आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की व्यावहारिक आलोचना : क्रान्तिकारी कबीर - Practical criticism of Acharya Hazariprasad Dwivedi: Revolutionary Kabir
अपनी प्रथम आलोचना कृति 'सूर-साहित्य' में द्विवेदी जी ने सूरदास का मूल्यांकन पूरे भक्तिकाल के परिप्रेक्ष्य में ही किया है, लेकिन 'कबीर' उनकी ऐतिहासिक और सामाजिक समीक्षा-पद्धति और परम्परा बोध को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में कबीर की प्रतिष्ठा का श्रेय द्विवेदी जी को ही है। यहाँ उनकी मुख्य मान्यता यह है कि कबीर में चीज़ों को अस्वीकार करने का अद्भुत साहस है। यह अस्वीकार सामान्य अस्वीकार नहीं है। यह बड़े लक्ष्य के लिए अपने मार्ग की बाधाओं का अस्वीकार है। कबीर के जीवन और काव्य को एक कसौटी के रूप में रखकर द्विवेदी जी भक्ति काव्य का मूल्यांकन करते हैं। कबीर के सामाजिक और आर्थिक परिवेश का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा है कि जो लोग "गरीबी में ही जनमते थे,
गरीबी में ही पलते थे और उसी में ही मर जाया करते थे। ऐसे कुल में पैदा व्यक्ति के लिए ऊँच-नीच भावना और जाति-व्यवस्था का फौलादी ढाँचा तर्क और बहस की वस्तु नहीं होती, जीवन-मरण का प्रश्न होता है। कबीरदास इसी समाज के रत्न थे।" (- 'कबीर')
कबीर के विवेचन के माध्यम से द्विवेदी जी ने यह दिखाने का प्रयास भी किया है कि समाज में व्याप्त जातिवाद, ऊँच-नीच की भावना तथा बाह्य कर्मकाण्ड के विरोध की परम्परा कबीर के पहले से चली आ रही है। कबीर ने अपनी ओजस्वी वाणी में इन बुराइयों पर मारक प्रहार किया।
वे समाज के कुसंस्कारों, रूढ़ियों और मिथ्याडम्बरों के विरुद्ध निर्भय होकर उम्र भर संघर्ष करते रहे। द्विवेदी जी कबीर को सर्व-धर्म-समन्वयकारी सुधारक माने जाने का प्रतिवाद करते हुए कहते हैं कि कबीर निर्द्वन्द्व भाव से हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों की कट्टरता और मिथ्याचार के पूरी तरह विरुद्ध थे - "कबीर का रास्ता बहुत साफ था। वे दोनों को शिरसा स्वीकार कर समन्वय करने वाले नहीं थे। समस्त बाह्याचारों के जंजालों और संस्कारों को विध्वंस करने वालेक्रान्तिकारी थे। समझौता उनका रास्ता नहीं था।" (- 'कबीर') द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया है कि कबीर इस अर्थ में ही सर्व धर्म समन्वयक कहे जा सकते हैं कि उनकी भक्ति कुछ भी पाने की इच्छा से परे है तथा वे मनुष्य में जाति-धर्म आदि के आधार पर कोई भेद नहीं करते हैं,
बल्कि ऐसा करने वालों को फटकारते हैं। धर्मगत विशेषताओं के प्रति सहनशीलता और उलझन कबीर में नहीं है। बाह्याचार की निरर्थक पूजा और संस्कारों की विचारहीन गुलामी भी कबीर को पसंद नहीं थी । कबीर के विचारों की तरह उनकी भाषा भी निर्भीकता और स्पष्टवादिता की मिसाल है। द्विवेदी जी लिखते हैं- "भाषा पर कबीर का जबर्दस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा दिया बन गया है तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर।"
द्विवेदी जी कबीर के पदों की व्याख्या में उनके काव्यत्व को भक्ति का 'बाइप्रोडक्ट' मानते हैं। उनके अनुसार मूल रूप से कबीर भक्त ही हैं, समाजसुधारक या कवि नहीं। उनकी भाषा की निर्भीकता, व्यंग्यात्मकता और सरलता आदि गुण रूप के द्वारा अरूप की व्यंजना' और 'कथन के जरिए अकथ्य के ध्वनन्' में ही अपनी सार्थकता पाते हैं। कबीर के पद काव्यशक्ति के बहुत अच्छे उदाहरण तो हैं, परन्तु इनमें प्रधानतत्त्व भक्ति ही है, काव्यत्व नहीं । काव्यत्व तो भक्ति की प्रक्रिया में अनायास ही उपलब्ध हो गया है। द्विवेदी जी ने लिखा है "कबीर ने कविता लिखने की प्रतिज्ञा करके अपनी बातें नहीं कही थीं। उनकी छन्दोयोजना, उक्ति वैचित्र्य और अलंकारविधान पूर्ण रूप से स्वाभाविक और अयत्नसाधित हैं।" (- 'कबीर')
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