आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य- चिन्तन - Poetic contemplation of Acharya Ramchandra Shukla
आचार्य शुक्ल का काव्य-चिन्तन उनके रस-चिन्तन, लोकमंगलवाद सामन्तवाद-विरोध और जातीय इतिहास दृष्टि से निर्मित हुआ है। काव्य को आत्मा या अमर गतियुक्त अखण्ड तत्त्व मानने वाली काव्य सम्बन्धी भाववादी स्थापनाओं का खण्डन करते हुए शुक्ल जी दो टूक शब्दों में कहते हैं कि "काव्य को हम जीवन से अलग नहीं कर सकते। उसे हम जीवन पर मार्मिक प्रभाव डालने वाली वस्तु मानते हैं।" कविता को परिभाषित करते हुए अपने प्रसिद्ध निबन्ध 'कविता क्या है ?' में शुक्ल जी लिखते हैं कि "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है, हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।" अतः कविता मनुष्य के हृदय की वस्तु है।
उसका सम्बन्ध मनुष्य के हृदय में स्थित विभिन्न भावों या मनोविकारों से है। इतना ही नहीं, कविता मनुष्य के भावों को मनुष्यता की उच्च भूमि पर ले जाकर उनका परिष्कार भी करती है। शुक्ल जी के अनुसार "काव्य का काम मनुष्य के सब भावों और सब मनोविकारों के लिए प्रकृति के अपार क्षेत्र से आलम्बन या विषय चुनकर रखना है।" ( चिन्तामणि, दूसरा भाग) शुक्ल जी भावहीन मनुष्य को निर्जीव और निष्क्रिय मानते हैं तथा किसी एक ही भाव में डूबे मनुष्य को भी पूर्ण मनुष्य नहीं मानते। वे कहते हैं कि सब तरह के भावों की अनुभूति ही मनुष्य को पूर्ण बनाती है। उनके अनुसार भावहीनता मनुष्य को स्वार्थ और अनाचार की ओर ले जाती है।
इसलिए मनुष्य के भावक्षेत्र की रक्षा अत्यन्त आवश्यक कार्य है और कविता की आवश्यकता भी इस भावक्षेत्र की रक्षार्थ ही है। जीवन और काव्य में भावों को महत्त्वपूर्ण मानते हुए भी शुक्ल जी कोरी भावुकता के हिमायती नहीं हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य को कर्म में प्रवृत्त करना ही भावों का काम है। हृदय जब ज्ञान के साथ मिलता है तभी काव्य की नयी-नयी अर्थभूमियाँ सामने आती हैं। काव्य का लक्ष्य तो हृदय-प्रसार है लेकिन हृदय का प्रसार ज्ञान प्रसार के भीतर ही होता है। इस तरह भावों में विषय का ज्ञान, मनुष्य की सुख-दुःखात्मक अनुभूति और कर्म की प्रेरणा होती है। इसीलिए शुक्ल जी ने लोक-हृदय में लीन होने की दशा को रस दशा कहा है।
आचार्य शुक्ल जगत् को मिथ्या नहीं सत्य मानते हैं और जीवन में कविता को बहुत ऊँचा स्थान देते हैं। उनके अनुसार कविता की समस्त सामग्री इसी भौतिक जीवन और जगत् से ही उपलब्ध होती है। उन्होंने लिखा है. कि जो आँख मूँदकर काव्य का पता जगत् और जीवन से बाहर लगाने निकलते हैं वे काव्य के धोखे में, या उसके बहाने किसी और ही चीज के फेर में रहते हैं। विविधरूपा प्रकृति और लोक-जीवन उनके काव्य- चिन्तन के प्रमुख आधार हैं। उनके अनुसार काव्य का मूल तत्त्व मनुष्य के सुखदुः ख का प्रत्यक्ष और मूर्त्त चित्रण करते हुए जीवन के मर्म को छूना है। काव्य का क्षेत्र व्यष्टि से समष्टि तक विस्तृत है।
प्रकृति के विभिन्न रूपों को काव्य की विषय-वस्तु मानते हुए शुक्ल जी लिखते हैं कि "इस विश्व काव्य की रसधारा में जो थोड़ी देर के लिए निमग्न न हुआ, उसके जीवन को मरुस्थल की यात्रा ही समझना चाहिए। " कविता के क्षेत्र में लोभी और स्वार्थी लोगों का तिरस्कार करते हुए उन्होंने लिखा है कि "सच्चे कवि राजाओं की सवारी, ऐश्वर्य की सामग्री में ही सौन्दर्य नहीं ढूँढा करते। वे फूस के झोंपड़ों, धूल-मिट्टी में सने किसानों, बच्चों के मुँह में चारा डालते हुए पक्षियों, दौड़ते हुए कुत्तों और चोरी करती हुई बिल्लियों में कभी-कभी ऐसे सौन्दर्य का दर्शन करते हैं जिसकी छाया भी महलों तक नहीं पहुँच सकती।" (- 'कविता क्या है ?',
चिन्तामणि, पहला भाग) शुक्ल जी अपने काव्य प्रतिमानों की खोज इसी लौकिक संसार की वास्तविकताओं के आधार पर करते हैं। इसलिए कविता में बाह्य प्रकृति और मनुष्य की अन्तःप्रकृति में सामंजस्य स्थापित करने की बात करते हैं। शुक्ल जी साहित्य में कलात्मक सौन्दर्य के पक्षधर हैं। उनके अनुसार कविता में कही गई बात चित्र रूप में हमारे सामने आती है। यह चित्रात्मकता ही कविता का कलात्मक सौन्दर्य है । कविता का कार्य जीवन और जगत् के विभिन्न रूपों का चित्रण करते हुए मनुष्य के मनोभावों को जाग्रत करना है। इसलिए "काव्य में अर्थग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिम्बग्रहण अपेक्षित होता है। यह बिम्बग्रहण निर्दिष्ट, गोचर और मूर्त्त विषय का ही हो सकता है।" शुक्ल जी मानते हैं कि मनुष्य के भीतरी और बाहरी सौन्दर्य के साथ प्राकृतिक सौन्दर्य को मिला देने से कविता की अन्तर्वस्तु का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है।
मूल रूप में कविता की भाषा और शिल्प को शुक्ल जी अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं। भाषा तो कविता का प्राण है जो गोचर-रूपों का विधान तो करती ही है, अपनी लक्षणा शक्ति के माध्यम से अगोचर या सूक्ष्म बातों और भावनाओं को भी गोचर रूप में अभिव्यक्त करती है। 'वर्ण विन्यास' से जो 'नाद-सौन्दर्य' उत्पन्न होता है वह कविता को दीर्घजीवी बनाता है। उनके अनुसार उक्ति- वैचित्र्य कविता का एक गुण है, लेकिन कविता में स्वाभाविकता और हृदय को स्पर्श करने की क्षमता अवश्य होनी चाहिए। अलंकार को शुक्ल जी वर्ण करने की प्रणाली कहते हैं। कविता में अलंकारों का प्रयोग भावों के उत्कर्ष के साधन रूप में ही उचित है, वे स्वयं काव्य का विषय नहीं हो सकते।
कवि गोचर और मूर्त रूपों में ही अपनी बात कहता है। वह अपनी विधायक कल्पना से भावों का चित्रण करता है। जहाँ अपनी बात के मार्मिक अंशों का विवरण नहीं देता है वहाँ पाठक या श्रोता अपनी ग्राहक कल्पना सम्बन्धित मूर्ति-विधान करते हुए कविता की विषयवस्तु की अनुभूति अपने हृदय में करता है । कविता में आकर्षक मूर्ति-विधान होने पर भी यदि उसमें भाव संचार की क्षमता नहीं है तो वह काव्य नहीं है। कल्पना का एक साधन के रूप में ही महत्त्व है, वह कविता का साध्य नहीं है। शुक्ल जी कविता के साथ मनुष्य हृदय के सामंजस्य- स्थापन पर बल देते हैं- "मनुष्य समाज में रहने वाला प्राणी है। जीवन में सत् असत् की जो भावना वह प्राप्त किए रहेगा, किसी काव्य द्वारा प्राप्त अनुभूति का सामंजस्य उसके साथ वह अवश्य चाहेगा। यदि यह सामंजस्य न होगा तो उस काव्य का पूरा रसात्मक बोध वह ग्रहण न कर सकेगा। कविता वही सार्थक है जो दूसरे के हृदय में जाकर प्रकाश कर सके।" (- चिन्तामणि, दूसरा भाग )
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