प्रगतिशील कवियों की शक्ति और सीमाएँ - Power and Limitations of Progressive Poets

शक्ति


आधुनिक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है उसका मनुष्य की सम्वेदनाओं, उसके सामाजिक सम्बन्धों एवं जीवनगत-संघर्षो से जुड़ा होना, लेकिन भारतेन्दुकालीन, द्विवेदीकालीन, छायावादी, प्रयोगवादी एवं नयी कविताएँ इन मानदण्डों पर खरे साबित नहीं होते। वहीं प्रगतिशील काव्य-आन्दोलन इन सबसे भिन्न एक ऐसा काव्यान्दोलन है, जो मनुष्य समाज के बीच से उसकी जीवनगत ठोस समस्याओं को लेकर पैदा हुआ है और एक सुसंगत वैचारिक दर्शन के सहारे सामाजिक बदलाव में साहित्य की भूमिका की बात करता है। भारतीय सन्दर्भ में देखा जाए तो इस काव्य आन्दोलन के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ थीं।

मसलन कविता की शिष्ट परम्परा में इस प्रकार की खुरदरी कविताओं का विरोध कथ्य और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर होना स्वभाविक था। इस कविता ने काव्य-सौन्दर्य के स्थापित प्रतिमानों को गैरजरूरी साबित कर दिया था, इससे सम्भ्रान्त रुचि और दृष्टि वालों को धुर आघात लगा था। इस काव्य आन्दोलन का वैशिष्ट्य इस बात में निहित है कि विरोधी परिस्थितियों के होते हुए भी इसने लीक से हटकर साहित्य रचना का बिल्कुल भिन्न मार्ग चुना। किसानी क्रिया-कर्म, जैसे हल जोतना, सिंचाई करना, कटाई-पिसाई, फिर गरीबी, शोषण, उत्पीड़न आदि कविता के विषय कभी नहीं थे, किन्तु इन रचनाकारों ने जीवन के इन अछूते प्रसंगों को अपने रचना-संसार का आधार बनाया।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रगतिशील कविता की सर्वप्रमुख विशेषता है मानव जीवन का व्यापक चित्रण । इस कविता में तत्कालीन भारतीय समाज, इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थनीति आदि सभी पक्षों का व्यापक स्तर पर रूपायित किया गया है।


साहित्य रचना के इतिहास में कभी भी साधारण मनुष्य को काव्य-सिंहासन पर इतने सम्मान के साथ नहीं बैठाया गया था, जिस आदर और गरिमा के साथ प्रगतिशील कविता ने उन्हें बैठाया। इसी सन्दर्भ में यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यह कविता भावना पर कम, चेतना पर अधिक आधारित है।

मानवीय कष्टों पर आँसू नहीं बहाता, बल्कि आक्रोश व्यक्त करता है। गरीब, वंचित और दलित के प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता, उनके अधिकारों के लिए लड़ता है। इस कविता में कल्पनाओं, भावनाओं और आदर्शों के विपरीत यथार्थ की प्रतिष्ठा की गई है। सामाजिक, मानसिक और प्राकृतिक तीनों क्षेत्रों में प्रगतिशील कविता यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती है। इसके यथार्थ चित्रण में एक गहराई है, क्योंकि उसमें वर्ग-विश्लेषण और सामाजिक अन्तर्विरोधों की वैज्ञानिक दृष्टि विद्यमान है। यह यथार्थ चित्रण गत्यात्मक है, इसलिए जहाँ पर उसमें वर्तमान जीवन की विषमताओं और विरूपताओं को अभिव्यक्ति दी गई है, वहीं उनके खिलाफ जूझती हुई शक्तियों की एकता को भी बल प्रदान किया गया है। यही कारण है कि यह यथार्थ चित्रण निराशाजनक नहीं है।


प्रगतिशील कविता की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता है इसकी स्वस्थ प्रणय भावना । प्रगतिशील कविता की प्रेम विषयक कविताओं में न तो रीतिकाल के समान अति शृंगारिकता, घोर ऐन्द्रिकता एवं वासना है और न ही छायावादी प्रेम कविताओं के समान रूमानीपन, वायवीयता एवं अशरीरीपन । यहाँ द्विवेदीयुगीन कविता का नैतिकतावाद, प्रयोगवादी कविता का एंटीरोमांटिसिज्म और नयी कविता की कुत्सित यौन आकांक्षा भी नहीं हैं। इनसे इतर प्रगतिशील कविता धरती से जुड़े प्रणय की सहज कामना को चुनती है, जिसमें स्वस्थ सामाजिकता और दाम्पत्य जीवन की सहज ऊष्मा विद्यमान है। यहाँ प्रणय के रूप में सख्य भाव से अनुप्राणित निर्विशेष मानवीय प्रेम की मधुर अभिव्यक्ति हुई है।


भाषा-शिल्प के क्षेत्र में प्रगतिशील कविता में दोनों प्रकार के उदाहरण मिलते हैं परम्परागत और नवीन भाषा-शैली । फिर भी ज्यादातर रचनाकारों ने जनवादी मार्ग को अपनाया। जहाँ आमजन के जीवन से जुड़ी बोलचाल की भाषा या फिर लोक भाषा को प्रधानता दी गई है। वहीं शिल्प भी लोक लय, लोक धुन में रची बसी है। एक साथ कई प्रकार के ग्रामीण बिम्ब और दृश्य भी विद्यमान हैं, वहीं नगर शहरों का बदहाल कृत्रिम चित्र भी । शैली - शिल्प की दृष्टि से यह काव्यधारा बेहद सम्पन्न और बहुरंगी है।


सीमाएँ


कुछ आलोचक प्रगतिशील कविता की सबसे बड़ी सीमा इसकी संकीर्णता को मानते हैं, जो कई रूपों में व्यक्त हुई है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण रूप है जीवन और जगत् को परखने की एकांगी दृष्टि।

समाज को वर्ग- संघर्ष से आवश्यक रूप से जोड़ देने और वामपंथी राजनीति को असंतुलित महत्त्व दे दिए जाने के कारण जीवन के अन्यान्य विषयों की घोर उपेक्षा की गई है। इस काव्य-आन्दोलन की दूसरी बड़ी सीमा है- वैचारिक अनुदारता । इस सीमा का परिणाम यह हुआ कि भिन्न विचारधारा वाले साहित्यकारों की ईमानदारी पर अविश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें बेईमान और गद्दार घोषित करना। समाज के सबसे संवेदनशील प्राणी होने के नाते कम से कम रचनाकारों से ऐसी वैचारिक वैमनस्य की भावना की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रगतिशील कविता का एक अन्य संकीर्ण पक्ष है - सामायिक घटनाओं पर तात्कालिक प्रतिक्रिया देते हुए उस पर अत्यधिक जोर देना ।

प्रगतिशील कवियों ने तात्कालिक सामाजिक-राजनैतिक आन्दोलनों एवं घटनाओं पर सबसे अधिक रचनात्मक कार्य किया । कई रचनाओं में तो उन्हें शाश्वत प्रवृति की तरह प्रस्तुत किया गया, जबकि सामाजिक-राजनैतिक बदलाव के क्रम में उन समस्याओं के निराकरण के बाद उन रचनाओं की प्रासंगिकता पर सवाल करना बड़ा आसान है। जाहिर है। जमींदारी सामन्तवादी शोषण के विरुद्ध लिखी गई उनकी कई रचनाओं को अब उतना महत्त्व नहीं दिया जा सकता। यही नहीं समाज के सन्दर्भ में जब 'किसान-मजदूरों' पर बल दिया जाने लगा तो कुछ मध्यमवर्गीय लेखक भड़क गए। उनमें से अज्ञेय का विरोध इस बात से था कि किसान-मजदूरों की तरह निम्न मध्यम वर्ग भी पीड़ित है, बल्कि वे यह मानते थे कि इस समाज-व्यवस्था में छोटे-बड़े सभी लोग परेशान हैं, इसलिए साहित्य सबके लिए, सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि जीवन में राजनीति का अपना महत्त्व होता है, किन्तु साहित्य राजनीति का 'साहित्यिक संस्करण' मात्र नहीं है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि राजनीति में कट्टरता की संभावना मानी जा सकती है, पर साहित्य में संकीर्णता और कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं होता। भाषा और अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रगतिशील कविता की सबसे बड़ी सीमा उसकी सपाट बयानी है। इस सीधी और सपाट कथन पद्धत्ति के क्रम में ज्यादातर रचनाकारों में यह अधीरता स्पष्ट देखी जा सकती हैं, जहाँ रचनाकार जीवन और राजनीति के सच्चाई से झटपट पाठक को परिचित करा देना चाहता है। केवल राजनीति ही कविता नहीं है।

कविता के अपने कुछ मौलिक तत्त्व होते हैं जो उसे लोक की जमीनी संवेदनाओं से जोड़ते हैं। अतिराजनैतिक सक्रियता किसी भी कविता को काव्य-सौन्दर्य से रहित कर बैनरबाज़ी और पोस्टरबाज़ी की कोटि में खड़ा कर देती है। प्रगतिशील कवियों पर अक्सर विरोधियों द्वारा यह तंज कसा जाता है कि उन्होंने कविता कम लिखीं हैं, पोस्टर अधिक बनाए हैं। उनकी कविताएँ पोस्टरबाजी के कारण शुष्क और अनगढ़ हो जाती है और कहीं-कहीं मिथ्याचार व भावुक प्रलाप भी दिख जाता है। ऐसा प्रतीत होने लगता कि जैसे कवि ने घटना को देख लिया और तुरंत घर पहुँचकर भाषा का फर्जी वितंडा रच बैठा। संवेदना की कमी और अति भावुकता की थोथी पोस्टरिंग कविता को यथार्थ से दूर हटाकर मिथकीय गल्प के रूप में ढाल देती है। उसमें आवश्यक कलात्मक कौशल और संयम का अक्सर अभाव दिखता है। यही कारण है कि यथातथ्य वर्णन या चित्रण के दबाव में कई बार रचनाएँ कविताएँ बनने से रह जाती हैं।