क्रान्ति का कवि निराला - poet of revolution unique

'निराला' डॉ० शर्मा के प्रिय कवि हैं। तुलसीदास के बाद 'निराला' को ही उन्होंने हिन्दी का सबसे बड़ा कवि माना है। उन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन की शुरूआत 'निराला' की कविताओं पर लेख लिखकर ही की थी। निराला एक प्रकार से डॉ. शर्मा के काव्य-बोध के प्रतीक हैं। निराला-साहित्य के मार्मिक प्रभाव के विवेचन और कलात्मक सौन्दर्य के उद्घाटन में डॉ. शर्मा के आलोचनात्मक संघर्ष और उनकी आलोचना- दृष्टि के उत्कर्ष को देखा जा सकता है। निराला-साहित्य के मूल्यांकन के अन्तर्गत ही उन्होंने अपनी आलोचना-दृष्टि सम्बन्धी यह मौलिक विचार प्रस्तुत किया कि सिद्धान्त का विकास व्यवहार से होता है और आलोचना का विकास सृजनात्मक साहित्य की व्यावहारिक समीक्षा से ।


डॉ. शर्मा ने अपने विवेचन में यह सिद्ध किया है कि 'निराला' की रचनात्मकता का स्रोत उनका भावबोध है और यह भावबोध उनकी विचारधारा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने 'स्वाधीनता प्राप्ति की आकांक्षा' को 'निराला' के साहित्य की मौलिक प्रेरणा माना है। 'निराला' अपने साहित्य के विभिन्न रूपों में देश को सुखी, स्वाधीन और समृद्ध देखने की आकांक्षा रखते हैं। डॉ. शर्मा बताते हैं कि भावबोध और कला की दृष्टि से निराला-साहित्य के अनेक स्तर हैं। 'निराला' की कविता का एक स्तर विशुद्ध प्रचारात्मक है जिसमें वे हिन्दी के बहुत कम पढ़े-लिखे पाठकों की राजनैतिक चेतना को निखारना चाहते हैं। यह विशुद्ध प्रचारात्मक शैली बराबर निखरती गई और आगे चलकर उसने स्वच्छ कलात्मक रूप ले लिया।

दूसरी ओर उनकी कविता में आस्था का गहरा स्पर्श परोक्ष को प्रत्यक्षवत् देखने की शक्ति और द्रष्टा की-सी तन्मयता का भाव है। हिन्दी कविता के ये गुण अन्यत्र दुर्लभ हैं।


डॉ. शर्मा के अनुसार 'निराला' की आस्था का आधार और कर्मों का लक्ष्य भारत है। उनके चिन्तन में भारत और भारती एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। इसीलिए उनमें द्रष्टा का आलोक और भक्त की विह्वलता है। हिन्दी मैं उनकी प्रथम प्रकाशित कविता 'जन्मभूमि मेरी है जगन्महारानी से लेकर उनके अन्तिम काव्य-संकलन 'सांध्यकाकली' तक की विभिन्न रचनाओं में देश-प्रेम और स्वाधीनता के भावचित्र मौजूद हैं।

निराला की भक्ति, धार्मिक आस्था और वेदान्त ज्ञान का आधार भी भारत है। डॉ. शर्मा ने लिखा है "निराला क्रान्ति के कवि हैं, उस क्रान्तिके, जिसका लक्ष्य भारत को विदेशी पराधीनता से मुक्त कराना ही नहीं, जनता के सामाजिक जीवन में मौलिक परिवर्तन करना भी है।" (- 'निराला की साहित्य साधना- द्वितीय खण्ड)


'निराला' समाज में क्रान्ति लाना चाहते हैं, भाषा और साहित्य में भी उनका यही प्रयास है। साहित्य- जगत् की यह क्रान्ति एक ओर प्राचीन रूढ़ियों का नाश करने वाली है,

वहीं दूसरी ओर यह जीवन्त साहित्यिक परम्परा की रक्षक भी है। एक ओर अपनी परम्परा के प्रति सम्मान और दूसरी ओर रीतिवादी रूढ़ियों का तीव्र 'विरोध- 'निराला' के साहित्य में हिन्दी साहित्य के इस आन्तरिक संघर्ष का पर्याप्त चित्रण मिलता है। डॉ. शर्मा के शब्दों में "निराला के मन की आशाएँ, उल्लास, विषाद, निराशा, वीरतापूर्ण कर्म, त्रास, दुःस्वप्न यह सब कुछ कहीं-न-कहीं हिन्दी के इस आन्तरिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है। निराला के बिना हिन्दी का यह संघर्ष नहीं समझा जा सकता, इस संघर्ष के बिना निराला नहीं समझे जा सकते, न व्यक्तित्व, न कृतित्व ।" (- 'निराला की साहित्य साधना द्वितीय खण्ड)


डॉ. शर्मा निराला को विश्वजनीन भावबोध और विराट् चित्रों का चितेरा कवि निरूपित करते हैं। निराला की काव्य-भाषा और शब्द योजना का विश्लेषण करते हुए डॉ. शर्मा लिखते हैं कि "निराला ने अपनी भाषा गढ़ी है, जो भाषा सुनी और पढ़ी उसका अनुसरण भी किया है। दोनों स्थितियों में उनके शब्द-संसार के अपने नियम हैं, निराला का अनौचित्य अपने इस शब्द संसार का उल्लंघन करने में है। निराला ने भाषा गढ़कर हिन्दी को नयी व्यंजना-शक्ति दी है, सुनी और पढ़ी हुई भाषा का अनुसरण करके हिन्दी की अन्तर्निहित शक्ति उद्घाटित की है।" (- 'निराला की साहित्य साधना द्वितीय खण्ड) डॉ. शर्मा ने निराला के कला-सौन्दर्य के विश्लेषण में यह दिखाया है कि निराला के शब्द-संसार में ध्वनि का शासन है,

जिसके लिए वे व्याकरण और छन्द रचना के नियम तोड़ते हैं । किन्तु इस नियम भंग से कलात्मक सौन्दर्य बढ़ता है। इस प्रकार निराला की काव्य-भाषा में विविधता के साथ-साथ विभिन्न स्तरों पर अद्भुत कलात्मकता और सर्जनात्मकता है। निराला की कला का सम्बन्ध उसके भावबोध और विचारधारा से है। छायावाद के अन्य कवियों में विचारधारा, भावबोध और कला से सम्बन्धित अन्तर्विरोध इतने स्पष्ट नहीं हैं। निराला में ये अन्तर्विरोध स्पष्ट रूप में उभर कर सामने आते हैं। डॉ. शर्मा निराला के इन अन्तर्विरोधों को उनके काव्य की विशेषताएँ बताते हुए यह स्थापित करते हैं कि निराला ने अपने अन्तर्विरोधों को पार करते हुए अपनी क्रान्तिकारी चेतना और मानवतावाद के आधार पर अपनी रचनाओं में यथार्थवाद का विकास किया है।