखनीय कृति 'काव्यनिर्णय' में उन्होंने आचार्य मम्मट, विश्वनाथ, अप्पयदीक्षित, जयदेव तथा भानु मिश्र के अतिरिक्त हिन्दी के आचार्य केशव, चिन्तामणि, तोष आदि अनेक पूर्ववर्ती रीतिकवियों का आश्रय लेकर काव्य प्रयोजन, काव्यहेतु, काव्यभाषा, उत्तमकाव्य रचयिता के लक्षण, शब्दशक्ति, ध्वनि, अलंकार, गुण, दोष, रीति आदि का गम्भीरतापूर्वक विवेचन किया हैं । संस्कृत, प्राकृत तथा ब्रजभाषा में लिखे गए छन्दोविवेचन विषयक ग्रन्थों के आधार पर वे अपनी महत्त्वपूर्ण रचना 'छन्दोर्णवपिंगल में छन्द-निरूपण अत्यन्त विस्तारपूर्वक करते हैं। यद्यपि आलोचकों की राय है कि उन्होंने जो भी कुछ कहा है, वह पूर्णरूपेण ग्राह्य नहीं है। तथापि सरस व सुबोध लक्षणों से युक्त उनका काव्य- चिन्तन उन्हें आचार्यत्व प्रदान करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
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