प्रगतिशीलता की अवधारणा - progressiveness concept

प्रगतिवाद: अर्थ, अभिप्राय एवं विभिन्न पर्याय

संस्कृत शब्द 'प्रगतिवादिन्' से व्युत्पन्न 'प्रगतिवाद' शब्द के हिन्दी शब्द-कोशों में निम्नलिखित अर्थ पाते हैं- (i) प्रगतिवाद के सिद्धान्त पर चलने वाला, (ii) प्रगतिवाद सम्बन्धी, (iii) प्रगतिवाद के सिद्धान्त पर आधारित ।


'प्रगतिवाद' संज्ञा पु (सं.) : (i) वह सिद्धान्त जिसमें साहित्य को सामाजिक विकास का साधन माना जाता है। (ii) सामान्य जनजीवन को साहित्य में व्यक्त करने का सिद्धान्त प्रगत वि. (सं.) ।


प्रगति = संज्ञा स्त्री. (सं.) प्र+गति: (i) आगे की ओर बढ़ना, अग्रसर होना (ii) उन्नति या विकास, (iii)


सुधार ।


हिन्दी शब्दकोशों में 'प्रगतिशील' के निम्नलिखित अर्थ पाते हैं'-


प्रगतिशील = वि. (हि.) प्रगति + (सं.) शील : (i) बराबर आगे बढ़ने वाला उन्नतिशील, (ii) सुधारवादी, (iii) जो प्रगतिवाद का अनुयायी हो, (iv) प्रगतिवाद सम्बन्धी (v) प्रगतिवाद के सिद्धान्त पर आधारित ।


"प्रगतिवाद' अंग्रेजी प्रोग्रेसनिज्म का हिन्दी रूपान्तर है ।

अंग्रेजी शब्द-कोशों में प्रगतिवाद के


निम्नलिखित अर्थ पाते हैं- (i) प्रगतिवादी, (ii) विकासवादी, (iii) उन्नतिवादी, (iv) प्रगति का समर्थक ।


'प्रगतिशील' अंग्रेजी प्रोग्रेसिम का हिन्दी रूपान्तर है। अंग्रेजी कोशकारों ने प्रगतिशील के निम्नलिखित अर्थ निर्दिष्ट किए हैं' - (i) प्रगामी कृत्रिम, (ii) उत्तरोत्तर बढ़ने वाला, (iii) प्रगतिशील कर्मवर्धमान अग्रगामी तथा नैतिक कार्यों में उन्नतिशील, (iv) प्रगतिशील दल का, प्रगतिशील विशेषण है। इसकी संज्ञा प्रगतिवाद एवं प्रगतिवादी है। (v) संज्ञा में प्रगतिवादी, प्रगतिशील दल का सदस्य ।


समसामयिकता अर्थ और अभिप्राय


"समसामयिकता से हमारा आशय है कि देश काल के दायित्व के साथ-साथ उस क्षण की गहरी तीव्रानुभूति की ग्राह्यता, जो परिस्थितियों से उपजती है और बिना किसी पूर्वाग्रह के सामयिक औचित्य के साथ व्यक्त होती हैं। 8


साहित्य अध्ययन के सन्दर्भ में काल के खण्ड या प्रवाह के आधार पर युग चेतना की अभिव्यक्ति को परिस्थिति के सत्य अंश के रूप में चित्रित करने का नाम है, 'समसामयिकता'' पर रचनाकार को देश काल की ससीमता में कालजयी होना पड़ता है। किन्तु कालजयी होने के लिए वह अपने परिवेश के प्रति बहुत गहरे रूप में समर्पित होता है।

वह अपनी सर्जनात्मक आकांक्षाओं और परिवेश के प्रतिकूल दबाव के अन्तर्विरोध से जूझता हुआ अपनी रचना और दृष्टि को अर्थवत्ता देता है। समसामयिक होने के लिए वह आधुनिक भाव-बोध से नहीं करता । समसामयिक और शाश्वत परस्पर विरोधी नहीं हैं। उनमें 'है' और 'होना चाहिए' का अन्तर मात्र है। अनेक समसामयिक अतीत बनकर ही शाश्वत का सृजन करते हैं। एक इतिवृत्त है और दूसरा अनेक इतिवृत्तों के अनुभव-संधान से निर्मित भावनात्मक लक्ष्य है। कोई भी व्यापक लक्ष्य स्वयं तक पहुँचाने वाले साधनों का विरोध नहीं करता और साधनों का अस्तित्व समसामयिक परिस्थितियों में रहता है।


जब रचनाकार समसामयिकता को निरूपित करता हुआ स्थितियों की समझ को खोलता है, उसके भीतर छिपे अर्थ को उद्रिक्त करता है, उसमें अपनी दृष्टि से गहरी साभिप्रायता को उजागर करने का प्रयास करता है तब समसामयिकता सार्थकता और महत्त्व प्राप्त कर लेती है। किन्तु जब वह उसका चित्रण या निरूपण केवल बाह्य स्तर पर विवरणात्मकता, घटना-मूलकता के आधार पर करता है तब वह एक सन्दर्भित दस्तावेज भर बनकर रह जाती है। वस्तुतः यह रचनाकार की सामर्थ्य पर निर्भर है कि वह प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) को कितनी गहरी स्थापिता (मान्यूमेंटेशन) प्रदान करता है।

आज अध्ययन के जितने अधिक अनुषंग हमारे सामने उपस्थित हो रहे हैं उनमें समसामयिकता की दृष्टि से साहित्य का अध्ययन और उसके महत्त्व मूल्यांकन को निश्चित ही अपनी साभिप्रायता और युगीन अपेक्षा है। नेमिचन्द जैन ने अपनी पुस्तक 'बदलते परिप्रेक्ष्य' में लिखा है- "अनुभूति और दृष्टि की मौलिकता और व्यक्तिमत्ता और उसकी अभिव्यक्ति के रूप और शिल्पगत तत्त्वों की नवीनता श्रेष्ठ साहित्य का सर्वथा अनिवार्य लक्षण है, चाहे वह नवीनता किसी भी युग के तथा लेखक के कृतित्व का बुनियादी मूल्य है जिसके बिना रचना नहीं होती, निरी पुनरावृत्ति, अनुकृति या केवल शब्द जाल मात्र रह जाती है। "10