काव्य की रचना-प्रक्रिया - process of poetry

अज्ञेय ने काव्य की रचना-प्रक्रिया के विषय में विस्तार से नहीं लिखा है, किन्तु स्फुट रूप में प्रसंगवश कुछ विचार अवश्य व्यक्त किए हैं जो कविता के सम्बन्ध में उनके मूलभूत दृष्टिकोण को समझने में सहायक हैं। उनके अनुसार "अनुभव की अद्वितीयता और अर्थ की साधारणता प्रतिभा के ये दो इष्ट हैं या कहा जाय कि इन दो ध्येयों का योग ही इसका इष्ट है। जिस प्रक्रिया से यह योग सिद्ध होता है,

मेरे निकट वही रचना-प्रक्रिया है और सब प्रक्रियाएँ यन्त्र की हैं और उनके प्रति अधिक सजगता भी उनकी यान्त्रिकता को कम नहीं करती, हमारी यान्त्रिकता को भले ही बढ़ा दे।"


काव्य की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में अज्ञेय के चिन्तन का मूल भाव यही है कि बाह्य जगत की कोई छोटी-सी घटना भी संवेदना के तारों को झंकृत कर जाती है। रचनाकार उस कंपकंपी को अनुभव करता है और कुछ क्षण उपरान्त कंपकंपी शान्त हो जाती है। ऐसे क्षणों में रचना के रूप में जो कुछ सामने आता है, वही सार्थक रचना है।