प्रेमचंद और भारतीय समाज - Premchand and Indian Society
डॉ० रामविलास शर्मा ने कविता और गद्य की विभिन्न विधाओं पर समान अधिकार के साथ लिखा है। नाटक, कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबन्ध आदि विधाओं में लिखे गए हिन्दी के गद्य साहित्य के मूल्यांकन में भी उनकी दृष्टि हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा को सामने लाने की रही है। प्रेमचंद-पूर्व के उपन्यासों पर नाटकों और निबन्धों के प्रभाव की चर्चा करते हुए डॉ. शर्मा ने लिखा है कि "उपन्यास का पूर्ण विकास प्रेमचंद के समय में हुआ परन्तु बालकृष्ण भट्ट, राधाकृष्णदास आदि की रचनाएँ पढ़ने से मालूम हो जाता है कि प्रेमचंद की सुधारात्मक यथार्थवादी परम्परा का हिन्दी के उपन्यास- साहित्य में पहले ही बीजारोपण हो चुका था । उसी परम्परा का ‘सेवासदन' और 'रंगभूमि' में विकास हुआ है।" (- 'भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परम्परा')
डॉ. शर्मा के अनुसार प्रेमचंद ने अपने कथा-साहित्य के माध्यम से विश्व मानव संस्कृति के विकास में भारतीय जन-संस्कृति के योगदान को वाणी दी है। प्रेमचंद का साहित्य अपने समय के भारत और स्वाधीनता आन्दोलन का प्रतिबिम्ब है। इस प्रतिबिम्ब में भारतीय जनता के संघर्ष के साथ-साथ उस समय के सामाजिक जीवन और स्वाधीनता आन्दोलन की असंगतियाँ भी हैं। अपने कलात्मक महत्त्व के साथ प्रेमचंद का साहित्य भारत का ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी है।
डॉ॰ शर्मा प्रेमचंद के साहित्य को भारतीय समाज का दर्पण मानते हैं।
उनके अनुसार उस साहित्य से परिचित होने का अर्थ है भारत के सामन्ती अवशेषों से परिचित होना, भारत के उज्ज्वल भविष्य से परिचित होना । प्रेमचंद ने समाज के विभिन्न वर्गों का चित्रण किया है।
किसानों के विभिन्न स्तरों का चित्रण किया है। इस चित्रण में सामाजिक परिवर्तन की प्रबल आकांक्षा विद्यामान है।
डॉ. शर्मा ने प्रेमचंद के कथा-साहित्य का विवेचन करके उनके युगनिर्माता साहित्यकार के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने रेखांकित किया है कि भविष्यद्रष्टा रचनाकार के रूप में प्रेमचंद ने कथा-साहित्य के विभिन्न पात्रों के माध्यम से जनता के महान् शिक्षक का काम किया है। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों और कहानियों में भारतीय जनता के शोषण, कठिनाइयों और दुःखों को व्यक्त ही नहीं किया, बल्कि उनके कारणों की पड़ताल भी की है। प्रेमचंद के कथा-संसार में जनता की एक भरा-पूरा, सुखी, सुसंस्कृत और समृद्ध जीवन जीने की साध और इस साध के लिए उसके अनवरत संघर्ष का चित्रण कलात्मक उत्कृष्टता के साथ किया गया है। डॉ. शर्मा का निष्कर्ष है कि प्रेमचंद का कथा-साहित्य भारत की अजेय जनता की आवाज़ है।
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