आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की व्यावहारिक आलोचना - Practical criticism of Acharya Hazariprasad Dwivedi

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी संस्कृत और ज्योतिष के विद्वान थे। उनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र भारतीय इतिहास और प्राचीन साहित्य था। उन्होंने आलोचना और अनुसंधान के अतिरिक्त उपन्यास और ललित निबन्ध लिखकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। व्यावहारिक आलोचना की दृष्टि से यद्यपि उन्होंने सूरदास और कबीर पर ही स्वतन्त्र रूप से पुस्तकें लिखकर उनके काव्य और उनके युग का विवेचन किया है लेकिन अपने निबन्धों और साहित्येतिहास की पुस्तकों में उन्होंने हिन्दी साहित्य की सम्पूर्ण परम्परा का मूल्यांकन किया है, सभी महत्त्वपूर्ण लेखकों और कृतियों की समीक्षा की है।


आदिकाल और सन्त-साहित्य


आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन करते हुए अनेक नयी उद्भावनाएँ की हैं।

यद्यपि आदिकाल को छोड़कर साहित्य के काल विभाजन की दृष्टि से शुक्ल जी के ढाँचे में कोई बड़ा परिवर्तन उन्होंने प्रस्तावित नहीं किया, लेकिन कवियों और काव्य-पद्धतियों के विवेचन में अपने विषद् ज्ञान और परम्परा- बोध के आधार पर बहुत नवीन निष्कर्ष दिए हैं। प्रारम्भिक लोक भाषा काव्य के प्रेरणा-स्रोतों और उनमें अन्तर्निहित साहित्यिक तत्त्वों को प्रकाशित करने का श्रेय द्विवेदी जी को ही है। आदिकाल और भक्तिकाल की काव्यधाराओं के उद्गम स्रोतों पर उन्होंने नवीन दृष्टि से प्रकाश डाला है। सन्तकाव्य के विवेचन में उनकी परम्परानिष्ठ दृष्टि उनके काव्य के मर्म के उद्घाटन की अपेक्षा पूर्ववर्ती साहित्य धाराओं और साधना पद्धतियों के उद्घाटन में अधिक संलग्न हुई है।

रासो काव्य के महत्त्व को रेखांकित करते हुए द्विवेदी जी ने इन्हें मध्यकाल के आरम्भ के भारतीय जीवन को जानने का प्रमुख साधन के रूप में देखा है। इतना ही नहीं, उन्होंने इन वीर गाथाओं और प्रेम गाथाओं को अत्यधिक सरस, स्फूर्तिदायक और लोक-जीवन को समझने में अत्यन्त सहायक साहित्य माना है।


सन्तकाव्य सम्बन्धी अपने विवेचन में द्विवेदी जी ने भक्ति-आन्दोलन और सन्त काव्य को इस्लाम-प्रेरित होने का खण्डन करते हुए उसका सम्बन्ध पूर्ववर्ती भारतीय चिन्ता धारा से स्थापित किया।

उन्होंने बड़े मनोयोग से भाव, भाषा, छन्द- अलंकार और अभिव्यंजना की पद्धति का विश्लेषण करके सन्त-साहित्य को पूर्ववर्ती सिद्धों और नाथों के साहित्य का सहज विकास सिद्ध किया। हिन्दी साहित्य के पूर्व मध्यकाल की भक्ति चेतना को दक्षिण के वैष्णव मत से प्रेरित बताया। उन्होंने जैन मुनियों, सिद्धों और नाथ पंथी कवियों के काव्य में निहित धार्मिक तत्त्वों को हृदय की अनुभूति से निकले भाव कहकर उन्हें साम्प्रदायिक कहे जाने का प्रतिवाद किया और उनकी धर्म- भावना को धार्मिक उपदेश न मानकर मनुष्यता को आन्दोलित और प्रभावित करने वाली प्रेरक शक्ति माना । कबीर आदि कवियों ने सिद्धों और योगियों की शब्दावली का प्रयोग अपनी रचनाओं में अवश्य किया है लेकिन उन्होंने उनके शब्दों में नया अर्थ भरकर उन्हें अन्धविश्वासों एवं रूढ़ियों के स्थान पर सच्चे ज्ञान की प्रतिष्ठा का माध्यम बन दिया।

उन्होंने इन सन्तों को 'ज्ञानमार्गी' या 'ज्ञानाश्रयी' कहे जाने को भी इनकी प्रणयानुभूति का अपमान माना है और उनकी भक्ति का मुख्य भाव प्रेम बताया है। सन्त साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव भी द्विवेदी जी ने लक्षित किया है।


द्विवेदी जी ने रीतिकाव्य को भी भक्तिकाव्य की परम्परा में ही देखा है। भक्ति-साहित्य में विद्यमान शृंगार- रस का सम्बन्ध रीतिकाव्य से माना और कहा कि इसी के प्रभाव में नायिका भेद पर आधारित प्रारम्भिक ग्रन्थों में भगवद्भक्ति का पुट पाया जाता है। इस काल के अधिकांश शृंगारी साहित्य में शृंगार के आश्रय श्रीकृष्ण ही हैं।


सूरदास: विराट् प्रेम का भक्त कवि


आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पहली आलोचना पुस्तक भक्तिकाल के कवि सूरदास पर लिखी थी। इसमें द्विवेदी जी अनुसंधानकर्त्ता के रूप में सूरदास के साहित्य को देखते-परखते हैं। अपने अनुसंधान में द्विवेदी जी ने पाया कि उत्तर-पश्चिम भारत में सगुण लीला के वर्णन के लिए भक्ति के सरस पदों का प्रयोग सर्वप्रथम सूरदास ने किया था। सूरदास ने काव्य में अप्रयुक्त भाषा को बहुत सुन्दर, मधुर और आकर्षक बना दिया तथा बाल लीला और मातृ-हृदय के चित्रण में सूरदास को अभूतपूर्व सफलता मिली है। उन्होंने यह भी देखा कि कबीर और तुलसी की तरह सूर भी भारतीय जनता के साथ इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि उनका कोई विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं रह जाता है।


सूर-साहित्य की विशेषता बताते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं कि "सूरसागर के प्रत्येक पद को उसी में स्वतन्त्र समझा जा सकता हैं तथापि सारा सूरसागर 'सागर' हैं। उसकी एक-एक तरंग जिस प्रकार विश्लिष्ट भाव से पूर्ण हैं उसी तरह संश्लिष्ट भाव से भी सूरदास की यह विशेषता है। वे विश्लेषण में भी अनुपम हैं, संघात में भी।" (- सूर साहित्य) कम से कम शब्दों में असीम को इंगित कर देना और एक साधारण-सी भंगी में बड़ी से बड़ी बात अभिव्यक्त कर देना सूरदास की काव्य-भाषा के मुख्य गुण हैं। द्विवेदी जी भाषा को काव्य की अन्तर्वस्तु या भाव को अभिव्यक्त करने का माध्यम मानते हैं। सूरदास की भाषा भाव को प्रकट करने में सर्वथा सफल है - "सूरदास की भाषा का लक्ष्य उसी भाव को छूना है, वह आलंकारिक भी है, सादी भी है, चित्रमय भी है, पर है सर्वत्र भाव की अनुगामिनी । वह Real और Unreal से ऊपर है।" (सूर-साहित्य)


सूरदास ने 'प्रेम के विराट् रूप' की कल्पना की है। यह एक ही प्रेम यशोदा, राधिका, ग्वाल-बालों, रुक्मिणी और गोपियों में अलग-अलग रूप में अभिव्यक्त हुआ है। सूरदास के महत्त्व को रेखांकित करते हुए द्विवेदी जी ने लिखा है कि "बीसवीं शताब्दी की प्रतिद्वन्द्विता की समस्याएँ सौ पचास वर्ष में या तो लुप्त हो जायेंगी या दूसरा रूप धारण कर लेंगी। पर श्रीकृष्ण और राधिका की सुदृढ समुन्नत भूमि पर प्रतिष्ठित ये प्रेम और विरह के गान अनन्तकाल तक यों ही बने रहेंगे। न इनमें जीर्णता आयेगी, न मृत्यु।" (सूर-साहित्य)


द्विवेदी जी ने सूरदास में आत्मदान का अद्भुत उल्लास देखा और उसे उनके काव्य की महिमा का कारण बताया है। इस उल्लास और तन्मयता ने ही उन्हें बड़ा कवि बनाया है- “सूरदास भारतीय साहित्य के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रत्नों में हैं। जिस प्रसंग को उन्होंने उठाया है उसके बारे में सबकुछ कह दिया है। अपने वक्तव्य विषय के साथ ऐसी तन्मयता संसार के कुछ थोड़े कवियों में ही मिल सकती है।" (- निवेदन, सूर-साहित्य) सूरदास ने अपनी इस तन्मयता के कारण अपने युग के रहन-सहन, बोल-चाल, पहनावा और धार्मिक विश्वासों आदि के बारे में प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी नहीं कहा है। इन सब बातों की जानकारी हमें उनके लीला-वर्णन के अन्तर्गत ही मिलती है। इसलिए द्विवेदी जी का निष्कर्ष है कि " "सूरसागर' और कुछ नहीं, शुरू से अन्त तक भगवत्-लीला का वर्णन है।" (- 'सूर-साहित्य')