आचार्य देव का काव्यांग निरूपण - Poetry rendering of Acharya Dev

आचार्य देव के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों से स्पष्ट है कि वे मूलतः रसवादी आचार्य हैं जिनका अलंकारों के स्वाभाविक प्रयोग के प्रति आग्रह सहज ही परिलक्षित होता है। उनकी काव्य-कृतियाँ उनके दर्शनशास्त्र, ज्योतिष, तन्त्रशास्त्र एवं आयुर्वेदादि विद्याओं से भली-भाँति परिचित होने का प्रमाण देती हैं। उदाहरण के तौर पर 'रागरत्नाकर' उनका संगीत विषयक लक्षण ग्रन्थ है। 'देवशतक' अध्यात्म सम्बन्धी ग्रन्थ है जिसमें उन्होंने जीवन और जगत की असारता, ब्रह्मतत्त्व तथा प्रेम के माहात्म्य का वर्णन है। 'भावविलास', 'शब्द रसायन' आदि कवि आचार्य देव की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं जिसमें उन्होंने काव्य के विभिन्न पक्षों का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया हैं।


रस निरूपण


आचार्य देव मूलतः रसवादी आचार्य हैं। यही कारण है कि उनके लगभग प्रत्येक ग्रन्थ में रस निरूपण को महत्ता दी गई है। उदाहरणतया 'काव्यरसायन' नामक काव्यांग निरूपक ग्रन्थ में उन्होंने ग्रन्थ का एक भाग रस निरूपण को समर्पित किया है। 'भावविलास' का पहला भाग भी रस निरूपण हेतु समर्पित है। 'भवानीविलास', 'रसविलास' आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का वर्ण्य विषय ही रस निरूपण है। अपने सभी ग्रन्थों में रस निरूपण के अन्तर्गत उन्होंने नायक-नायिका भेद का भी यथोचित विश्लेषण किया है। यहाँ वे आचार्य विश्वनाथ तथा आचार्य भानु मिश्र जैसे विद्वानों की निरूपण विधियों को अपनाते प्रतीत होते हैं।

उनके ग्रन्थों में रस विषयक गम्भीर शास्त्रार्थों को छोड़कर रस सम्बन्धी प्रायः सम्पूर्ण विवेचन यथेष्ट रूप में निरूपित हुआ है। रस निरूपण के आलोक मैं आचार्य देव का अवदान निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत सूचीबद्ध किया जा सकता है -


(i) रस काव्य का सर्वोपरि अंग है। काव्य का आधार भले ही शब्दार्थ है, लेकिन शब्दार्थ का कवित्व रस पर ही निर्भर करता है। देव की उक्ति है-


काव्य सार शब्दार्थ को रस तिहि काव्यासार ।


(ii) आचार्य देव भाव के दो भेद स्वीकार करते हैं कायिक और मानसिक स्तम्भ, स्वेद आदि सात्त्विक - भाव कायिक हैं, जबकि निर्वेद आदि संचारी भाव मानसिक हैं। वस्तुतः भाव-विवेचन में उन्होंने 'रसतरंगिणी' को आधार बनाया है।


(ii) उनके अनुसार 'छल' सहित संचारी भावों की संख्या 34 है। वैसे उनके द्वारा निरूपित नये संचारी भाव 'छल' का आधार भी 'रसतरंगिणी' ही है।


(iv) 'रसतरंगिणी' के आधार पर कवि आचार्य देव ने रस को दो भागों लौकिक तथा अलौकिक में - विभक्त किया है।

लौकिक रस के उन्होंने माधुर्य आदि छह भेद स्वीकार किए हैं जबकि अलौकिक रस के तीन प्रकारों में स्वपनिक, मनोरथ तथा काव्य नाट्य रस का उल्लेख किया है।


(v) आचार्य देव रसों में शृंगार रस को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। उनकी दृष्टि में रसों की संख्या नौ निर्धारित करना तर्कसंगत नहीं हैं, क्योंकि रस तो एक ही है और वह है शृंगाररस । वस्तुतः रस सम्बन्धी उनकी यह धारणा भोजराज से अभिप्रेरित है। उदाहरण प्रस्तुत है-


भाव सहित सिंगार में नवरस झलक अजन |


ज्यों कंकन मनि कनक को ताहि में नव रत्न ॥


(vi) रसों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में उन्होंने यह मत प्रकट किया है कि नौ रसों में से तीन ही रस मुख्य हैं- शृंगार, वीर और शान्त रस उनमें भी शृंगार ही प्रधान है तथा वीर और शान्त रस शृंगार- आश्रित हैं।


(vii) जिस प्रकार संस्कृत काव्यशास्त्रियों में आचार्य विश्वनाथ आदि विद्वान 'शिष्ट रतिभाव' को ही शृंगार रस की संज्ञा प्रदान करते हैं, ठीक उसी प्रकार हिन्दी के कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा में आचार्य देव आदि अपनी पूर्ववर्ती परिपाटी का निष्ठापूर्वक परिपालन करते प्रतीत होते हैं। उदाहरण प्रस्तुत है-


सब सुखदायक नायिका नायक जुगल अनूप ।


राधा हरि आधार जस रस सिंगार स्वरूप ॥


(viii) आचार्य देव के अनुसार शृंगार, वीर, रौद्र और वीभत्स रस मूल रस हैं जबकि बाकी चार रस - हास्य, अद्भुत, करुण और भयानक रस क्रमशः इन्हीं के आश्रित हैं।


(ix) कवि आचार्य देव के मतानुसार शृंगार के दो रूप मान्य हैं प्रच्छन्न और प्रकाश देव का यह मत आचार्य रुद्रट से प्रभावित है। हिन्दी के आचार्यों में केशवदास ने भी इन भेदों के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।


(x) हास्य रस के तीन प्रकार हैं- उत्तम, मध्यम और अधम । हास्य के इन तीन प्रकारों का आधार वे स्मित, विहसित आदि छह भेद ही स्वीकार करते हैं। 


(xi) उनकी दृष्टि में बीभत्स रस के दो रूप हैं जुगुप्साजन्य और ग्लानिजन्य ।


(xii) करुण रस का विवेचन करते हुए उन्होंने उसके पाँच भेदों करुण, अतिकरुण, महाकरुण, लघुकरुण और सुखकरुण का विस्तार से उल्लेख किया है।


(xiii) शान्त रस के दो भेद (भक्तिमूलक तथा शुद्ध) स्वीकार करते हुए देव ने भक्तिमूलक शान्त के तीन उपभेद माने हैं- प्रेमाभक्ति, शुद्ध भक्ति और शुद्ध प्रेम।


नायक-नायिका भेद


आचार्य देव ने 'भावविलास', 'रसविलास', 'भवानीविलास' तथा 'सुखसागरतरंग में नायक-नायिका भेद का निरूपण किया है। वैसे तो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती आचार्य भानु मिश्र के ग्रन्थों का अनुसरण किया है, तथापि उनके मौलिक भेदों की संख्या भी कम नहीं है। आचार्य भानु मिश्र का अनुसरण करते हुए नायिकोपचारण के आधार पर उन्होंने वैशिक नायक के तीन भेद उत्तम, मध्यम और अधम स्वीकार किए हैं। नायिका के स्वरूप निर्धारण में भी देव अपने पूर्ववर्ती आचार्यों का ही अनुसरण करते हैं। यथा आचार्य भानु मिश्र की तरह वे गुप्ता,

मुदिता, लक्षिता, कुलटा, अनुशयना और विदग्धा को परकीया के अन्तर्गत मानते हुए उनका सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत करते हैं। उनके इस विवेचन में मौलिकता की बजाय पूर्ववर्ती ग्रन्थों के अनुसरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। देव के नायक-नायिका भेद सम्बन्धी विवेचन को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत देखा जा सकता है-


(1) आचार्य देव का यह प्रकरण सामान्य कोटि का होते हुए भी महत्त्वपूर्ण व सारगर्भित है।


(ii) उनके अनुसार नायक उदात्त, अभिमानी, उदारमति, गुणी, चतुर और ललित होता है। अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों 'रसविलास', 'भवानीविलास' तथा 'सुखसागरतरंग में उन्होंने कामशास्त्रीय (iii)


नायिका का प्रभावपूर्ण निरूपण किया है। (iv) स्वकीया नायिका के भेद (मध्या और प्रगल्भा) निरूपण में उन्होंने आचार्य भानु मिश्र के मतों का अनुसरण किया है।


(v) व्यवस्था की दृष्टि से उनका यह प्रयास इस मायने में प्रशंसनीय है कि उन्होंने नायक-नायिका जैसे वृहद् प्रसंग को अत्यन्त सुगमतापूर्वक निरूपित किया है।