चिन्तामणि के अनुसार काव्य भेद - Poetry differences according to Chintamani

चिन्तामणि के अनुसार काव्य के दो भेद हैं- गद्य और पद्य । 'कविकुलकल्पतरु' में उन्होंने लिखा है-


गद्य-पद्य है भ्रान्ति सो सुबरनी में होई।


आचार्य विद्यानाथ से अभिप्रेरित होकर वे गद्य-पद्यमय चम्पू नामक भेद का भी उल्लेख करते हैं। हिन्दी साहित्य में पद्यबद्ध रचना अत्यन्त मनमोहक मानी जाती है। कवि आचार्य चिन्तामणि ने भी पद्यबद्ध रचनाओं के आलोक में सहज ही स्वीकार किया है कि-


छन्द निबद्ध सुपद्य कहि गद्य होत बिन छन्द। भाषा छन्द निबद्ध सुनि सुकवि होत आनन्द ॥


शब्दशक्ति निरूपण


कवि आचार्य चिन्तामणि ने 'कविकुलकल्पतरु' के 'शब्दार्थ निरूपण' पंचम प्रकरण में शब्दशक्ति की विवेचना प्रस्तुत की है। इस प्रकरण में 22 दोहे और 02 कवित्त हैं। शब्दशक्ति निरूपण में उन्होंने आधार-ग्रन्थ के रूप में 'काव्यप्रकाश' व साहित्यदर्पण' का अनुसरण किया है। पद और अर्थ को व्याख्यायित करते हुए वे कहते हैं-


पद वाचक अरु लाक्षणिक व्यंजक त्रिविध बखान। वाच्य लक्ष्य अरु व्यंग्य पुनिअर्थो तीनि प्रान ॥


वाचक, लक्षक और व्यंजक नामक तीन पदों में से वे व्यंजक पद का लक्षण प्रस्तुत नहीं करते हैं। लक्षक पद के लक्षण में मम्मट सम्मत लक्षण की व्याख्या निरूपित करते हैं-


लक्षण ताको कहत जो होत लक्षणा जुक्त ।


आलोच्य सन्दर्भ में मम्मट का विचार अवलोकनीय है- -


तद्भूर्लाक्षणिकः ।


(- काव्य प्रकाश)


चिन्तामणि वाचक पद के स्वरूप की व्याख्या निषेधात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं-


बिन अन्तर जा शब्द कर जाको होत बखान ।


शब्दशक्ति निरूपण में चिन्तामणि अभिघा, लक्षणा और व्यंजना नामक शब्दशक्तियों में से केवल लक्षणा और व्यंजना पर प्रकाश डालते हैं।

अभिधा शक्ति पर उनके विचार उपलब्ध नहीं हैं। वे लक्षणा शक्ति के भेदोपभेदों की चर्चा भी नहीं करते हैं। लक्षणा शक्ति के स्वरूप निर्धारण में वे तीन महत्त्वपूर्ण तत्त्वों यानी मुख्यार्थ बाधा, मुख्यार्थ से सम्बन्ध और रूढ़िगतता अथवा प्रयोजनगतता को अनिवार्य स्वीकार करते हैं. -


मुख्यारथ के बाध अरु जोग लक्षना होइ।


होत प्रयोजन पाइ कै कहूँ रूढ़ि हित सोइ ॥ गंगघोषक है तहाँ होत तीर को बोध । सीतलता रु पवित्रता तहाँ प्रयोजन सोध ॥


व्यंजना शक्ति निरूपण में आचार्य मम्मट प्रस्तुत लक्षण की अपेक्षा आचार्य विश्वनाथ प्रस्तुत लक्षण सरल,

स्पष्ट और बोधपरक है। यही वजह है कि व्यंजना शक्ति के निरूपण में चिन्तामणि आचार्य विश्वनाथ का अनुकरण करते प्रतीत होते हैं। उनके अनुसार अभिधा और लक्षणा वृत्तियों के विरत हो जाने पर जिस शक्ति से अन्य अर्थ की प्रतीति होती है, वह व्यंजना शक्ति कहलाती है-


जहाँ अभिधा और अरु लक्षणा अति कछु भिन्न प्रकार । होड़ अर्थ को बोध तहँ कवि व्यंजक व्यापार ॥


व्यंजना शक्ति का निरूपण करते हुए उन्होंने 'शाब्दी' और 'आर्थी' व्यंजना शक्ति के दो स्वीकार किए हैं।

उन्होंने 'शाब्दी' अभिव्यंजना के दो भेदों लक्षणामूला और अभिधामूला की विवेचना भी की - है । यद्यपि आचार्य विश्वनाथ का अनुसरण करते हुए भी वे 'लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना' की धारणा को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर पाते हैं। मुख्य भेद


आचार्य मम्मट की स्थापना है कि अभिधामूला व्यंजना के द्वारा अनेकार्थक शब्द के उस अर्थ की भी प्रतीति होती है जो संयोगादि पन्द्रह कारणों में से किसी एक के द्वारा अवाच्य घोषित हो जाता है। आचार्य मम्मट के इस विचार को कवि आचार्य चिन्तामणि 'कविकुलकल्पतरु' में इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं-


शब्द अनेकारथ वरनि अति कछु भिन्न प्रकार । होइ संजोगादिक गमन इत अवाच्य को सार ॥ तह व्यंजना वृत्ति हुती यह मम्मट तत्त्व है जानि । शक्ति, नियन्त्रित रीति । एक अर्थ में और की व्यंजन ते परतीति ॥


संयोगादि के अनुक्रम में चिन्तामणि द्वारा प्रस्तुत सभी उदाहरण प्रायः आचार्य मम्मट के ही उदाहरणों के रूपान्तरण मात्र हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-


शंख चक्र जुत हरि भजे शंख चक्र करि आनि । राम लषण दसरथ तनय साहचर्य ते जानि ॥


आचार्य मम्मट जैसे काव्य विचारक ने आर्थी व्यंजना का विषय वहाँ स्वीकार किया है जहाँ व्यंग्यार्थ की प्रतीति वक्ता, बोद्धव्य, काकु, वाक्य, वाच्य, अन्यव सन्निधि, प्रस्ताव, देश, काल तथा चेष्टा आदि में से किसी एक वैशिष्ट्य के कारण होती है। लेकिन चिन्तामणि आर्थी व्यंजना का लक्षण प्रस्तुत नहीं करते हैं तथापि वे मम्मट- सम्मत दस विशिष्टताओं में से केवल प्रथम विशिष्टता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं -


ग्रीषम में सरवर वापी कूप सूखे सब, जल नदी झिरना ते आवतु नगर मै। जहाँ जात आवत लगत काँट, झारन के, हौं न जैहों हौं ही पानी पीवति हौं घर मैं ।।

अति छू ही ते भरी गागरि लै आवति हौं, छूटत पसीना कंपै अंग थर-थर मै। वाहति हौ पुनि सासु ननद झुकै न मो पै, जाऊँगी तो आऊँगी भरि दुपहर मै ॥


सारांशतः आचार्य चिन्तामणि शब्दशक्ति निरूपण के निहितार्थ केवल स्थूल प्रसंगों का प्रतिपादन करते प्रतीत होते हैं। काव्य समीक्षकों की दृष्टि में उनका शब्दशक्ति निरूपण कुछ सीमा तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। शब्द और अर्थ की पारस्परिक सहकारिता सम्बन्धी उनका विवेचन भी एकांगी व अस्पष्ट लगता है। फिर भी शब्दशक्ति जैसे गम्भीर विषय पर प्रकाश डालने का उनका प्रयास परवर्ती विचारकों के लिए उपयोगी माना जा सकता है।


ध्वनि निरूपण


आचार्य चिन्तामणि ध्वनि के लक्षण, उसके भेदोपभेद तथा भेदों के स्वरूप निर्धारण हेतु 'काव्यप्रकाश' को आधारग्रन्थ के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन रसध्वनि के निरूपणार्थ नायक-नायिका भेद का समावेश करते समय वे आचार्य विश्वनाथ का अनुकरण करते हैं। उनके मतानुसार वाच्य और लक्ष्य अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति का नाम ही ध्वनि है। काव्य के तीन प्रकारों उत्तम, मध्यम और अधम में से ध्वनि काव्य को उत्तम काव्य के रूप में स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है-


उत्तम व्यंग प्रधान गन।


ध्वनि को परिभाषित करते हुए आचार्य चिन्तामणि 'कविकुलकल्पतरु' में लिखते हैं-


वाच्य लक्ष ते भिन्न जे कवित्त सुनो ते अर्थ । भासे ते सब व्यंग कहि वरनत सु कवि समर्थ ॥


ध्वनि के दो भेद अविवक्षितवाच्य और विवक्षितवाच्य स्वीकार करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि जहाँ वक्ता की इच्छा वाच्य अर्थ में प्रकट न हो वहाँ अविवक्षितवाच्य ध्वनि होती है -


वक्ता की इच्छा न जहं वाच्य अर्थ में होइ । सो अविवक्षितवाच्य वाच्य है, कहत सकल कवि लोइ ॥


विवक्षितवाच्य का निरूपण करते हुए उन्होंने यह मत व्यक्त किया है कि जहाँ वाच्य अर्थ विवक्षित रहता हुआ भी अन्य (व्यंग्य) अर्थ का बोधक हो, वहाँ विवक्षित वाच्य ध्वनि होती है.


वाच्य अर्थ सुविवक्षिता वाच्य द्विविध पहिचानि ।


लक्ष्य अलक्ष्य क्रमानि सो व्यंग सुमन में आनि ॥


सरलता और स्पष्टता की दृष्टि से आचार्य चिन्तामणि का ध्वनि निरूपण उल्लेखनीय है। क्योंकि वे ध्वनि भेद और उनके स्वरूप का आख्यान शास्त्र सम्मत व समर्थ शैली में प्रतिपादित करते हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण भी सरस व शास्त्र अनुमोदित हैं। उन्होंने असंलक्ष्यक्रम-व्यंग्य यानी रस ध्वनि को ध्वनि प्रकरण के अन्त में स्थान दिया है।

उनके ध्वनि-निरूपण में रस का ध्वनि के एक अंग-रूप में परिगणन सम्भव हो जाता है। साथ ही उसका महत्त्व भी प्रतिपादित होता है।


आचार्य चिन्तामणि ने एक ओर जहाँ रस ध्वनि को ध्वनि-प्रकरण में निरूपित करके रस को ध्वनि का अंग स्वीकार किया है और ध्वनि काव्य को 'उत्तम काव्य' की संज्ञा प्रदान की है, तो वहीं दूसरी ओर रस को काव्य का 'जीवन' कहते हुए शब्दार्थ, अलंकार आदि काव्यांगों को उसका साधन स्वीकार किया है। रसमय वाक्यों को उन्होंने 'काव्य' की संज्ञा प्रदान की है। 'कविकुलकल्पतरु' में इसका उल्लेख करते हुए वे कहते हैं- -


बात कहाउ रस मैजु है कवित्त कहावै सोइ ।


कतिपय परस्पर विरोधी अवधारणाओं के होते हुए भी आचार्य चिन्तामणि की प्रवृत्ति रस की ओर झुकी हुई प्रतीत होती है।


रस और ध्वनि की प्रमुखता सम्बन्धी समस्या प्रारम्भ से ही जटिल रही है। ध्वनि को काव्य की आत्मा मानने वाले आचार्य आनन्दवर्द्धन ने भी अलंकार, गुण, रीति, दोष आदि के स्वरूप निर्धारण के लिए रस को केन्द्र मानकर प्रकारान्तर से रस ध्वनि की ही प्रमुखता सिद्ध की है। आगे चलकर आचार्य विश्वनाथ आदि ने ध्वनि को उत्तम काव्य कहते हुए भी रस को ही काव्य की आत्मा माना है। चिन्तामणि ने रस को ध्वनि का अंग मानते हुए भी जहाँ एक ओर आनन्दवर्द्धन के समान इसे विभिन्न काव्यांगों का साध्य माना है,

तो दूसरी ओर आचार्य विश्वनाथ की भाँति इसे जीवन यानी आत्मा कहकर गौरवपूर्ण पद से विभूषित किया है। इससे इनकी रसास्वाद की प्रवृत्ति के साथ ही सारग्राहिणी वृत्ति और समन्वय भावना का परिचय मिलता है।



सारांशतः चिन्तामणि के ध्वनि प्रकरण में यद्यपि किसी नवीन धारणा का उल्लेख नहीं मिलता है और सम्पूर्ण विषय सामग्री 'काव्यप्रकाश' पर आधारित प्रतीत होती है, तथापि हिन्दी भाषा में ध्वनि-भेद जैसे जटिल प्रसंग को सर्वप्रथम सरल, सहज और व्यवस्थित रूप में प्रतिपादित करने का श्रेय उन्हें अवश्य दिया जा सकता है।