काव्य भाषा - poetic language

काव्यभाषा के प्रश्न पर अज्ञेय ने पृथक् से विचार व्यक्त नहीं किया है, किन्तु भाषा के सम्बन्ध में वे दैव सजग रहे हैं। काव्य या कलाओं के माध्यम की चर्चा करते हुए उन्होंने एक स्थल पर भाषा के विषय में अपने तर्कपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं। अज्ञेय इस बात के पक्ष में नहीं हैं कि बोलचाल की भाषा और सर्जनात्मक भाषा में कोई अन्तर रहे। इसे वे एक बुनियादी भूल मानते हैं। उनके अनुसार "भाषा का संस्कार वही होता है जो इतना गहरा हो जाए कि लिखते समय ही नहीं, स्वप्न देखते समय भी यह प्रश्न उठे कि भाषा सही है या नहीं। सही भाषा जब सहज भाषा हो जाय, तभी वह वास्तव में सही है।"


अज्ञेय सैद्धान्तिक रूप से इस धारणा के समर्थक हैं कि वही भाषा भाषा है जो अधिकाधिक बोधगम्य हो किन्तु साथ ही बदले हुए सन्दर्भों में आज के कवि के द्वारा प्रयुक्त भाषा के प्रति वे एक उदार दृष्टिकोण रखने का आग्रह भी करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे समझते हैं कि आज का रचनाकार एक बड़ी समस्या से त्रस्त होकर उससे जूझ रहा है और वह भाषा को फिर से एक नया व्यापकत्व देना चाहता है, शब्दों में नया अर्थ भरना चाहता है । ऐसी स्थिति में आज के रचनाकार की सर्जना का मूल्यांकन करते हुए उसके भाषा प्रयोगों के मामलों में समीक्षक तथा सहृदय दोनों को उसकी विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेने चाहिए।