काव्य व कला - poetry and art
जयशंकर प्रसाद कविकर्म को एक आध्यात्मिक कर्म के रूप में व्याख्यायित करते हैं। पाश्चात्य काव्य विचारकों की भाँति वे काव्य व कला को एक नहीं मानते हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार उन्होंने कला को उपविद्या स्वीकार किया है जो बुद्धिवाद की प्रधानता सूचित करती है और उसका सम्बन्ध विज्ञान से अधिक घनिष्ठ होता है । उदाहरण के तौर पर स्कन्दगुप्त नाटक में मातृगुप्त कहता है कि "कवित्व-वर्णमय चित्र है जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अन्धकार का आलोक से असत् का सत् से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से सम्बन्ध कौन कराती है ? कविता ही न ?"
स्पष्ट है कि आलोच्य सन्दर्भ में प्रसाद ने कविता को सृष्टि के परस्पर विरोधी तत्त्वों में सम्बन्ध स्थापित करने वाली सत्ता के रूप में मान्यता दी है। उनकी यह परिभाषा साहित्यिक कम आध्यात्मिक और दार्शनिक अधिक है। फिर भी इस परिभाषा में काव्य-रचना के अन्तर्गत अनुभूति की केन्द्रीयता को तो स्वीकार किया ही गया है।
काव्य की जो परिभाषा जयशंकर प्रसाद ने 'काव्य कला तथा अन्य निबन्ध' नामक कृति में प्रस्तुत की है, वह बहुचर्चित भी है और अधिक मान्य भी प्रसाद ने कहा है कि "काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति हैं,
जिसका सम्बन्ध विश्लेषण, विकल्प या विज्ञान से नहीं है। वह एक श्रेयमयी प्रेय रचनात्मक ज्ञानधारा है। आत्मा की मनन शक्ति की वह असाधारण अवस्था, जो श्रेय सत्य को उसके मूल चारुत्व में सहसा ग्रहण कर लेती है, काव्य में संकल्पनात्मक अनुभूति कही जा सकती है।"
प्रसाद की काव्यसम्बन्धी परिभाषा पर टिप्पणी करते हुए आचार्य भगीरथ मिश्र का कहना है- "प्रसाद की परिभाषा केवल व्यक्तिगत दृष्टिकोण ही स्पष्ट करती है। उन्होंने प्रश्न उठाया है कि काव्य केवल अनुभूति मात्र ही नहीं होता। दूसरी बात अनुभूति केवल संकल्पनात्मक होती है।
अतएव इस परिभाषा में संकल्पनात्मक शब्द एक अतिरिक्त शब्द है। तीसरे श्रेयमयी प्रेय ज्ञानधारा भी सदैव काव्य नहीं हो सकती।" उनके विचार से श्रेयमयी प्रेय अनुभूति धारा ही काव्य हो सकती है। वास्तव में आचार्य मिश्र की यह टिप्पणी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि उन्होंने प्रसाद की मूल स्वच्छन्दतावादी चेतना को भुलाकर उनकी परिभाषा की समीक्षा की है। आचार्य मिश्र के शास्त्रीय काव्य संस्कार भी उनके द्वारा की जाने वाली समीक्षा को तटस्थ और निष्पक्ष नहीं बना सके हैं। स्वच्छन्दतावादी समीक्षा के प्रधान आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने प्रसाद की परिभाषा को मार्मिक कहा है। डॉ॰ विनयमोहन शर्मा ने प्रसाद की इस परिभाषा का सम्बन्ध आंग्ल रोमांटिक युग के कवियों के विचारकों, विशेषतः ब्लैक और कॉलरिज के विचारों से जोड़ा है। किन्तु सत्य यह है कि प्रसाद की परिभाषा के भारतीय दर्शन का आधार ही है। मूल में
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