मुक्तिबोध का काव्य-शिल्प - poetry of salvation

काव्य-शिल्प से तात्पर्य होता है, 'कविता को प्रस्तुत करने का ढंग' अर्थात् प्रस्तुतीकरण प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया काव्य में प्रयुक्त शैली, बिम्ब, प्रतीक, मिथक, छन्द, अलंकार और भाषा आदि विषय-वस्तुओं पर निर्भर करती है। हिन्दी काव्य में फैंटेसी शिल्प के प्रवर्तक मुक्तिबोध का काव्य फैंटेसी का काव्य है, जिसमें सामान्य यथार्थ के सम्प्रेषण के लिए फैंटेसी को माध्यम बनाया जाता है। उन्होंने बाहरी यथार्थ के प्रभावस्वरूप हृदय में होने वाली प्रतिक्रिया में कल्पना का योग कर अद्भुत और रोमांचक चित्र प्रस्तुत किये हैं। अंग्रेजी कवि टी.एस. इलियट के विषय में कहा जाता है कि उनका काव्य उस कक्ष की भाँति है जिसमें अनेक दर्पण विभिन्न पंक्तियों में सजा कर रखे गए हैं। यही कथन मुक्तिबोध के काव्य पर भी पूर्णत: चरितार्थ होता है। उनके काव्य-शिल्प की शैली फैंटेसी के सन्दर्भ में पूर्व में विस्तार से जानकारी दी जा चुकी है, अन्य तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है-


बिम्ब-विधान


'बिम्ब' शब्द अंग्रेजी के इमेज (Image) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है, जिसका अर्थ है, 'मूर्त रूप प्रदान करना।' साहित्य जगत् में बिम्ब वह शब्दचित्र है जो कल्पना द्वारा आन्तरिक अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है । कविता में बिम्ब का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि इसी के आधार पर सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति सहजता से हो पाती है। मुक्तिबोध का समस्त काव्य बिम्बमय है। वे एक सशक्त बिम्ब उठाते हैं और फिर बाद में बिम्ब पर बिम्ब आते चले जाते हैं परिणामस्वरूप पाठक की आँखों के समक्ष संश्लिष्ट चित्रों का निर्माण होने लगता है ।


बिम्ब-विधान में मुक्तिबोध अद्वितीय हैं, उनकी काव्यानुभूति सार्थक बिम्बों के माध्यम से प्रखर अभिव्यक्ति पाती है।

बिम्ब कवि की अनुभूति की संश्लिष्टता के साथ उसके शिल्प कौशल का भी प्रमाण होता है। मुक्तिबोध के काव्य में हमें विभिन्न प्रकार के बिम्ब उपलब्ध हो जाते हैं, जैसे- व्यक्ति बिम्ब, गत्यात्मक बिम्ब, ध्वनि बिम्ब, भाव बिम्ब स्मृत्यात्मक बिम्ब, द्वन्द्वात्मक बिम्ब, प्रकृति बिम्ब आदि। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-


व्यक्ति बिम्ब-


नुकीली नाक और


भव्य ललाट है,


दृढ़ हनु


कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति ।


ध्वनि बिम्ब-


रात के दो बजे हैं,


दूरदूर जंगल में सियारों का हो हो; पास-पास आती हुई गहराती गूँजती, किसी रेलगाड़ी के पहियों की आवाज़ !


भाव बिम्ब (भयानक) -


तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष, चमक चमक उठते हैं हरे-हरे, अचानक


वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक तिलस्मी खोह का शिला-द्वार खुलता है धड़ से ।


प्रकृति बिम्ब-


अँधियारी, एकान्त


भूमि की सतहों के बहुत बहुत नीचे प्राकृत गुहा एक


मुक्तिबोध के शिल्प-पक्ष की शक्ति बिम्ब-योजना में निहित है। बिम्बों के समस्त प्रकारों को अपने में समेटे हुए उनका काव्य बिम्बधर्मिता के गुण से परिपूर्ण है । बिम्बों के माध्यम से उन्होंने अपने समय के कटु यथार्थ का चित्रण किया है। शमशेर बहादुर सिंह के शब्दों में "मुक्तिबोध की हर इमेज के पीछे शक्ति होती है, वे हर वर्णन को दमदार, अर्थपूर्ण और चित्रमय में बनाते हैं।"


प्रतीक- विधान


प्रतीक का सामान्य अर्थ है, 'संकेत' या 'चिह्न' । जब कोई पदार्थ किसी भाव या विचार का संकेत बन जाता है, उसे प्रतीक कहते हैं। डॉ० राजाराम रस्तोगी ने प्रतीक के विषय में लिखा है कि "प्रतीक का अर्थ होता है प्रतिरूप या प्रतिमा अथवा वह वस्तु या भाव जो अंश होकर भी समग्र के लिए व्यवहृत हो।" मुक्तिबोध का वस्तु- क्षेत्र, सन्दर्भ क्षेत्र, भाव-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है, उन्होंने विराट् विश्व को प्रतीकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रतीकों को काव्य-शिल्प का उपादान पात्र समझकर नहीं वरन् अपनी सम्वेदनाओं को व्यक्त करने के लिए आवश्यक तत्त्व समझ कर उनका प्रयोग किया है। वे अपनी बात को सीधे ढंग से नहीं कहते बल्कि उन्हें प्रतीक शैली में प्रकट करने में विश्वास करते हैं।

उनके प्रतीक विधान के लिए एक आलोचक ने कहा है कि "कला के क्षेत्र में ऐसी सिद्धि सम्भवतः अभी तक किसी कवि को प्राप्त नहीं हो सकी है। " -


मुक्तिबोध ने हमारे जाने-बूझे प्रतीकों को एक नया आयाम दिया है तथा सर्वथा नये प्रतीकों का सृजन भी किया है। उन्होंने एक ही प्रतीक को कई स्थानों पर भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया है, जिससे उनमें एकरूपता या अर्थ का दोहराव नहीं दिखाई पड़ता । कहीं उन्होंने स्वतन्त्र और लघु प्रतीकों का प्रयोग किया है तो कहीं ऐसे विस्तृत आयाम वाले प्रतीकों का प्रयोग किया है जिनका अर्थ सन्दर्भ सम्पूर्ण कविता में समाया हुआ है।

उदाहरण के लिए शिशु, रत्नमणि, अरुण कमल आदि स्वतन्त्र सन्दर्भ के प्रतीक हैं तो ब्रह्मराक्षस, रक्तालोक-स्नात पुरुष, - ओरांगउटांग का प्रतीक सन्दर्भ पूरी कविता में छाया हुआ है। उनके प्रतीकों को प्रमुख रूप से इन वर्गों में बाँटा जा सकता है - ऐतिहासिक प्रतीक, पौराणिक प्रतीक, प्राकृतिक प्रतीक, सैद्धान्तिक प्रतीक आदि । उदाहरण द्रष्टव्य


ऐतिहासिक प्रतीक-


अरे हाँ, वह तो .


विचार उठते ही दब गए, वह मुख- अरे, वह मुख, वे गाँधीजी !!


सोचने का साहस सब चला गया है।


पौराणिक प्रतीक-


कौन वह दिखाई जो देता, पर नहीं जाना जाता है ! कौन मनु !


प्राकृतिक प्रतीक -


अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे


जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता


अरुण कमल एक


सैद्धान्तिक प्रतीक-


हाथों में चमचमाती सीधी खड़ी तलवार आवदार !! कन्धे से कमर तक कारतूसी बैल्ट है तिरछा ।


स्पष्ट है कि प्रतीक विधान की दृष्टि से मुक्तिबोध का काव्य अत्यन्त उच्च कोटि का है। एक ओर उन्होंने परम्परागत प्रतीकों को नये सन्दर्भों से जोड़कर अपने काव्य में मौलिकता का समावेश किया है, वहीं दूसरी ओर अपनी अद्भुत अभिव्यक्ति क्षमता से अपने भावों को विस्तार प्रदान किया है। उनके प्रतीकों में अदृश्य, अज्ञेय, अमूर्त और अनन्त को व्यक्त करने की अद्भुत शक्ति है।


अलंकार-योजना


अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, 'आभूषण' काव्यजगत् में अलंकार की भूमिका को स्पष्ट करते हुए दण्डी ने कहा है - "काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते " अर्थात् काव्य के शोभाकारक धर्म अलंकार कहलाते हैं।

आचार्य शुक्ल ने इसके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी-कभी सहायक होने वाली युक्ति अलंकार है।"


मुक्तिबोध के काव्य में अलंकारों का व्यापक प्रयोग किया गया है किन्तु उन्होंने अलंकार का प्रयोग सौन्दर्य के लिए नहीं वरन् अपनी अभिव्यक्ति को सरल और प्रभावी बनाने के लिए किया है। उनके काव्य में अलंकार स्वाभाविक रूप से आए हैं, सायास नहीं।

मुक्तिबोध ने अलंकारों का प्रयोग उसी सीमा तक किया है जहाँ उनकी अभिव्यक्ति को सम्प्रेषित करते हुए बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से सहजता के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। उनके काव्य में प्रयुक्त अलंकारों के कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-


उपमा-


भूतों की शादी में कनात-से तन गए


तथा


दुखोंके दागों को तमगों सा पहना


रूपक-


सपनों में चलता है आलोचन, विचारों के चित्रों की अवलि में चिन्तन ।


छेकानुप्रास


समस्वर, समताल,


सहानुभूति की सनसनी कोमल !!


पुनरुक्ति प्रकाश-


प्रत्येक वस्तु का निज निज आलोक, मानो की अलग-अलग फूलों की रंगीन अलग-अलग वातावरण हैं बेमाप, प्रत्येक अर्थ की छाया में अन्य अर्थ झलकता साफ-साफ !


सन्देह-


किसी अनपेक्षित


असम्भव घटना का भयानक सन्देह, अचेतन प्रतीक्षा, कहीं कोई रेल ऐक्सीडेंट न हो जाए।


मानवीकरण-


ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,


अब तक क्या किया ? जीवन क्या जिया !!


मुक्तिबोध अलंकारवादी नहीं हैं उन्होंने अपने भावों की अभिव्यक्ति सरल-सुगम भाषा में की है। किन्तु उनके प्रयत्न न करने पर भी अलंकारों ने उनके काव्य में अपना स्थान बना लिया है। उनके काव्य में प्रयुक्त अलंकार सरल, आकर्षक और भावानुकूल हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि उनके अलंकार कलावादी मूल्यों से अलग और युग की बदलती संवेदना के अनुरूप हैं।


छन्द-योजना


छन्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है "छोटी-छोटी सार्थक ध्वनियों के प्रवाहपूर्ण सामंजस्य का नाम छन्द है।" प्राचीनकाल से आधुनिककाल तक सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में छन्दों का प्रयोग होता रहा है। छायावादी युग में निराला ने छन्दमुक्त कविताएँ लिखना प्रारम्भ कर दिया और प्रगतिवाद, प्रयोगवादी काल में कविता पूर्णतः छन्दमुक्त हो गई।



मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएँ छन्दमुक्त हैं। उनका काव्य सौन्दर्य-बोध के लिए छन्दों का मोहताज नहीं था, उनका उद्देश्य अपनी अभिव्यक्ति को सरल और स्पष्ट बनाना था अतः मुक्त छन्दों के विविध प्रयोग कर मुक्तिबोध ने अपनी अनुभूति को साकार रूप दिया है।

यद्यपि उनकी कविता में पारम्परिक मात्रिक छन्दों का प्रयोग किया गया है किन्तु वह अव्यवस्थित रूप में प्राप्त होता है। इसके साथ ही उनकी कविता में लय का निर्वाह भी मिलता है, जैसे-


स्वप्न के भीतर एक स्वप्न


विचारधारा के भीतर और एक अन्य सघन विचारधारा प्रच्छन्न !!


मुक्तिबोध की कविताओं में ध्वनि योजना के अनुरूप भी छन्दों का प्रयोग किया गया है, 'अँधेरे में' कविता का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-


ज़िंदगी के.....


कमरों में अँधेरे


लगाता है चक्कर कोई एक लगातार,


बार-बार... बार-बार


आवाज़ पैरों की देती है सुनाई वह नहीं दीखता .... नहीं ही दीखता, तिलिस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक


किन्तु वह रहा धू