आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की व्यावहारिक आलोचना : प्रेमचंद और जन-जीवन - Practical criticism of Acharya Hazariprasad Dwivedi: Premchand and public life

द्विवेदी जी प्रेमचंद के कथा साहित्य का मूल्यांकन करते हुए अपना मत प्रकट करते हैं कि "प्रेमचंद हिन्दी कथा साहित्य की प्रौढ़ता के सबूत हैं। वे ईमानदारी के साथ अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे।" (- 'हिन्दी साहित्य की भूमिका) प्रेमचंद के कथा साहित्य के मर्म को समझाते हुए द्विवेदी जी कहते हैं कि "... मैं इतना तो कह ही सकता हूँ कि उनके अधिकांश पात्र उसी श्रेणी के हैं जिनके चित्रण में उन्हें समर्थ बताया गया है। और निम्न श्रेणी तथा मध्यम श्रेणी के पुरुषों और स्त्रियों से आप के यथार्थ परिचय का अर्थ है देश की वास्तविक समस्याओं की जानकारी उन्हें जानकार ही आप अपनी ताकत का अंदाजा लगा सकते हैं- अपने गम्भीर तत्त्व की मजबूती या कमज़ोरी का पता लगा सकते हैं।"

(- 'विचार और वितर्क') प्रेमचंद के पात्रों में असली भारत का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। द्विवेदी जी समाज के दलित और वंचित लोगों को देश का मेरूदण्ड मानते हैं और बताते हैं कि इस वर्ग पर ही समाज का भविष्य निर्भर है क्योंकि "वही ऐसे हैं जो शताब्दियों तक केवल उपेक्षित और पद-दलित ही नहीं रहे परिहास और अपमान के पात्र भी बने रहे हैं। हजारों वर्ष के भारतीय साहित्य में इनकी आशाओं, आकांक्षाओं, सुख-दुखों और सूझ-बूझों की चर्चा नहीं के बराबर हुई है।" (- 'विचार और वितर्क') साधारण जनता के अन्तर्मन की गहराई में उतर कर उसे दुनिया के सामने प्रकट करने में प्रेमचंद की संवेदना और कला-कौशल दोनों अपने चरम पर दिखाई देते हैं।

प्रेमचंद ने समाज के विभिन्न वर्गों की भौतिक और मानसिक स्थितियों का बहुत बारीकी से चित्रण किया है। द्विवेदी जी प्रेमचंद की इस खूबी को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि "प्रेमचंद ने इन वर्गों को ही चित्रित किया है और इसीलिए वे जड़ सभ्यता की सर्जरी में इतने सिद्धहस्त हो सके हैं। उन्होंने उनकी नाड़ी पहचानी है। हम उनके पात्रों के अन्तर्द्वन्द्व में सभ्यता का वास्तविक रूप प्रत्यक्ष देखते हैं, वर्ग-चेतनाओं के परस्पर टकराने में जो एक अभूतपूर्व ज्योति-स्फुल्लिंग निर्गत होता है, वहीं प्रेमचंद की समस्त कारीगरी की जान है। इन्हीं चिनगारियों से वे दुर्वृत्तियों को जलाने में समर्थ होते हैं।"

(- 'विचार और वितर्क) द्विवेदी जी विश्वासपूर्वक कहते हैं कि प्रेमचंद ने समाज के अच्छे-बुरे सभी व्यक्तियों और उनके वर्ग-वैशिष्ट्य को इतने विश्वसनीय ढंग से अपने साहित्य में प्रस्तुत किया हैं कि हम उनके अन्तः बाह्य को बहुत स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और आश्वस्त हो सकते हैं कि हम दुनिया का असली चेहरा देख रहे हैं- "आप बेखटके प्रेमचंद का हाथ पकड़ कर मेड़ों पर गाते हुए किसान को, अन्तःपुर में मान किए प्रियतमा को, कोठे पर बैठी हुई वारवनिता को, रोटियों के लिए ललकते हुए भिखमंगों को कूट परामर्श में लीन गोयन्दों को, ईर्ष्यापरायण प्रोफेसरों को, दुर्बल हृदय बैंकरों को, साहस-परायण चमारिन को, ढोंगी पण्डित को, फ़रेबी पटवारी को, नीचाशय अमीर को देख सकते हैं और निश्चित होकर विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ आपने देखा वह गलत नहीं है, उससे अधिक सचाई से दिखा सकनेवाले परिदर्शक को अभी हिन्दी-उर्दू की दुनिया नहीं जानती ।" (- 'विचार और वितर्क')


प्रेमचंद ने अपने साहित्य में न केवल समाज के दलित और गरीब लोगों का पक्ष लिया, बल्कि अपनी भाषा में भी सामान्य बोल-चाल की भाषा का प्रयोग करते हुए साहित्य को जीवन का हिस्सा बनाकर दोनों को आपस में जोड़ा है। प्रेमचंद से पहले साहित्य और भाषा पर बांग्ला का बहुत प्रभाव था, तिलिस्मी और काल्पनिक कथाओं को ही साहित्य माना जाता था। जीवन और साहित्य में बहुत दूरियाँ थीं। द्विवेदी जी ने इस दृष्टि से प्रेमचंद का महत्त्व बताते हुए कहा है कि "प्रेमचंद ने पहले पहल इन काल्पनिक घरौंदों को ठोकर मार कर तोड़ दिया। उन्होंने हिन्दी को हर प्रकार से हिन्दी किया। उनके पात्र, उनके विचार, उनका दुख-सुख सब वास्तविक था, उधार लिया हुआ और नकली नहीं। उन्होंने उर्दू हिन्दी के भेद को कम कर दिया और भाषा में नयी प्राण-शक्ति फूँक दी।" (- 'विचार और वितर्क')