प्रगतिवाद की पृष्ठभूमि - progressivism background

वैसे तो छायावादी कवि भी राष्ट्रीय आन्दोलनों से प्रभावित होकर दीन-दलित, सर्वहारा, मजदूर, किसानों का वर्णन करते ही थे किन्तु उनमें इस बात के लिए प्रतिबद्धता नहीं थी । राजनीति में प्रवाहित साम्यवादी, मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित कवियों ने साहित्य को इन विचारों को सम्प्रेषित करने का साधन माना । प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणापत्र में लेखकों को एक तरह से आदेशित किया गया था कि वे पतनशील अन्धविश्वासों की शरण में न आकर भारतीय समाज में तीव्रता के साथ घट रहे परिवर्तनों को अभिव्यक्ति प्रदान करें। भारतीय जनमानस के कण्ठहार बन चुके कहानीकार प्रेमचंद ने भी साहित्य को उपयोगिता की कसौटी पर तौलने की बात कही।

पश्चात् हुए अधिवेशन में कविगुरु रवीन्द्र ने भी इसी बात पर बल दिया कि "प्रत्येक भारतीय लेखक को भारतीय जीवन में होने वाले परिवर्तनों को अभिव्यक्ति देनी चाहिए और क्रान्ति की भावना के विकास में सहायता पहुँचानी चाहिए। साहित्य तथा अन्य कलाओं को जीवन के यथार्थ का माध्यम और नये विश्व-निर्माण की शक्ति बनाना उसका कर्तव्य है।""


मार्क्स के विचार तथा प्रेमचंद रवीन्द्र आदि की मान्यताओं ने तत्कालीन लेखक समाज की दिशा का निर्धारण किया। प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि को समझने के लिए उपर्युक्त पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।


सर्वविदित है, प्रगतिवाद केवल भौतिक सत्ता को स्वीकृति प्रदान करता है। अतः प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि के अन्तर्गत आत्मा, ईश्वर, परलोक की कल्पना, धर्म जैसे तत्त्वों का निषेध स्पष्ट देखा जा सकता है। भाग्य में आस्था रखने वाला, कर्म फल की मान्यता का स्वीकार करने वाला आध्यात्मिक हृदय का व्यक्ति कभी शोषण के खिलाफ हिंसक क्रान्ति नहीं कर सकता, इस बात में मार्क्स का अटल विश्वास था। मार्क्स का यह विश्वास प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि में भी पनपा । परिणामतः पश्चिम में 'गॉड इज डेड' की घोषणा के समकक्ष भारत में कवि की लेखनी से निम्नलिखित भाव उतरा-


अरे चाटते जूठे पत्ते जिस दिन मैंने देखा नर को उस दिन सोचा, क्यों न लगा दूँ आज आग इस दुनिया भर को यह भी सोचा, क्यों न टेंटुआ घोंटा जाए स्वयं जगपति का जिसने अपने ही स्वरूप को रूप दिया इस घृणित विकृति का


पूँजीवादी शोषक के प्रति घृणात्मक आक्रोश प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि का अनिवार्य अंग बन गया।


पूँजीवाद ने महत्त्व नष्ट कर दिया सबका जीवन का, जन का, समाज का, कला का बिना पूँजीवाद को मिटाये किसी तरह भी यह जीवन स्वस्थ नहीं हो सकता


इसी की प्रतिक्रिया शोषितों के प्रति अत्यधिक सहानुभूतिपूर्ण रवैये के रूप में उभर आयी। सामाजिक विषमता, इसके लिए उत्तरदायी अर्थाधारित समाज रचना, इससे पनपते वर्ग संघर्ष का यथार्थवादी वर्णन प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि को स्पष्ट करता है।


युग के ये नर कंकाल


हड्डियों के ताप से अशान्त हैं। गालों की सूखी हड़ियों में धँसी हुई आँखों की, पुतलियों में बसी है भावना विद्रोह की बढ़ते हैं नरकंकाल, नवयुवक, खड़ी है जहाँ सेना परतन्त्रता की, मृत्यु की भूख की, दुःसह अपमान अत्याचार की


प्रगतिवादी साहित्यकारों ने अपनी लेखनी का लक्ष्य निर्धारित कर लिया था। उनके लेखन का स्वर प्रचारात्मक था जिसमें मॉस्को, लाल रूस का बार-बार जयघोष दिखाई देता है। इस प्रचारवादी दृष्टिकोण के कारण प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि संकुचित वर्ण्य विषयों के साथ बँध गई। निश्चित रूप से प्रगतिवादियों ने बंगाल का अकाल, देश-विभाजन, गाँधी हत्या आदि ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर लिखा लेकिन प्रचारवादी दृष्टिकोण के कारण प्रगतिवादी काव्य एक खास किस्म का सपाटपन और सतहीपन लिये हुए हैं।



साम्यवादी विचारधारा और मार्क्स के नायकत्व में पूर्ण विश्वास करने वाले प्रगतिवादी कवियों की दृष्टि समाज, पूँजीविरोध, उपयोगितावाद, विद्रोह जैसी बातों के इर्द-गिर्द घूमती रही। उपर्युक्त जिन बातों को प्रगतिवाद की आधारभूमि कहा जाता है, उन बातों को सन् 1945 के आसपास 'असफल ईश्वर' अर्थात् 'दि गॉड वैट फेल्ड' की संज्ञा दी गई। दो-दो विश्वयुद्ध और इनमें हुए अमानुष नरसंहार ने मानवी संवेदनाओं को बुरी तरह झकझोर दिया। मानव की विचारशैली में इन दिनों अमूलाग्र परिवर्तन हुआ। शाश्वत तथा सामयिक मूल्यों पर से मनुष्य का विश्वास टूटने लगा ।

निर्माण और विनाश दोनों की सत्ता का स्वीकार किया जाने लगा। वास्तविक सत्य को बाह्य नहीं बल्कि आन्तरिक मानने की प्रवृत्ति बलवती होने लगी परिणामतः सामाजिक यथार्थ की संकल्पना चटकने लगी और मनुष्य की अपने अन्तर्जगत की ओर यात्रा आरम्भ हो गई।


इलियट, सार्त्र, एजरा पाउंड जैसे कवि मनोविश्लेषण का आधार लेकर युगीन स्थितियों में संकट-बोध की स्थिति को विश्लेषित करने लगे। एक ओर दो-दो विश्वयुद्ध और दूसरी ओर वैज्ञानिक उन्नति के फलस्वरूप हुए उद्योग विस्तार के कारण मनुष्य में व्यक्तिवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगीं।

सांस्कृतिक मूल्यों का विघटन तीव्र गति से होने लगा । सांस्कृतिकता की सीमाओं के दरकने के पश्चात् प्रबल हुई व्यक्तिवादिता ने अहं को विस्तार प्रदान किया । परिणामस्वरूप बाह्य जगत् को महत्त्व देती वृत्तियाँ अन्तर्जगत को प्रधान माने लगीं। पहले परिवार, संस्कार, ईश्वरादि पारम्परिक मान्यताओं के दबाव के कारण मनुष्य कम से कम सामाजिक जीवन तो जी लेता था किन्तु इन मान्यताओं के साथ-साथ प्रतिबद्ध रखने वाली तमाम परम्पराओं के बन्धन जैसे-जैसे खुलने लगे, मनुष्य मुक्त कम और अकेला - असहाय अधिक महसूस करने लगा। इस स्थिति ने मनुष्य के लघुत्व को अधोरेखित किया और लघुमानव की संकल्पना प्रत्यक्ष होने लगी। प्राचीन के प्रति गहरा असंतोष उभरने लगा, नवीनता के प्रति आग्रह बढ़ने लगा । जीवन में अवसाद, निराशा, घुटन, अविश्वास, अकर्मण्यता का वर्चस्व बढ़ने लगा । आधुनिकता के दर्शन ने मनुष्य को अपनी नियति भोगने के लिए बाध्य किया।