व्यावहारिक आलोचना - practical criticism
एक आलोचक की यात्रा कृतिकार के समानान्तर होती है। वह एक प्रकार से कृति का पुनर्नृजन करता है और इसके लिए वह जिस आत्मचिन्तन व संघर्ष से गुजरता है वह सृजनात्मक अनुभवों से परिपूर्ण तथा आलोकित होता है। विजयदेवनारायण साही की आलोचना दृष्टि में जागरूकता और रचनात्मक दृष्टि का समावेश एक सन्तुलन के साथ उनके आलोचकीय कर्म को अपेक्षाकृत और भी व्यावहारिक बनाता है। व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में 'जायसी' और 'शमशेर की काव्यानुभूति की बुनावट' साही की सुव्यवस्थित व बहुचर्चित रचनाएँ स्वीकार की जाती हैं जहाँ उनके अध्ययन की व्यापकता, सिद्धान्त निरपेक्षता व सूक्ष्म दृष्टि प्रकट होती है। कहना सही होगा कि साही की कविताओं की तरह उनकी आलोचना भी एक हकीकत है, क्योंकि वे रचना के लोकतन्त्र को जीवन्त बनाने का अभूतपूर्व प्रयास करते हैं।
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