आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की व्यावहारिक समीक्षा - Practical review of Acharya Ramchandra Shukla

आचार्य शुक्ल ने साहित्य के व्यावहारिक मूल्यांकन से ही अपने आलोचना-सिद्धान्त विकसित किए हैं। सिद्धान्त-निरूपण में साहित्यिक रचनाओं के उदाहरणों से उन्होंने अपने विचारों की संगतता और तार्किकता प्रतिपादित की है। उन्होंने अपनी आलोचना में विशिष्ट और असाधारण के स्थान पर सहज और साधारण की प्रतिष्ठा की है ।

उनकी आलोचना व्यक्तिनिष्ठ प्रतिमानों के आधार पर प्रस्तुत साहित्यिक खण्डन-मण्डन से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ आधारों पर साहित्य का मूल्यांकन करती है। इस दृष्टि से भक्ति काव्य उनकी आलोचना का केन्द्र है। भक्ति काव्य को आधार मानकर ही उन्होंने रीतिकालीन दरबारी और सामन्ती संस्कृति का विरोध किया और लोक संस्कृति और लोकधर्म की प्रतिष्ठा की है।


आचार्य शुक्ल की व्यावहारिक आलोचना और सैद्धान्तिक आलोचना आपस में मिली हुई हैं। शुक्ल जी रचना की तह तक पहुँचकर उसके मूल्यांकनकी ओर बढ़ते हैं। रचना में जहाँ उन्हें उत्कृष्ट स्थल मिले उन स्थलों को न केवल पहचाना, बल्कि मन लगाकर रेखांकित किया है और विवेकपूर्ण ढंग से उनका महत्त्व स्थापित किया है। यहाँ उनकी सहृदयता, बौद्धिकता और बहुज्ञता रचना की मार्मिकता का उद्घाटन करने में संलग्न हो जाती है।