भारतेन्दुयुगीन नवचेतना का काव्य - Poetry of Indian New Consciousness

भारतेन्दु-युग से पहले लोकोन्मुख भक्ति आन्दोलन की काव्य-धारा और दरबारी संस्कृति की रीतिकालीन काव्य-धारा हिन्दी साहित्य में प्रकट हो चुकी थी। भारतेन्दु-युग में इन दोनों धाराओं का प्रभाव देखा जा सकता है। इस युग के काव्य में दरबारी संस्कृति और नवीन चेतना का संघर्ष सबसे तीव्र दिखाई देता है। भारतेन्दु के काव्य का विवेचन डॉ. शर्मा ने इन शब्दों में किया है- "भारतेन्दु की गद्य रचना और नाटकों के कारण उनका कविरूप कुछ दब-सा गया है। लेकिन वह बहुत ही सरस और गेय कवि हैं। उनमें 'लिरिकल' कवियों की सी आत्माभिव्यक्ति है, वह लक्षण ग्रन्थ देखकर काव्य रचने वालों की तरह कविता में अपना व्यक्तित्व ओट में नहीं रखते । एक तरफ उनके प्रकृति के सूक्ष्म संवेदन, रूप, गन्ध, स्पर्श पर उनकी सहज आसक्ति उन्हें हिन्दी की रोमांटिक कविता का अग्रदूत बना देती है,
तो दूसरी तरफ उनकी देशभक्ति और समाज-सुधार की कविताएँ उन्हें राष्ट्रीय परम्परा के सूत्रधार के रूप में सामने लाती हैं।" (- 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और भारतीय नवजागरण की समस्याएँ) भारतेन्दु-युग के कवियों में भारतेन्दु के अलावा प्रतापनारायण मिश्र और 'प्रेमघन' की कविताओं का मूल्यांकन डॉ. शर्मा ने विशेष रूप से किया है। उन्होंने इस युग की कविता में मौजूद राष्ट्रीय चेतना और जन- जागृति को रेखांकित किया है और सामाजिक असंगतियों को उजागर करने में इन कवियों के योगदान का महत्त्व बताया है। उन्होंने दिखाया है कि जन-साहित्य की रचना करते समय इन कवियों की कविताएँ सदैव हमारे लिए एक आदर्श और प्रेरणा का कार्य करेगी।