काव्य निरूपण - poetic expression

काव्य निरूपण - poetic expression


हिन्दी की शास्त्रीय परम्परा संस्कृत काव्यशास्त्र पर आधारित है। इसी से रीतिकालीन कवियों पर संस्कृत के आचार्यों का प्रभाव देखा जाता है। केशवदास पर भी संस्कृत के आचार्यों का प्रभाव परिलक्षित होता है। वे मूलतः अलंकारवादी आचार्य स्वीकार किए जाते हैं। विषय की व्यापकता, विस्तृत शास्त्रीय आधार, गम्भीर चिन्तन, मौलिक उद्भावना प्रवृत्ति, आत्मविश्वास और साहस, सुबोध एवं स्पष्ट निरूपण शैली, सहृदयता आदि विशेषताएँ केशवदास की वैयक्तिक विशिष्टताएँ हैं। काव्य का स्वरूप, लक्षण, काव्य हेतु, काव्य प्रयोजन सम्बन्धी अनुशीलन में रीति-निरूपण की अन्तः प्रवृत्तियाँ सहज ही उनके कर्म में विद्यमान हैं।


काव्य का स्वरूप और लक्षण


यद्यपि आचार्य केशवदास ने काव्य का शास्त्रीय लक्षण प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कहीं भी प्रस्तुत नहीं किया है, तथापि काव्य को 'दोषरहित' बनाने की ओर उनका संकेत अवश्य मिलता है। 'कविप्रिया' में उन्होंने लिखा है-


राजतरंच न दोष युक्त कविता वनितामित्र ।


हालाँकि, उनका यह विचार मम्मट द्वारा प्रस्तुत काव्य लक्षण का केवल एक और वह भी निषेधात्मक अंग उपस्थित करता है। अतः आलोचनात्मक सन्दर्भ में इसे काव्य का लक्षण स्वीकार नहीं किया जा सकता है।


काव्य हेतु


संस्कृत काव्य-चिन्तकों में दण्डी, वामन, रुद्रट, कुन्तक और मम्मट आदि ने काव्य हेतुओं का व्यापक निरूपण किया है। हिन्दी साहित्य में रीतिकाल से पूर्व भी काव्यशास्त्रीय विवेचन की शुरूआत होने के बावजूद 'काव्य हेतु' का व्यवस्थित विकासक्रम रीतिकाल से माना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी आचार्यों में कुलपति मिश्र से पहले किसी भी आचार्य ने 'काव्य हेतुओं' का स्पष्टतः निरूपण नहीं किया है । आचार्य केशवदास का काव्य हेतु विषयक विवेचन उनके रीतिग्रन्थों में प्रत्यक्ष ढंग से नहीं मिलता। वे काव्य प्रतिभा,

कला व विचार तीनों ही क्षेत्र में शक्ति के साथ संचरण करने में अपने पूर्ववर्ती संस्कृत काव्यचिन्तकों का अनुसरण मात्र करते प्रतीत होते हैं। उन्होंने अपने काव्यानुशीलन को देश, काल और पात्र के अनुरूप भाषा, अलंकार, रस तथा भावों की परिपुष्ट ढंग से अभिव्यक्त करने तथा काव्य हेतुओं के निहितार्थ भाव-भाषा दोनों को ही प्रभावशाली बनाने में अपनी विशिष्टता दर्शायी है।


काव्य प्रयोजन


प्राचीन रचनाकार रचना के आरम्भ में ही मंगलाचरण के उपरान्त प्रायः अपने काव्य-प्रयोजनों को सुनिर्दिष्ट करने की महती परम्परा का अनुपालन करते रहे हैं। संस्कृत के काव्य विचारकों का अनुसरण करते हुए हिन्दी के प्रमुख कवि आचार्यों ने भी इसी परिपाटी का अनुपालन किया है। काव्य प्रयोजन को लेकर कवि आचार्य केशवदास ने परोक्ष ढंग से विचार किया है। उन्होंने आनन्द प्राप्ति को काव्य प्रयोजन स्वीकार किया है। उदाहरण के तौर पर 'रसिकप्रिया' की निम्नलिखित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-


रसिकन को रसिक प्रिया, कीन्हीं केशवदास ।