काव्य यात्रा - poetic journey

पन्त एक विकासशील कवि हैं। उनकी कविता का स्वर और स्वरूप समय के साथ निरन्तर परिवर्तनशील रहा है। उन्होंने युग की सीमाओं में बँधकर और तत्कालीन विचारधाराओं को अपनाकर काव्य-सृजन किया। परिणामस्वरूप उनकी सृजनात्मक प्रतिभा का निरन्तर विकास होता रहा। उनकी प्रारम्भिक कविताएँ छायावादी काल की हैं, जो प्रकृति सौन्दर्य से ओतप्रोत हैं। किन्तु बाद में उन्होंने प्रगतिवाद का पथ अपना लिया और अपने साहित्य के माध्यम से गरीबों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की । आगे चलकर अरविन्द दर्शन के प्रभावस्वरूप उन्होंने अन्तश्चेतनावादी कविताओं का सृजन किया। पन्त के काव्य का चौथा चरण नवमानवतावादी कविता का है,

जिसमें उन्होंने लोकचेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए नवमानवता का सन्देश सुनाया। पन्त की काव्य-यात्रा के विविध सोपानों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- 


प्रथम चरण छायावादी युग (1918-1934 ई.)


पन्त की काव्य-यात्रा का प्रथम चरण सौन्दर्यवादी युग रहा, जिसका प्रमुख लक्ष्य प्रकृति ही रही। पन्त ने स्वयं माना है कि - "कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है।"

इस काल में उनकी चार कृतियाँ प्रकाश में आई वीणा, ग्रन्थि, पल्लव और गुंजन इन सभी रचनाओं में प्रकृति सौन्दर्य के प्रति प्रेम किसी न किसी रूप में दिखलाई पड़ता है। पन्त को प्रकृति से इतना प्रेम रहा कि प्रकृति से परे सोचना उनके लिए असम्भव था इसलिए वे कहते हैं-


छोड़ डुमों की मृदु छाया । तोड़ प्रकृति से भी माया । बाले ! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन ?


द्वितीय चरण : प्रगतिवादी युग (1935-1945 ई.)


पन्त की काव्य-यात्रा का दूसरा चरण प्रगतिवादी विचारधारा से युक्त है।

इस समय में पन्त पर गाँधीजी का विशेष प्रभाव पड़ा और उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। इस काल में पन्त ने सौन्दर्य भावना को अनुपयोगी मानते हुए 'सुन्दरम्' से 'शिवम्' की भूमि पर पदार्पण किया। इस काल की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं- युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या । इन रचनाओं में कवि ने प्राचीन और पुरातन मान्यताओं के प्रति तीव्र विरोध प्रकट किया तथा नूतन विचारों और नवजागरण के लिए नवीन क्रान्ति का समर्थन किया। 'युगान्त' की प्रस्तुत पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-


द्रुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र !


हे स्रस्त-ध्वस्त! हे शुष्क शीर्ण !


हिम-ताप-पीत मधुवात-भीत तुम जड़, पुराचीन !!


तृतीय चरण : अन्तश्चेतनावादी युग (1946-1948 ई.)


पन्त की काव्य यात्रा के तीसरे चरण को अन्तश्चेतनावादी युग के नाम से जाना जाता है। इस अवधि में पन्त को ऐसा प्रतीत होने लगा कि भौतिकवाद और अध्यात्म के समन्वय से ही मानव-कल्याण सम्भव है

और यह समन्वय उन्हें अरविन्द दर्शन में प्राप्त हुआ। इस काल की प्रमुख रचनाएँ 'स्वर्ण-किरण', 'स्वर्ण-धूलि' हैं। पन्त ने यह माना कि मानव जाति का कल्याण मात्र अर्थोपार्जन से नहीं वरन् मन और कर्म के समन्वय से सांस्कृतिक उत्थान करने से है। इसके लिए प्रत्येक मानव को अपने अन्तःकरण में तप, संयम, श्रद्धा, आस्तिकता के भावों को स्थान देना चाहिए-


फिर श्रद्धा विश्वास प्रेम से


मानव अन्तर हो अन्तः संयमित । संयम तप की सुन्दरता से जग जीवन शतदल दिक् प्रहसित । व्यक्ति विश्व में व्यापक समता हो जन के भीतर से स्थापित । मानव के देवत्व से ग्रथित जन समाज जीवन हो निर्मित ॥


नवमानवतावादी युग (1949 ई. से अन्त समय तक)


पन्त के काव्य के क्रमिक विकास का चतुर्थ चरण मानवतावादी युग है। इस काल की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं- उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, अतिमा, लोकायतन, चिदम्बरा, अभिषेकिता और समाधिता । ये सभी रचनाएँ मानवता को उन्नत बनाने के लिए दिए गए सन्देशों से युक्त हैं। इनमें पन्त की चेतना मानवतावाद विशेषकर विश्व मानवतावाद की ओर प्रवृत्त हुई है और उन्होंने लोकमंगल के लिए व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य को महत्त्व दिया है-


हमें विश्व संस्कृति ये भू पर करनी आज प्रतिष्ठित मनुष्यत्व के नव द्रव्यों से मानस-उर कर निर्मित ।


प्रस्तुत विवरण से स्पष्ट है कि पन्त की काव्य-यात्रा या उनके वैचारिक धरातल में जितने परिवर्तन हुए, उतने किसी अन्य कवि में नहीं। उनका काव्य प्रारम्भिक सौन्दर्य भावना के युग से नवमानवतावादी युग की यात्रा कर आया है। इस यात्रा में कई पड़ाव आए। साधना पथ पर अग्रसर पन्त ने अपनी प्रतिभा, कल्पना और अनुभूति के माध्यम से जो काव्य-सृजन किया, उसमें युग का स्पन्दन और अनुभूति है । उनकी काव्य-यात्रा मानवता के विकास की यात्रा है।