नन्ददुलारे वाजपेयी की व्यावहारिक आलोचना - Practical criticism of Nanddulare Vajpayee
व्यावहारिक आलोचना ही आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी का वास्तविक आलोचना क्षेत्र है। हिन्दी साहित्य के विवेचन के अन्तर्गत ही उनके आलोचना-प्रतिमानों और आलोचना दृष्टि का विकास हुआ है। उन्होंने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि उनके पीछे साहित्य-समीक्षा की कोई परम्परा नहीं थी। इसलिए उनके आरम्भिक लेखन में कुछ अस्थिरता देखी जा सकती है। उन्होंने अपनी निरन्तर विकसित होती आलोचना- दृष्टि से प्रसाद, पंत, निराला,
महादेवी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीरप्रसाद द्विवेदी, सूरदास, रत्नाकर, प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय, अश्क आदि कई लेखकों की रचनाओं और साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र आदि पर लिखा है। यहाँ उनके सम्पूर्ण आलोचना - कर्म को प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है, लेकिन कुछ मुख्य साहित्यकारों के बारे में उनके विचारों को जान लेना आवश्यक है, ताकि उनकी आलोचना- दृष्टि का स्वरूप हमारे सामने आ सके।
वार्तालाप में शामिल हों