कविता और समाज - poetry and society
कविता और समाज - poetry and society
मुक्तिबोध के अनुसार किसी भी साहित्य को तीन प्रकार से देखा जाना चाहिए एक तो, वह किन स्रोतों से उद्गत होता है, अर्थात् किन वास्तविकताओं के परिणामस्वरूप वह साहित्य उत्पन्न हुआ है। दूसरे, उसका कलात्मक प्रभाव क्या है, और तीसरे, उसकी अन्तः प्रकृति, रूप-रचना कैसी है। हिन्दी की पूर्ववर्ती समीक्षाओं में कविता का मूल्यांकन करते समय उसकी सामाजिक सन्दर्भता पर ध्यान दिया गया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और स्वच्छन्दतावादी समीक्षकों ने भी सामाजिक सन्दर्भता को महत्त्वपूर्ण माना है। किन्तु मुक्तिबोध के काव्य-चिन्तन में कविता के मूल्यांकन का यह प्रतिमान अपनी सम्पूर्ण वैज्ञानिकता के साथ एक प्रमुख प्रतिमान बनकर सामने उपस्थित होता है।
उनके यहाँ कविता और समाज के बीच किस प्रकार के जटिल सम्बन्ध होते हैं, उनका गहराई में किया गया विवेचन उपलब्ध होता है। मुक्तिबोध कविता को विशुद्ध सामाजिक भौतिक जीवन की उपज मानकर उसकी सामाजिक सन्दर्भता को एक मुख्य कसौटी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए मुक्तिबोध का काव्य-चिन्तन कविता की मूल्यवत्ता की परख हेतु पूर्ववर्ती दृष्टियों की तुलना में विशिष्ट है। उनके अनुसार "मूल्यांकनकारी शक्ति के रूप में लेखक की जीवन दृष्टि जीवन प्रसंग की उद्भावना से लेकर रचना के अन्तिम सम्पादन तक सक्रिय रहती है। इस विश्वदृष्टि का कोई वर्गीय स्वरूप भी होता है या नहीं। इसका सामाजिक आधार भी तो कुछ-न-कुछ होना ही चाहिए।"
मुक्तिबोध मुक्त कण्ठ से यह स्वीकार करते हैं कि "हमारी आत्मा में जो कुछ है, वह सब इसी समाज का दिया हुआ है। जिसे लोगों ने व्यक्ति और समाज का विरोध कहा है, वह मूलतः समाज का अन्तर्विरोध है। इसमें समाज के भीतर ही एक प्रवृत्ति दूसरी प्रवृत्ति से टकरा रही होती है। इस टकराहट में आप किन प्रवृत्तियों के साथ तदाकार हैं, यह महत्त्वपूर्ण है।" कविता तथा सामाजिक जीवन की अभिन्नता के इस स्वरूप पर बल देने के कारण ही कविता के मूल्यांकन के लिए मुक्तिबोध रचनाकार की सामाजिक सन्दर्भता की परख तथा पहचान को एक अनिवार्य शर्त मानते हैं।
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