मुक्तिबोध की कवि आलोचना - Poetic criticism of Muktibodh

मुक्तिबोध की दृष्टि में आलोचना का कार्य सिद्धान्तों के प्रकाश के अलावा एक सूक्ष्म कौशल का निष्पादन भी होता है। यहीं वजह है कि वे आलोचना में विनम्रता के हिमायती हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि "हम आलोचना करते समय गलतियों के लिए कम-से-कम पच्चीस-तीस प्रतिशत का हाशिया अवश्य छोड़ दें क्योंकि एक सच्चा आलोचक अन्य की आलोचना करते हुए खुद की भी निर्मम जाँच-परख करता रहता है।" उनकी दृष्टि में आलोचक साहित्य का दारोगा होता है। उनकी स्थापना है कि एक सच्चा रचनाकार अपने खुद का दुश्मन होता है। वह अपनी आत्मशक्ति को भंग करके ही लेखक बना रह सकता है। वह न तो अपनी प्रशंसा से उत्फुल्ल होता है और न आलोचना से उदास । दोनों ही स्थितियों को वह अपनी कसौटी पर कसता है।

मुक्तिबोध की व्यावहारिक आलोचना में अपने संघर्ष से अर्जित सत्य और रचना के प्रति एक सदाशय आत्मीय दृष्टि का संयोग सर्वत्र देखा जा सकता है।


जयशंकर प्रसाद


अपने 'कामायनी एक पुनर्विचार' आलोचना-ग्रन्थ में मुक्तिबोध प्रसाद-कृत कामायनी का निष्पक्ष आकलन करते हैं। यह एक कवि कथाकार का न केवल सार्थक हस्तक्षेप है अपितु विचारधारा के आलोक में अपने समय की चुनौतियों का उत्तर भी हैं। वे कहते हैं "कामायनी का जो विश्लेषण मैंने प्रस्तुत किया है,

वह एक ओर प्रसाद जी का युग तो दूसरी ओर उनका व्यक्तित्व इन दोनों की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियाओं के संघनित योग को ध्यान में रखकर ही।"


'कामायनी एक पुनर्विचार' में मुक्तिबोध स्पष्ट करते हैं कि " 'कामायनी' उस अर्थ में कथा काव्य नहीं है जिस अर्थ में 'साकेत' है। कामायनी की कथा केवल फैंटेसी है। वस्तुतः कामायनीकार के हृदय में चिरकाल से संचित जो संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ हैं, जो तीव्र दंश हैं, जो निगूढ आघात हैं, उन सबमें एक जीवन आलोचनात्मक व्याख्यान के सूत्र हैं। ये सब प्रतिक्रियाएँ, ये सब दंश और आघात जीवन-आलोचनात्मक वेदना से युक्त होकर उस फैंटेसी में प्रकट हुए हैं जिसे हम 'कामायनी' कहते हैं। "


'कामायनी' की केवल मनोवैज्ञानिक व्याख्या मुक्तिबोध को स्वीकार्य नहीं है। उनकी दृष्टि में ऐसा न केवल अपर्याप्त है, बल्कि असंगत भी है। उनके अनुसार "आलोचक का यह धर्म है कि 'कामायनी' में उपस्थित जीवन समस्या की, उस आवयविक रूप से संलग्न परिवेश-परिस्थिति की तथा इन दोनों के सम्बन्ध में कवि दृष्टि की तथा उस जीवन समस्या के कवि कृत निदान की समीक्षा करे।" 'कामायनी एक पुनर्विचार के माध्यम से मुक्तिबोध ने आलोचना धर्म का सम्यक् निर्वाह किया है।


धर्मवीर भारती


धर्मवीर भारती के ‘अन्धा युग' की विवेचना मुक्तिबोध फैंटेसी के आधार पर करते हैं । स्वतन्त्रता के बाद सामाजिक हास को वे एक वास्तविकता के तौर पर स्वीकार करते हैं,

इसलिए उन्होंने 'अन्धा युग' के रचनाकार को इसका श्रेय दिया है कि सभ्यता के इस संकट को रचनाकार ने महाभारत के कुछ पात्रों के माध्यम से अत्यन्त ही सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है। मुक्तिबोध के अनुसार धर्मवीर भारती 'अन्धा युग' के माध्यम से सभ्यता की आलोचना तो करते हैं, किन्तु समाजशास्त्रीय जिज्ञासा के अभाव के कारण उनका प्रयास छायावादी प्रतीत होने लगता है। डॉ. देवराज की तरह मुक्तिबोध को भी 'अन्धा युग' के सन्दर्भ में 'कामायनी' की याद आती है।


लेकिन उन्होंने यह दृढतापूर्वक स्वीकार किया है कि 'कामायनी' की आलोचना एक दार्शनिक की समीक्षा- बुद्धि प्रकट करती है जबकि धर्मवीर भारती दार्शनिक नहीं हैं और सभ्यता की उनकी आलोचना (अन्धा युग) उनके उत्पीड़ित विवेक का विस्फोट है।

हिन्दी काव्यालोचना में 'अन्धा युग' के सम्बन्ध में मुक्तिबोध की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जहाँ एक ओर रामविलास शर्मा जैसे प्रतिष्ठित आलोचक 'अन्धा युग' को नौटंकी कहकर खारिज करने का प्रयास करते हैं, वहीं दूसरी ओर कवि आलोचक मुक्तिबोध 'अन्धा युग' को एक मूल्यवान् और महत्त्वपूर्ण कृति मानकर उस पर व्यापक विमर्श का आह्वान करते हैं।


भारतभूषण अग्रवाल


भारतभूषण अग्रवाल की कविताओं 'ओ प्रस्तुत मन', '59 की परिमल' आदि पर मुक्तिबोध की प्रतिक्रिया है कि "उनकी कविताएँ सन्तोष नहीं,

असन्तोष उत्पन्न करती हैं जिसे पढ़कर मन किसी ज्ञात-अज्ञात अधूरेपन की भावना से भर जाता है।" लेकिन मुक्तिबोध इस अधूरेपन की भावना का सम्बन्ध जीवन जगत् की सम्पूर्णता और व्यक्तित्व विकास की बाधाओं से सम्बन्धित मानते हैं न कि भारतभूषण अग्रवाल की काव्यकला से ।


भारतभूषण अग्रवाल की अनेक कविताओं को मुक्तिबोध अपनी प्रकृति में आत्मसमीक्षात्मक स्वीकार करते हैं। लेकिन उनकी कविताओं में आत्मसमीक्षा के स्वरूप पर विचार करते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि "किन्तु इस समीक्षा में दिल में उठते हुए धुएँ का रंग नहीं,

अपने के धोखों में न रखने की सफाई है।" यही वजह है कि उनकी कविताओं में जीवन की आलोचना का अभाव नहीं है।


भारतभूषण अग्रवाल की कविताओं में मुक्तिबोध द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर मध्यमवर्गीय भावना के विकास को रेखांकित करते हैं, इसलिए वे इसके ऐतिहासिक मूल्य की बात भी स्वीकार करते हैं। मुक्तिबोध ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि "ऐसा कहना शायद कवि की तारीफ समझा जाएगा। लेकिन इसमें तारीफ वारीफ कुछ नहीं ।"


रामधारी सिंह 'दिनकर'


रामधारी सिंह दिनकर की 'उर्वशी' पर मुक्तिबोध के दो निबन्ध बहुचर्चित हैं। एक निबन्ध में वे 'उर्वशी' के मनोवैज्ञानिक आधार पर विवेचन करते हैं तथा दूसरे निबन्ध में उसके काव्य और दर्शन पर ।

'उर्वशी' के मनोवैज्ञानिक आधार को मुक्तिबोध 'कामात्मक मनोविज्ञान' कहकर उसकी आलोचना करते हैं, क्योंकि वह एक स्वस्थ और स्वाभाविक शृंगार की श्रेणी से बाहर चला गया है। उनके अनुसार " 'उर्वशी' में कोई रोमांटिक उन्मेष, शृंगार की ताजगी तथा स्फूर्ति नहीं है। इसके विपरीत उसमें बासी फूलों का सड़ापन है।" सामाजिक अर्थ में वह एक पश्चगामी काव्य है। इतना होने के बावजूद 'उर्वशी' सम्बन्धी विवाद में मुक्तिबोध भगवतशरण उपाध्याय के साथ खड़े नहीं होते हैं, क्योंकि उनकी आलोचना को वे 'बाहर से भीतर की ओर यात्रा' कहते हैं जिसके अपने खतरे हैं। चूँकि, मुक्तिबोध अपनी आलोचना में लेखकों के मित्र और शत्रु जैसे दो वर्ग बनाकर नहीं चलते, इसलिए सुमित्रानन्दन पंत


मुक्तिबोध के अनुसार सुमित्रानन्दन पंत दार्शनिक कुण्ठाओं से मुक्त कवि हैं। वे मुक्त मन और मुक्त दृश्य से वास्तव से समागम करने में सफल हुए हैं। मुक्तिबोध उनके काव्य को वास्तववादी विस्तार के तौर पर उद्घाटित करने का प्रयास करते हैं "उनका मार्क्सवाद जन-गण के प्रति उनकी सहज सहानुभूति का ही वास्तववादी विस्तार है। हालाँकि, उनकी विचारात्मकता में जीवन-मर्म की भरपूर उपस्थिति के बावजूद जब तब उनके काव्य सौन्दर्य पर आघात करता है।"


त्रिलोचन


मुक्तिबोध की दृष्टि में त्रिलोचन शान्त भाव से अपनी बात कहने वाले कवि हैं। वे चीख पुकार या अट्टहास से बचने की कोशिश करते हैं।

मुक्तिबोध ने त्रिलोचन के 'धरती' की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि "इस लेख में मैंने 'धरती' का परिचय देने की कोशिश की है। छद्य काव्य का सम्पूर्ण अभाव जिसमें हो, उसे ही तो मौलिक ईमानदारी कहना चाहिए। मेरा विश्वास है कि 'धरती' का हिन्दी में उचित आदर होगा।" भाषा के सुपरिष्कृत रूप और स्वन की गीतात्मकता की दृष्टि से मुक्तिबोध त्रिलोचन को निराला से जोड़कर देखते हैं। जीवन के विस्तृत दायरे के विभिन्न भागों का काव्यात्मक आकलन करने की क्षमता के कारण वे खुले मन से त्रिलोचन की प्रशंसा करते हैं। कवि के रूप में त्रिलोचन के संयम, गहरा आत्मविश्वास और सामाजिक लक्ष्य के प्रति उनकी ईमानदारी से भी मुक्तिबोध गहरे प्रभावित होते हैं।