काव्यभाषा - poetic language

सफल कवि वही होता है जो अपनी काव्यानुभूति और अभिव्यक्ति के अनुरूप भाषा और शिल्प का निर्माण करने में सक्षम होता है। इस दृष्टि से मुक्तिबोध एक सफल सृजक कवि हैं। उनकी काव्यभाषा काव्यानुभूति के अनुरूप ही विकसित हुई है। उनकी भाषा में सर्वत्र उनके व्यक्तित्व का प्रभाव परिलक्षित होता है। लीक से हटकर चलने वाले मुक्तिबोध की भाषा परम्पराओं और व्याकरण पर निर्भर नहीं है । शमशेर बहादुर सिंह के शब्दों मैं- "हफ्तों बल्कि महीनों वे (मुक्तिबोध) अपनी लम्बी कविता के टुकड़ों को धीरे-धीरे चिन्तन और कल्पना की ऊर्जा से पुष्ट करते, जोड़ते और बढ़ाते और उसकी अन्तर्योजनाओं को दृढ़ करते जाते ।" स्पष्ट है कि वे अपनी भाषा के प्रति अत्यन्त सजग थे।


मुक्तिबोध की काव्यभाषा विभिन्न शब्दावली का मिश्रित रूप है। जिस भाव, विचार या कथन के लिए जो भाषा उचित रही उसी के अनुरूप भाषा बदलती रही। उन्होंने अपनी काव्यभाषा में तत्सम तद्भव, देशज, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी सभी प्रकार के शब्दों को सहजता से ग्रहण कर प्रयोग किया है। डॉ. ललिता अरोड़ा के शब्दों में "उनकी भाषा कभी संस्कृतनिष्ठ सामाजिक पदावली की अलंकृत वीथिका से गुजरती है तो कभी अरबी, फ़ारसी तथा उर्दू के नाज़ुक लचीले हाथों को थाम कर चलती हैं, कभी अंग्रेजी की इलेक्ट्रिक ट्रेन पर बैठकर जल्दी से खटाखटाक् निकल जाती है और कभी विशाल जनसमूह के शोरगुल और धक्के-मुक्के के बीच एक-एक पर तीव्र दृष्टि डालती हुई रुक-रुक कर चलती है।

मुक्तिबोध ने अपनी नयी चेतना की अभिव्यक्ति के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया, उसमें स्पष्ट रूप से मुक्तिबोधपन है।"


मुक्तिबोध ने अपनी भाषा की शक्ति को बढ़ाने के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों का बड़ा संतुलित प्रयोग किया है। उनके द्वारा प्रयुक्त मुहावरे सम्प्रेषणीयता के गुण से युक्त होने के साथ नवीन अर्थों की व्यंजना भी करते हैं । नारायण मौर्य के शब्दों में "मुक्तिबोध की काव्यभाषा की बहुत बड़ी शक्ति है, 'मुहावरों का प्रयोग । इतना सटीक और सहज अर्थ देने वाले मुहावरों का प्रयोग आधुनिक हिन्दी काव्य में कम हुआ है। यह मुहावरे अपने आप में एक इकाई से लगते हैं।" उनके काव्य में हमें मुहावरों का पूरा भण्डार मिलता है। कुछ मुहावरे इस प्रकार हैं- सूली पर टाँगना, राह लेना, घर लिया जाना, पंगु होना दाना चुगना, दरवाजे खुलना, तितर-बितर होना आदि । ये मुहावरे उनकी अभिव्यक्ति को यथार्थ और सार्थक रूप में स्पष्ट करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं।


इस प्रकार हम देखते हैं कि मुक्तिबोध का काव्य-शिल्प विभिन्न विशेषताओं से युक्त है। उनके द्वारा शिल्प के क्षेत्र में फैंटेसी, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार, छन्द, भाषा के अन्तर्गत विभिन्न सार्थक प्रयोगों ने हिन्दी साहित्य जगत् मैं उनकी विशिष्ट पहचान बनाई और वे आगामी रचनाकारों के लिए प्रेरणा-स्रोत बने ।