हिन्दी की प्रगतिशील काव्य-परम्परा - Progressive poetry tradition of Hindi
हिन्दी की प्रगतिशील काव्य-परम्परा - Progressive poetry tradition of Hindi
अब तक के विवेचन से आपने यह अनुभव किया होगा कि हिन्दी की प्रगतिशील कविता भारतीय सामाज के अन्तर्विरोधों, निरन्तर गतिशील और परिवर्तित राजनैतिक षड्यन्त्रों के घात-प्रतिघात के बीच से विकसित हुई है। अतः प्रगतिशील कविता की परम्परा एकरस या सपाट न होकर अनेक उतार-चढ़ावों की सूचक है। इस उतार-चढ़ाव के कार्य-कारण सम्बन्धों को गहराई से समझने के लिए इस काव्यधारा को विभिन्न काल- खण्डों में विभक्त किया जा सकता है। यद्यपि यह विभाजन कई बार यान्त्रिक भी प्रतीत होता है, क्योंकि साहित्य के काल-खण्ड निरपेक्ष न होकर परस्पर सम्बद्ध होते हैं। फिर भी प्रगतिशील कविता के सन्दर्भ में प्रतिरोध की शक्तियों की गुणात्मक भिन्नता से इनकार नहीं किया जा सकता।
इसी विशेषता को ध्यान में रखकर यहाँ प्रगतिशील कविता के विकास क्रम को तीन काल-खण्डों में बाँटकर देखने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रारम्भिक दौर (स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व तक)
आधुनिककाल के आरम्भिक काल में ही प्रगतिशील काव्य-चेतना के कुछ संकेत मिलने लगे थे और छायावाद के चरमकाल में पन्त जैसे कवि 'युगान्त' के माध्यम से बदलाव की घोषणा कर रहे थे। हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा छायावाद की प्रासंगिता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा था। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', रामधारीसिंह 'दिनकर' सोहनलाल द्विवेदी आदि कवियों ने अहिंसावाद के विरुद्ध ऐसी कविताएँ लिखीं, जिनमें समाजवादी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। यद्यपि ये कवि प्रगतिशील कवियों की सूची में सम्मिलित कवि नहीं थे।
इनमें माखनलाल चतुर्वेदी की 1929-30 ई. में प्रकाशित 'मरण त्यौहार', 'कैदी और कोकिला' जैसी कविताएँ तो तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलन के उग्रतम संघर्ष का प्रबल समर्थन करती प्रतीत होती हैं। दिनकर ने भी 1933 ई. में ही 'नयी दिल्ली के प्रति' कविता लिखकर अपना काव्य तेवर जाहिर कर दिया था। फिर प्रगतिशील कविता की औपचारिक शुरुआत की घोषणा होती है, जिसमें केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', शिवमंगलसिंह 'सुमन' आदि कवि सम्मिलित होकर प्रगतिशील कविता की नयी ऊँचाइयों पर पहुँचाते हैं। प्रगतिशील कविता के आरम्भिक दौर की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है - शोषित उत्पीड़ित, किसान-मजदूर वर्ग के जीवन संघर्षों के प्रति गहरी सहानुभूति का भाव और उन्हें इस जकड़बंदी से मुक्ति का आह्वान करना।
दूसरा दौर (स्वातन्त्र्योतर काल से सातवें दशक के मध्य तक)
आजादी के बाद बदले परिवेश में वामपंथी विचारधारा के समक्ष भिन्न प्रकार की चुनौतियाँ प्रकट हुई क्योंकि सत्ता से सहयोग और विरोध के प्रश्न पर दो खेमे तैयार हो गए। इस मतभेद को 1947 ई. के प्रगतिशील लेखक संघ के इलाहाबाद अधिवेशन और 1949 ई. के भिवंडी में जारी घोषणा-पत्र के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है। 1953 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के दिल्ली अधिवेशन में संशोधनवादी उदारतावादी लोगों के हाथ में 'संघ' का नेतृत्व गया और उन्होंने जनता के पक्ष में लड़ने के संकल्प को छोड़कर सत्ता के साथ समझौता का रुख अपनाया।
यहाँ से एक संगठित साहित्य- आन्दोलन के रूप में इसकी भूमिका समाप्त मानी जाने लगी और नयी कविता के मंच से प्रगतिवाद को मृत घोषित कर दिया गया। इसके बावजूद केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि कवियों ने इन परिस्थितियों से डटकर मुकाबला किया। यह वही दौर है जहाँ कला की स्वायत्तता, कलाकार की आजादी, जीवनानुभूति और सौन्दर्यानुभूति की समानान्तरता, अनुभव की प्रामाणिकता और प्रामाणिक अनुभव, काव्य का वस्तु एवं रूपतत्त्व आदि विवाद उठे, जिनसे इन साहित्यकारों ने रचना और आलोचना दोनों स्तर पर जमकर लोहा लिया। खास बात यह है कि रचना के स्तर पर प्रगतिशील काव्य की महत्तम उपलब्धियाँ इसी दौर में सामने आयीं।
इस काल की प्रगतिशील कविता ने आजादी से मोहभंग, सरकारी योजनाओं की असफलता के साथ-साथ सत्ता-शासन के जन-विरोधी चरित्र और देशी पूँजीपतियों के सत्ता से नापाक गठजोड़ को उजागर किया।
तीसरा दौर (सातवें दशक के मध्य से अब तक)
प्रगतिशील कविता का यह दौर समेकित मूल्यांकन के लिए याद किया जाता है कि एक लम्बे अन्तराल के बाद परिवर्तनकारी शक्तियों की स्थिति क्या रही ? यानी मेहनतकश किसान-मजदूर जनता कहाँ तक संगठित हो सकी है और जन-आन्दोलनों की जन पक्षधरता का क्या हश्र हुआ ?
इन प्रश्नों के आलोक में विचार किया जाए तो 20-25 वर्षों की आजादी के बाद यह स्पष्ट हो चुका था कि सत्ता आन्दोलनों को दबाने में सक्षम है। 1970 ई. के बाद सत्ता ने कई पैंतरे बदले और उसमें अपेक्षाकृत अधिक आक्रामकता आई । आठवें दशक को इस दृष्टि से उथल-पुथल का युग माना जाता है। आपातकाल की घोषणा, जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति, देशव्यापी कर्मचारियों की हड़ताल, गुजरात का छात्र आन्दोलन आदि के समानान्तर प्रगतिशील कविता ने नयी ऊर्जा का अनुभव किया। पुराने कवियों में नागार्जुन की बूढ़ी हड्डियों में शोले धधक रहे थे, वहीं धूमिल, आलोक धन्वा, अरुण कमल, वेणु गोपाल, कुमार विकल, ज्ञानेन्द्रपति,
पंकजसिंह, श्रीराम तिवारी जैसे ओजस्वी कवियों की एक लम्बी पंक्ति प्रगतिशील जनवादी कविता में नया स्वर भरने के लिए दृढ़ संकल्प ले चुका था। इस दौर की कविताएँ राजनैतिक-सामाजिक अन्याय को सिर्फ़ प्रतिध्वनित ही नहीं करतीं बल्कि उसका प्रतिकार भी करती हैं। आठवें दशक को हिन्दी की प्रगतिशील कविता का जनवादी दौर माना जाता है, क्योंकि इसमें वामपंथी और जनवादी चेतना की विभिन्न छायाएँ दिखाई देती हैं। इस दौर में प्रगतिशील लेखक संघ के पुनरुद्धार के साथ ही 'जनवादी लेखक संघ' और 'नव जनवादी लेखक संघ' की स्थापना होती है। इन संगठनों के अपने विवाद भी प्रकट हुए, किन्तु अधिकतर प्रगतिशील रचनाकारों का साहित्य के जनाभिमुखता में ही विश्वास था और आज भी प्रगतिशील कविता गरीब मेहनकश के हित में वही कार्य कर रही है।
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