काव्य की रचना-प्रक्रिया - process of poetry
मुक्तिबोध रचनाकार की रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण पर बहुत बल देते हैं। वे काव्य को 'व्यक्तिवादी' और 'सामाजिक' जैसी दो परस्पर विरोधी सरणियों में बाँटकर देखे जाने वाली प्रवृत्ति का विरोध करते हैं। उनके अनुसार "सच तो यह है कि स्वयं के मनोभावों की कविता प्रत्यक्षतः व्यक्ति की होने से जन विरोधी नहीं हो जाती, बशर्ते कि वे मनोभाव समाज के बीच में रहकर स्वाभाविक सिद्ध हुए हों। जन-मन की सर्व साधारण मनःस्थिति व्यक्ति की मनोदशाओं द्वारा प्रकट हो तो फिर क्या कहना।"
चूँकि, काव्य की रचना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, इसलिए कवि की दृष्टि, प्रकृति और काव्य की अन्तर्वस्तु से उसका प्रभावित होना स्वाभाविक है।
काव्य की रचना-प्रक्रिया को मुक्तिबोध एक खोज और ग्रहण के रूप में स्वीकृति देते हैं। इस प्रक्रिया को वे एक बिम्बधर्मी उपमा द्वारा प्रकट करने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि "बीरान मैदान, अँधेरी रात, खोया हुआ रास्ता। हाथ में एक पीली मद्धिम लालटेन । यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोड़ी सी जगह पर ही उसका प्रकाश है। ज्यों-ज्यों पग बढ़ता जाएगा, थोड़ा-थोड़ा उद्घाटन होता जाएगा। चलने वाला पहले से नहीं जानता कि क्या उद्घाटित होगा। उसे अपनी पीली मद्धिम लालटेन का ही सहारा है।... कवि के लिए इस पथ पर आगे बढ़ते जाने का काम महत्त्वपूर्ण है। वह उसका साहस है। वह उसकी खोज है।"
वस्तुतः यह रचना-प्रक्रिया ही कवि का आत्मसंघर्ष होता है। केवल एक पीली धीमी लालटेन के सहारे उसे अपनी सारी उबड़-खाबड़ और झाड़-झंखाड़ भरी यात्रा तय करनी होती है। यही वजह है कि बहुत से लोग या तो इस यात्रा में शामिल नहीं होते या फिर इच्छा शक्ति के अभाव में उसे अधूरी छोड़कर ही बैठ जाते हैं। मुक्तिबोध रचना-प्रक्रिया में खोजे जाने वाले पथ की पहचान कवि के मनोजगत के रूप में करते हैं। रचनाकार की गतिशील, अस्थिर और चंचल प्रकृति को समझना कुकर होता है।
वे कहते हैं "कवि को प्रतीत होता है कि उसकी चेतना अँधेरे में बहने वाली सरिता है, जिसकी लहरें कुछ क्षणों के लिए चमक चमक उठती हैं।" इस प्रकार वे रचना- प्रक्रिया में 'तटस्थता' और 'तन्मयता' की एकत्र अपेक्षा पर काफी जोर देते हैं। नयी कविता से मुक्तिबोध को शिकायत थी कि उसमें मानसिक प्रतिक्रियाओं के द्वारा खण्ड चित्र ही अधिकता से दिखाई देते हैं। जीवन के श्रेष्ठतम उदात्त लक्ष्य और मूल्य या उनके निमित्त किये जाने वाले संघर्ष नयी कविता में उस रूप और मात्रा में नहीं है जितने अपेक्षित हैं। मुक्तिबोध 'मानव मुक्ति' की अवधारणा पर फोकस करते हैं जिसके अन्तर्गत जीवन के सभी पक्ष आ जाते हैं, चाहे वह शृंगार हो अथवा राजनीति हर पक्ष में मुक्ति का संघर्ष है। कोई भी पक्ष इससे खाली नहीं है।
मुक्तिबोध की दृष्टि में काव्य का जन्म सामाजिक जीवन के बीच से होता है और उसके निर्माण में युग की भौतिक शक्तियों तथा यथार्थ जीवन की प्रेरणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटक के रूप निहित है, इसलिए काव्य का विवेचन भी उसकी सामाजिक-आर्थिक आधारों को मूल में रखकर अपेक्षित हो जाता है। इस सन्दर्भ में वे कविता को एक सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। उनका विचार है कि कविता के अन्तर्गत कवि भावावेग के साथ-साथ अपने जीवन मूल्य भी अभिव्यक्त करना चाहता है। कविता के अन्तर्गत रचनाकार की सक्रियता और सार्थकता इस बात में उल्लेखनीय है कि वह अपने विशिष्ट जीवनानुभवों को, अपने विशिष्ट भाव समुदाय को अपनी निजी और विशिष्ट भूमि से ऊपर उठाकर सर्वमान्य भूमि पर प्रतिष्ठित कर दे।
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