काव्य बिम्ब - poetic image

आधुनिक काव्यालोचना के अन्तर्गत बिम्ब को कविता का एक आवश्यक उपकरण माना गया है। लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि बिम्ब एक आवश्यक उपकरण ही है, आलोचना का एकमात्र प्रतिमान नहीं। वैसे तो काव्यगत बिम्ब अपने आप में एक बहुत व्यापक शब्द है और आधुनिक हिन्दी काव्यालोचना के अन्तर्गत उसका प्रयोग प्रायः अंग्रेजी शब्द 'इमेज' के पर्याय के रूप में किया जाता है।

रूप, चित्र, प्रतिमा, मूर्ति अन्य शब्द हैं जो यथावसर बिम्ब के स्थानापन्न बनकर समीक्षा क्षेत्र के अन्तर्गत आते रहते हैं। फिर भी इन शब्दों में अर्थ की वह व्यापकता अथवा विस्तार नहीं है जो बिम्ब शब्द में है। कहना गलत न होगा कि काव्यगत बिम्ब कविता के प्रतिपाद्य को, उसके भावों को, उसके अर्थ को और उसके समूचे परिवेश को पूरी प्राभाविक क्षमता के साथ हमारे समक्ष उपस्थित करते हैं। और इस तरह कविता के प्रभाव को दीर्घकाल तक के लिए स्थिर रखते हैं। विजयदेवनारायण साही के विचारों से भी ऐसा ही लगता है कि बिम्ब नयी (काव्य) सर्जना का एक आवश्यक उपकरण है और इसके महत्त्व को नकारा भी नहीं जा सकता है।


बिम्ब मूलतः भावाश्रित होते हैं, इसलिए कविता में (अगर वह कविता है) तो महत्त्व मूलभाव का ही होगा, न कि उससे प्रकाशित करने वाले उपकरण का। चाहे वह उपकरण कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो। शायद यही वजह है कि साही बिम्ब विधान में भी अनुभूति व उसके महत्त्व को ही बार-बार रेखांकित करने की कोशिश करते हैं। शमशेर की कविताओं का विवेचन करते हुए वे कहते हैं कि बिम्बों में विविधता के बावजूद शमशेर की अनुभूति जड़ है और उसमें कोई भी फैलाव, परिवर्तन या विकास नहीं आ पाया है।