नागार्जुन की राजनैतिक दृष्टि - Political vision of Nagarjuna

राजनैतिक सन्दर्भ में नागार्जुन विपक्ष के एकमात्र प्रवक्ता कवि हैं। अपने काव्य-विकास के अन्तिम चरण तक आते-आते नागार्जुन की कविता अत्यधिक राजनैतिक हो जाती है, जिसका स्तर राज्य से राष्ट्र, राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय हो जाता है। राजनैतिक कविताओं में नागार्जुन विपक्ष के कवि के रूप में उपस्थित होते हैं। उन्होंने स्वयं अपने को अनगिनत बार अपनी कविताओं में 'जन-कवि' के अभियान से विभूषित किया है। विपक्ष के पक्षधर होने के नाते वे सत्ता की कटु आलोचनाएँ करते हैं, उसके किसी वैशिष्ट्य का उद्गीत गाते नहीं दीख पड़ते, पर इस प्रकार कविताओं में नागार्जुन प्रायः संयमित, मर्यादित और न्यायमुक्त नहीं रह पाए हैं। ब्रिटेन की मल्लिका के भारत आने पर नागार्जुन उसके लिए किये जा रहे भव्य स्वागत को उद्धृत करते हुए अपने देश की गरीबी का रोना रोते हैं और तत्कालीन देश की नीति तथा मल्लिका पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं" -


आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी यही हुई है राय जवाहर लाल की।


किन्तु वहीं नागार्जुन, बुल्गानिन, ख्रुश्चेव के भारत आने पर उनके भव्य स्वागत में खर्च होने वाली विपुल राशि को देख नहीं पाते और उनके स्वागत की प्रशंसा मैत्री मुदिता में कविता रचते हैं। यह भी विचारणीय है कि उन्होंने हाल की रचनाओं में खाए-पीए-अघाए समाजवादियों पर भी प्रहार किया है जिनका समाजवाद मात्र पाखण्ड है। ये उन समाजवादियों का सम्मान करते हैं जो चरित्र की परिधि में रहकर दुनिया के जन-जन में वैचारिक क्रान्ति करते हैं।


राजनैतिक सन्दर्भ के अन्तर्गत नागार्जुन ने व्यक्तित्वपरक आलोचना की कविताएँ भी अधिकाधिक लिखी हैं।

जहाँ सामाजिक सन्दर्भ में कलाकार और साहित्यकार के प्रति निवेदित वैयक्तिक कविताओं में नागार्जुन प्रशंसा का गान करते हैं, वहीं राजनैतिक व्यक्तित्वों की अधिकाधिक कटु आलोचना करते हैं। ऐसी कविताओं में सर्वाधिक कटु आलोचनापरक कविताएँ इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व पर लिखी गई हैं जिनमें उन्हें कभी बाघिन तो कभी भेड़िया, कभी डायन तो कभी कालीमाई के रूप में उपस्थित किया गया है। ऐसे स्थलों पर नागार्जुन ने भारतीय पौराणिक मिथकों का भी उपयोग किया है। नागार्जुन यद्यपि यहाँ विद्रोह के कवि हैं,

पर उनके विद्रोह में सर्जनात्मकता नहीं है, उनमें प्रतिशोध और प्रतिकार के रूप में अपमानित लांछित करने की भावना अधिक है। वे शब्दों से आहत करते हैं और बहुतेरे स्थलों पर अराजकता का संपोषण करते भी दीखते हैं। राजनैतिक व्यक्तित्वपरक कविता लिखते हुए कई बार वे स्वयं उलझाव के शिकार भी होते हैं। उदाहरण के लिए जयप्रकाश के व्यक्तित्व को लेकर 75 की एक कविता में वे उनकी प्रशंसा करते हैं। पर 75 की ही एक और कविता में वे उनकी भर्त्सना भी करते हैं। इस प्रकार उनमें ध्रुवान्तिक अन्तर्विरोध उपस्थित हुआ है। डॉ. हरदयाल के शब्दों में, "वे. जे. पी. के प्रति प्रशंसा का भाव भी रखते हैं और निन्दात्मक भाव भी वे सम्पूर्ण क्रान्ति का समर्थन भी करते हैं और उसका विरोध भी। वे जनता का स्वागत भी करते हैं और उनका विरोध भी । "