प्रगतिशील लेखक संघ - Progressive Writers Association

प्रेमचन्द की अध्यक्षता में सन् 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक हुई। कवीन्द्र रवीन्द्र और शरच्चन्द्र जैसे महान् साहित्यकार इस संघ के सहयोगी रहे। संघ के प्रथम अधिवेशन के सभापति पद से भाषण देते हुए प्रेमचन्द ने कहा था कि "हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, - स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो- जो सबमें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अधिक सोना मृत्यु का लक्षण है।" प्रेमचन्द के स्वप्नों को प्रगतिवादी रचनाकारों ने बहुलांश में साकार किया है।

प्रगतिवादी रचनाकार


प्रेमचन्द के उपरान्त इस धारा की सबसे बड़ी प्रेरणा और बल निराला, नागार्जुन, सुमन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, धूमिल आदि कवियों से मिला। निराला के काव्य में 'कुकुरमुत्ता', 'नये पत्ते' आदि संग्रह तथा अनेक फुटकर कविताओं में प्रगतिवादी विचारधारा का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है। नागार्जुन के काव्य 'तालाब की मछलियाँ', 'प्यासी पथराई आँखें', 'सतरंगे पंखों वालीं और 'हजार-हजार बाँहों वाली' आदि संग्रहों में प्रगतिवादी विचारधारा का मनोरम चित्रांकन हुआ है। पन्त ने 'रूपाभ' नामक मासिक पत्र द्वारा प्रगतिवादी- आन्दोलन को मजबूत और दृढ़ बनाया।

वे 'युगवाणी', 'ग्राम्या' (युगान्त) आदि की रचना कर प्रगतिवाद के प्रबल समर्थक बन गए। प्रेमचन्द द्वारा सम्पादित 'हंस' ने कुछ समय तक प्रगतिवाद का नेतृत्व किया। 'हंस' पत्रिका में नागार्जुन की कई कविताएँ प्रकाश में आई। अनेक प्रगतिवादी रचनाकार इस पत्रिका से प्रभावित हुए। इन साहित्यकारों ने 'प्रगतिवाद' को एक दर्शन के रूप में अपनाया। इसमें नागार्जुन, धूमिल, मुक्तिबोध, सुमन आदि प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार प्रगतिवाद की आयु अत्यन्त अल्प अर्थात् सन् 1936 से 1943 तक सात-आठ वर्ष की रही है। उनके इस भ्रम के भूल में प्रयोगवाद है। क्योंकि प्रयोगवाद का जन्म 1943 में हो गया था। प्रयोगवाद का जन्म हो चुका था इसलिए प्रगतिवाद को समाप्त हो जाना चाहिए था।

परन्तु इस तथ्य को इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रगतिवाद के स्वर में तीव्रता द्वितीय महायुद्ध के बाद ही आई थी। द्वितीय महायुद्ध में प्रतिक्रियावादी शक्तियों पर जनवादी और जनतान्त्रिक शक्तियों की विजय हुई थी। देश में सन् 1942 में भयंकर आन्दोलन उठ चुका था। देश में स्वतन्त्रता संग्राम का भी आन्दोलन तीव्र हो उठा था। 'आजाद हिन्द फौज' के कारण जागरण का अभियान प्रबल हो चुका था। जिस समय देश में व्यवस्था परिवर्तन, सत्ता परिवर्तन की खातिर जनता सक्रिय हो गई थी, उस समय प्रयोगवादी रचनाकार 'शेखर: एक जीवनी' जैसी कुण्ठाग्रस्त रचनाएँ रचने में दत्तचित्त थे । इस गलाघोंट वातावरण में हमारे प्रगतिवादी रचनाकार ने तत्कालीन कुव्यवस्था का विरोध किया और जनचेतना को वाणी प्रदान की।