प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल - Progressive poetry and Kedarnath Agarwal
डॉ० रामविलास शर्मा केदारनाथ अग्रवाल को प्रगतिशील काव्यधारा का प्रतिनिधि कवि माना है । केदारनाथ अग्रवाल के साथ त्रिलोचन और नागार्जुन भी हैं। ये तीनों कवि निराला के जीवन संघर्ष और उनके काव्य-प्रयोगों से सकारात्मक रूप से प्रेरित हैं तथा आधुनिक होने के साथ-साथ परम्परा से जुड़े हुए भी हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार केदार ने अपनी रचनाओं में लगातार साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवादी शक्तियों पर प्रहार किए हैं और जनवादी क्रान्ति को लेकर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। केदार जनजीवन और परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण करते हैं। वे जनता के पिछड़ेपन और उसके अन्धविश्वासों को नजरअंदाज नहीं करते हैं। उनकी चेतना मूलतः किसान की चेतना है।
श्रम के प्रति उनकी गहरी निष्ठा है। उन्होंने अपनी कविताओं में किसान को प्रायः काम करते हुए ही दिखाया है। केदार का विश्वास है कि श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता और श्रम करने वाले लोग इस व्यवस्था को बदलेंगे और इस दुनिया को बेहतर बनाएँगे ।
केदार प्रकृति और मनुष्य के बीच जीवन्त सम्बन्ध को पहचानते हैं और प्राकृतिक परिवेश में मनुष्य के श्रम की उपज का चित्रण करते हैं। डॉ. शर्मा ने अपने विवेचन में बताया है कि केदार आनन्द और उल्लास के कवि हैं।
प्रेम की गहराई और दो व्यक्तियों के एकात्मभाव को दर्शाने वाली उनकी कविताओं में प्रकृति-प्रेम, कविता-प्रेम और पत्नी प्रेम घुल-मिल कर एक हो गए हैं। केदार स्वकीया, दीर्घकालीन और स्थायी प्रेम के कवि हैं। केदार की अनेक कविताएं राजनैतिक हैं, जिनका सम्बन्ध जन-आन्दोलनों से है और वे प्रचारात्मक हैं। लेकिन "केदार केवल आन्दोलन के कवि नहीं हैं, वह उस सबके कवि हैं जिसे मनुष्य आन्दोलन के द्वारा प्राप्त करना चाहता है। इसीलिए उनकी कविताओं में इतनी विविधता है। विविधता विषयवस्तु में है, काव्य रूपों में है, शैली में है ।" (- 'प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल') अतः केदार प्रगतिशील परम्परा के सच्चे उत्तराधिकारी और प्रगतिशील काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं।
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