अ-कविता : आन्दोलन की पृष्ठभूमि, स्वरूप एवं विकास - A-Poetry: Background, form and development of the movement


साठोत्तरी काव्यान्दोलनों में सर्वाधिक चर्चित और तुलनात्मक दृष्टि से प्रभावी माना गया आन्दोलन 'अ-कविता' है। सन् 1963 में जगदीश चतुर्वेदी ने 'प्रारम्भ' नामक काव्य-संकलन का प्रकाशन किया। इसके साथ ही नयी कविता से स्वयं को अलगाने का प्रयास सबसे पहले उभरकर आया। दिल्ली से प्रकाशित इस काव्य-संकलन में चौदह कवियों को सम्मिलित किया गया था जिनके नाम इस प्रकार हैं- जगदीश चतुर्वेदी, कैलाश बाजपेयी, राजकमल चौधरी, श्याम परमार, विष्णुचन्द्र शर्मा, नरेन्द्र धीर, केशु, ममता अग्रवाल, श्याम मोहन, मनमोहिनी, रमेश गौड़, राजीव सक्सेना, स्नेहमयी चौधरी और नर्मदाप्रसाद त्रिपाठी ।


प्रस्तुत संकलन चार भागों में विभक्त था 'नस्लहीन नगर और अंधे लोग', 'कमज़ोर आवाज़ें और छटपटाते हाथ', 'आकाश के बाजुओं में' और 'सिलहुटी रूपाभास और अनजान रागनियाँ' । जगदीश चतुर्वेदी 'प्रारम्भ' की विशेषता और कवि चयन की कसौटी को लेकर लिखते हैं- "इसमें वही कवि सम्मिलित किये गए हैं। जिनमें आधुनिकता के प्रति सहज आग्रह है और जो अपने कविधर्म के प्रति सजग तथा सचेत हैं । "


अ-कविता आन्दोलन की पृष्ठभूमि 


'प्रारम्भ' की आवश्यकता और नवीनता को जगदीश चतुर्वेदी ने कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया है- "अभी तक नयी कविता का मूल्यांकन केवल सप्तकों तथा पिछले दशक में प्रकाशित कुछ कविता संकलनों के आधार पर किया जाता रहा है।

किन्तु सत्य यह है कि आधुनिक जीवन के विभिन्न स्तरों को छूनेवाली कवि दृष्टि इधर पाँच- सात वर्षों से ही दिखाई दे रही है।"" नयी कविता के कई कवि 'प्रारम्भ' में जगदीश चतुर्वेदी के साथ पाये जाते हैं। अतः जिस काव्य-दृष्टि (जो 'इधर पाँच-सात वर्षों से ही दिखाई देने') की बात की गई वह केवल आत्मोन्मुख सेक्स भावना से पूरित प्रतीत होती है-


रात का उजड़ा हुआ निश्वास


सो गया है


मैथुनों में र


भग्न आँखों में उलूकों के


राजकमल चौधरी की पंक्तियाँ भी लगभग ऐसी ही सेक्स भावना का उद्घाटन करती हैं-


स्त्री कभी नग्न नहीं होती है। अपनी त्वचा में ढकी हुई उजाले में सोती है


इस बानगी के अलावा अ-कविता में अनगिनत ऐसे उदाहरण हैं जिनमें नयी काव्य-दृष्टि का तो खैर पता नहीं पर, नारी की देह और मैथुन से जुड़ी तमाम कुण्ठाएँ खुलकर सामने आयी हैं।


सन् 1966 में 'अकविता' पत्रिका के प्रकाशित हो जाने के पश्चात् अ-कविता आन्दोलन अधिक प्रबल हुआ | अबकी बार श्याम परमार के नेतृत्व में इसे विस्तार मिलने लगा । आरम्भ में गिरिजाकुमार माथुर, भारतभूषण अग्रवाल जैसे हस्ताक्षर भी अ-कविता से जुड़े थे किन्तु धीरे-धीरे श्याम परमार समेत सौमित्र मोहन, जगदीश चतुर्वेदी, मोना गुलाटी आदि कविगण अकविता में अधिक सक्रिय रहे। सन् 1967 में जबलपुर की 'कृति-परिचय' के सम्पादक ललित कुमार श्रीवास्तव ने भी 'अकविता' शीर्षक से ही एक काव्यांक प्रकाशित किया ।

गोविन्द राय के सम्पादकत्व में ग्वालियर से 'अकविता' नाम से एक पत्रिका निकाली गई जिसकी सम्पादक सलाहकार समिति में रमेश कुंतल मेघ, राजीव सक्सेना, रणजीत आदि प्रगतिशील कवि शामिल थे।


इन पत्रिकाओं में सामाजिक, राजनैतिक समझ व उत्तरदायित्व का भाव लगभग नदारद था। अपनी क्षुब्धता की अभिव्यक्ति कर निषेध के स्वर को बलवान् बनाना इनका उद्देश्य प्रतीत होता है। इस उद्देश्य की सार्थकता उभरने से पहले ही 'अकविता' में नारी देह का उबकाई भरा चित्रण स्पष्ट होने लगा। बावजूद इसके ऐसी अलग-अलग पत्रिकाओं और कवियों ने 'अकविता' शब्द के साथ विशिष्ट रूपाकारवाली कविता को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।


अ-कविता : स्वरूप एवं विकास


'एंटी पोएट्री' की तर्ज पर 'अकविता' कहलाये गए इस काव्यान्दोलन को लेकर उसके प्रमुख हस्ताक्षर श्याम परमार ने कुछ अपने तर्क प्रस्तुत किए। उनके मतानुसार-


1. अकविता स्थितिपरक संतुलित स्तर की कविता है।


ii. अकविता की नियति अकेलेपन की नियति नहीं है, बल्कि विकृत सम्बन्धों की नियति है। iii. अकविता वस्तुतः कविता के ऊबे हुए लोगों की अभिवृत्ति है। यह ऊब नैराश्यजाया नहीं, न ही ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया है जिन्हें 'आइडेंटिटी' की आवश्यकता है।

नैराश्य अब स्वभाव बन गया है।


iv. अकविता अन्तर्विरोधों की अन्वेषक कविता है।


V. अकविता अवाक् मन की प्रक्रिया नहीं है।


vi. अकविता स्वाभाविक कविता की दिशा है।


श्याम परमार की दृष्टि से अ-कविता का उद्भव तथा उपस्थिति सर्वथा औचित्यपूर्ण है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए वे बड़ी सहजता के साथ अ-कविता को 'नयी कविता' से भिन्न सिद्ध करते हैं- "सोचने पर 'कविता' और 'नयी कविता' साधारण शब्द प्रतीत होते हैं। कविता में 'अ' जोड़ने से उक्त दोनों शब्दों के बासीपन से मुक्ति मिलती है।"5


अ-कविता से जुड़े लोग स्वयं अ-कविता को लेकर अलग-अलग मान्यताएँ रखते पाए जाते हैं। यथा, जहाँ श्याम परमार प्रस्तुत काव्यान्दोलन को न निषेध का आन्दोलन मानते हैं न ही उस पर कोई विदेशी प्रभाव स्वीकारते हैं, वहीं जगदीश चतुर्वेदी स्पष्ट कहते हैं- "इंग्लैंड के एंग्री यंग मैनों की तरह एक क्षुब्धता आज के हिन्दी कवियों में है । इस अभिनव काव्य-संकलन में कदाचित् प्रथम बार हिन्दी के क्षुब्ध पीढ़ी के कवि एक स्थान पर संगृहीत हैं।"" ग्वालियर से निकली 'अकविता' के सम्पादक गोविन्द राय का मानना है "अकविता तनाव और फ्रस्टेशन की काव्य-परिणति है, जिसे मोटी-मोटी तनख्वाह पाने वाले अपने अनुसार ढाल लेना चाहते थे।

इनकी इसी प्रवृत्ति ने अकविता के सम्बन्ध में भ्रम फैला दिए हैं।"" भले ही यह कथन सत्य हो, (या असत्य हो या फिर अर्द्धसत्य हो) 'अकविता' के कविगणों ने अपने विषय में फैलते भ्रमों का निराकरण करने की अपेक्षा इन्हें इतना अधिक बढ़ाया कि अ-कविता की मूल तस्वीर ही धुंधलाती गई। जिन-जिन मतों या टिप्पणियों के माध्यम से अ-कविता की तस्वीर प्रस्तुत की गई थी, वे मत स्वतः निष्प्रभ से होते गए। अ-कविता ने स्वयं को 'अन्तर्विरोधों की अन्वेषक' कविता घोषित किया था किन्तु जिन सामाजिक, राजनैतिकादि अन्तर्विरोधों की पड़ताल करने में पूर्ववर्ती कविता चूक गई थी, ऐसे किसी अन्तर्विरोध पर अकविता के अन्तर्गत लेखनी नहीं चलाई गई।

जिस अ- कविता को 'स्वभाविक कविता की दिशा' माना गया, वह अ-कविता अपनी सारी स्वाभाविकता, दिशा आदि को केवल स्त्री देह के उटपटांग चित्रण तक सीमित करती चली गई। श्याम परमार के मतानुसार अ-कविता से जुड़े कविगणों को आइडेंटिटी की आवश्यकता नहीं है। जबकि सत्य यह प्रतीत होता है कि समूचे अकविता आन्दोलन के पीछे आइडेंटिटी क्राइसेस ही कार्यरत है।


चूहा, बिल्ली, कुत्ता,


लकड़बग्घा, भैंसा, गाय, सुअर,


हाथी, शेर, रीछ, गेंडा, बारहसिंगा, तीतर, बटेर, कबूतर, बकरा, ऊँट, गधा, घोड़ा और मैं


साँप, बिच्छू, अजगर,


श्याम परमार के अनुसार अ-कविता स्थितिपरक संतुलित स्तर की कविता है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि हॉरर या मृत्यु जैसी बातें अकवियों को विक्षुब्ध नहीं करतीं । अव्यवस्था, विसंगति, मूल्यहीनता, विरोधाभास और आदर्शों का अकाल आदि बातें उन्हें संवेदनशील और करुण नहीं बनातीं। मात्र इतना ही नहीं, श्याम परमार आगे कहते हैं कि अकवि के लिए जीवन-दर्शन की मान्यताओं का कोई अर्थ शेष नहीं बचा है। यह और ऐसी कितनी ही बातें अ-कविता की संकल्पना स्पष्ट करते हुए कही गई। इनके परिपार्श्व में अ-कविता की लक्ष्यहीनता और दिशाभ्रष्टता अधिक खुलकर सामने आती है। बहुत स्वाभाविक रूप से कुछ प्रश्न उभर आते हैं कि जिस मूल्यहीनता के कारण कवि लेखनी उठाने के लिए विवश होता है,

वह मूल्यहीनता यदि कवि के लिए कोई मायने नहीं रखती या उसे आन्दोलित नहीं करती तो कवि आखिर लिख क्यों रहा है और किसके लिए लिख रहा है ? यदि अकारण लिख रहा है और किसी विशिष्ट तक अपना स्वीकार अस्वीकार पहुँचाने हेतु नहीं लिख रहा है तो उसका सम्पूर्ण लेखन ही व्यर्थ सिद्ध होता है। यदि अकवि नैराश्य को अपना स्वभाव बना चुका है और उसकी कविता, कविता के ऊबे हुए लोगों की अभिवृत्ति मात्र है तो कवि और कविता को लेकर बनी समस्त धारणाएँ स्वतः ही ध्वस्त हो जाती हैं।


अ-कविता आन्दोलन इसी प्रकार की अस्तव्यस्तताओं से भरा पड़ा है। इसमें बुझे-थके स्वयं घोषित कवियों की वह जमात शामिल है जो व्यापक लोककल्याण और समाजोपकार के भाव से पूरी तरह उचटी हुई है। इनकी लेखनी ऊब, निराशा घूम-फिरकर स्त्री के अंग-प्रत्यंग का बीभत्सता भरा वर्णन करने में ही सार्थकता का अनुभव करती है। नग्नता, भौंडापन और सेक्स के स्तरहीन चित्र अ-कविता की एकमात्र उपलब्धि मानी जा सकती है। इस सन्दर्भ में डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय का एक कथन द्रष्टव्य है- "यौन चित्रों की बीभत्सता इस कविता में इतनी अधिक है कि विक्टोरियन नैतिकता के लोग तो उसे अपठनीय घोषित कर देंगे मगर नव समृद्ध वर्ग में ही नहीं,

सारे उच्च और मध्यमवर्ग में यौनतृष्णा अत्यन्त प्रबल है जो समाज के भय के कारण अँधेरे, उजालों में पूरी निर्लज्जता से प्रकट है। स्वयं अकवि की स्थिति भी यही है। "१


देह की राजनीति में लिप्त अ-कविता कई अच्छे कवियों को निगल गई। कई कवि, जिनमें भविष्य की उज्ज्वल संभावनाएं निहित थीं, अ-कविता की देहलिप्त कविता के भँवर में ऐसे फँसे कि निकल ही न पाए।


सन् 1963 में 'प्रारम्भ' से जो काव्यान्दोलन प्रारम्भ हुआ था, वह सन् 1973 में जगदीश चतुर्वेदी द्वारा प्रकाशित 'निषेध' के साथ समाप्त भी हो गया। कुल जमा 9-10 वर्ष के अपने जीवन-काल में अ-कविता आन्दोलन हिन्दी कविता को तत्कालीन घोषणाबाजी के अलावा कुछ भी न दे पाया।